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बासी रोटी….

सतिगुरू कल सतिगुर तिलकु सति लागै सो पै तरै ॥
गुरु जगत फिरणसीह अंगरउ राजु जोगु लहणा करै ॥

 

एक लड़का था | माँ ने उसका विवाह कर दिया | परन्तु वह कुछ कमाता नहीं था | माँ जब भी उसको रोटी परोसती थी, तब वह कहती कि बेटा, ठण्डी रोटी खा लो | लड़के की समझ में नहीं आया कि माँ ऐसा क्यों कहती है | फिर भी वह चुप रहा |

एक दिन माँ किसी काम से बाहर गयी तो जाते समय अपनी बहू (उस लड़के की स्त्री) – को कह गयी कि जब लड़का आये तो उसको रोटी परोस देना | रोटी परोसकर कह देना कि ठण्डी रोटी खा लो |

उसने अपने पति से वैसा ही कह दिया तो वह चिढ़ गया कि माँ तो कहती ही है, वह भी कहना सीख गयी !

वह अपनी स्त्री से बोला कि बता, रोटी ठण्डी कैसे हुई ? रोटी भी गरम है, दाल-साग भी गरम है, फिर तू ठण्डी रोटी कैसे कहती है ?

वह बोली की यह तो आपकी माँ जाने | आपकी माँ ने मेरे को ऐसा कहने के लिये कहा था, इसलिये मैंने कह दिया |

वह बोला कि मैं रोटी नहीं खाऊँगा | माँ तो कहती ही थी, तू भी सीख गयी !

माँ घर आई तो उसने बहू से पूछा कि क्या लड़के ने भोजन कर लिया ? वह बोली कि उन्होंने तो भोजन किया ही नहीं, उलटा नाराज हो गये !

माँ ने लड़के से पूछा तो वह बोली कि माँ तू तो रोजाना कहती थी कि ठण्डी रोटी खा ले और मैं सह लेता था, अब यह भी कहना सीख गयी | रोटी तो गरम होती है, तू बता कि रोटी ठण्डी कैसे है ?

माँ ने पूछा कि ठण्डी रोटी किसको कहते हैं ?

वह बोला – सुबह की बनायी हुई रोटी शाम को ठण्डी होती है | बासी रोटी ठण्डी और ताज़ी रोटी गरम होती है |

माँ ने कहा – बेटा, अब तू विचार करके देख तेरे बाप की जो कमाई है, वह ठण्डी, बासी रोटी है | गरम, ताज़ी रोटी तो तब होगी, जब तू खुद कमाकर लायेगा |

लड़का समझ गया और माँ से बोला कि अब मैं खुद कमाऊँगा और गरम रोटी खाऊँगा |

करमी करमी होइ वीचारु ॥ सचा आपि सचा दरबारु

करमी करमी होइ वीचारु ॥ सचा आपि सचा दरबारु ॥
तिथै सोहनि पंच परवाणु ॥ नदरी करमि पवै नीसाणु ॥

 

कर्मों के आधार पर ही न्याय होता है।
सच्चा (ईश्वर) स्वयं सच्चे दरबार में उपस्थित रहता है।
वहाँ (सच्चे दरबार में) स्वीकार किए गए श्रेष्ठ व्यक्ति ही शोभा पाते हैं।
कृपा से ही ईश्वर की दृष्टि में पहचान मिलती है।

गहरा विश्लेषण:

  1. कर्मों के आधार पर न्याय: “करमी करमी होइ वीचारु” का अर्थ है कि हमारे कर्मों के आधार पर ही न्याय किया जाता है। इस जीवन में जो भी कर्म हम करते हैं, वही हमारे अगले जीवन या मोक्ष की दिशा तय करते हैं। यहाँ यह समझाया गया है कि ईश्वर के दरबार में केवल हमारे कर्मों के आधार पर ही विचार किया जाता है, कोई बाहरी आडंबर या दिखावा नहीं चलता।
  2. सच्चा ईश्वर और सच्चा दरबार: “सचा आपि सचा दरबारु” बताता है कि ईश्वर स्वयं सच्चा है और उसका दरबार भी सच्चा है। यह बताता है कि ईश्वर का न्याय कभी गलत नहीं हो सकता, वह न केवल सत्य का पालन करता है बल्कि उसका न्याय भी सत्य पर आधारित होता है।
  3. श्रेष्ठ व्यक्तियों की स्वीकृति: “तिथै सोहनि पंच परवाणु” का अर्थ है कि ईश्वर के दरबार में केवल वे ही लोग शोभा पाते हैं जो श्रेष्ठ कर्मों वाले (पंच) होते हैं और जिन्हें ईश्वर की स्वीकृति प्राप्त होती है। ये श्रेष्ठ व्यक्ति (पंच) वे हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को पवित्र किया है और सत्य मार्ग पर चले हैं।
  4. कृपा से प्राप्त पहचान: “नदरी करमि पवै नीसाणु” का मतलब है कि ईश्वर की कृपा से ही कोई व्यक्ति उसकी दृष्टि में स्थान और पहचान पाता है। केवल अपने कर्मों के बल पर व्यक्ति मोक्ष या पहचान प्राप्त नहीं कर सकता, इसमें ईश्वर की कृपा और उसकी नज़र में आना भी आवश्यक है।

संदेश:

यह शबद हमें यह सिखाता है कि इस संसार में केवल हमारे कर्म ही मायने रखते हैं। ईश्वर का दरबार सच्चा है, और वहाँ केवल उन्हीं को स्थान मिलता है जिन्होंने धर्म और सत्य का पालन किया है। ईश्वर की कृपा के बिना मोक्ष या उसकी निकटता प्राप्त करना संभव नहीं है, चाहे व्यक्ति कितने भी अच्छे कर्म क्यों न करे। ईश्वर की कृपा और न्याय में उच्च और निम्न का भेद नहीं होता, वहाँ केवल सत्य और कर्म की परीक्षा होती है।

सारांश:

“करमी करमी होइ वीचारु” से लेकर “नदरी करमि पवै नीसाणु” तक का संदेश यह है कि जीवन में केवल हमारे कर्म ही न्याय का आधार होते हैं। ईश्वर का दरबार सच्चा है, और वहाँ केवल श्रेष्ठ व्यक्ति (पंच) ही सम्मानित होते हैं। लेकिन, इन सबके साथ-साथ, ईश्वर की कृपा और उसकी नज़र में आना भी आवश्यक है, तभी कोई व्यक्ति मोक्ष या पहचान प्राप्त कर सकता है।

सच्ची जिंदगी

गावै गुण धोमु अटल मंडलवै भगति भाइ रसु जाणिओ ॥
कबि कल सुजसु गावउ गुर नानक राजु जोगु जिनि माणिओ ॥

 

पत्नी और पति में झगड़ा हो गया। पति और बच्चे खाना खाकर सो गए तो पत्नी घर से बाहर निकाल गई, यह सोचकर कि अब वह अपने पति के साथ नहीं रह सकती। मोहल्ले की गलियों में इधर-उधर भटक रही थी कि तभी उसे एक घर से आवाज सुनाई दी, जहाँ एक स्त्री रोटी के लिए ईश्वर से अपने बच्चे के लिए प्रार्थनाएं कर रही थी।

वह थोड़ा और आगे बढ़ी तो एक और घर से आवाज आई, जहाँ एक स्त्री ईश्वर से अपने बेटे को हर परेशानी से बचाने की दुआ कर रही थी। एक और घर से आवाज आ रही थी जहाँ एक पति अपनी पत्नी से कह रहा था कि वह मकान मालिक से कुछ और दिन की मोहलत मांग लें और उससे हाथ जोड़कर अनुरोध करें कि रोज-रोज आकर उन्हें तंग न करें।

थोड़ा और आगे बढ़ी तो एक बुज़ुर्ग दादी अपने पोते से कह रही थी, “बेटा, कितने दिन हो गए तुम मेरे लिए दवाई नहीं लाए।” पोता रोटी खाते हुए कह रहा था, “दादी माँ, अब मेडिकल वाला भी दवा नहीं देता और मेरे पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि मैं आपके लिए दवाई ले आऊं।”

थोड़ा और आगे बढ़ी तो एक घर से स्त्री की आवाज आ रही थी जो अपने भूखे बच्चों को यह कह रही थी कि आज तुम्हारे बाबा तुम्हें खाने के लिए कुछ ना कुछ जरूर लाएंगे, तब तक तुम सो जाओ। जब तुम्हारे बाबा आएंगे तो मैं तुम्हें जगा दूंगी। वह औरत कुछ देर वहीं खड़ी रही और सोचते हुए अपने घर की ओर वापस लौट गई कि जो लोग हमारे सामने खुश और सुखी दिखाई देते हैं, उनके पास भी कोई ना कोई कहानी होती है।

फिर भी, यह सब अपने दुख और दर्द को छुपाकर जीते हैं। वह औरत अपने घर वापस लौट आई और ईश्वर का धन्यवाद करने लगी कि उसके पास अपना मकान, संतान, और एक अच्छा पति है। हाँ, कभी-कभी पति से नोक-झोंक हो जाती है, लेकिन फिर भी वह उसका बहुत ख्याल रखता है। वह औरत सोच रही थी कि उसकी जिंदगी में कितने दुख हैं, मगर जब उसने लोगों की बातें सुनीं तो उसे यह एहसास हुआ कि लोगों के दुख तो उससे भी ज्यादा हैं।

जरूरी नहीं कि आपके सामने खुश और सुखी नजर आने वाले सभी लोगों का जीवन परफेक्ट हो। उनके जीवन में भी कोई न कोई परेशानी या तकलीफ होती है, लेकिन सभी अपनी परेशानी और तकलीफ को छुपाकर मुस्कुराते हैं। दूसरों की हंसी के पीछे भी दुख और मातम के आंसू छिपे होते हैं। कठिनाइयों और परीक्षणों के बावजूद जीना जीवन की वास्तविकता है, यही सच्ची जिंदगी है।

राती रुती थिती वार ॥ पवण पाणी अगनी पाताल…

राती रुती थिती वार ॥ पवण पाणी अगनी पाताल ॥
तिसु विचि धरती थापि रखी धरम साल ॥
तिसु विचि जीअ जुगति के रंग ॥ तिन के नाम अनेक अनंत ॥

 

 

रातें, ऋतुएं, तिथियाँ और दिन (सप्ताह) — सब उसकी रचना हैं।
हवा, पानी, अग्नि और पाताल (धरती के नीचे की दुनिया) — ये सब भी उसकी रचना हैं।
उसने इस धरती को धर्म का स्थान बनाकर स्थिर रखा है।
उसमें अनगिनत जीव अनेक तरीकों और रंगों में रहते हैं।
उनके नाम अनगिनत और असीम हैं।

गहरा विश्लेषण:

  1. समय और प्रकृति: “राती रुती थिती वार” का अर्थ है कि दिन, रात, मौसम, तिथियाँ और वार (सप्ताह के दिन) — ये सभी ईश्वर की बनाई हुई व्यवस्थाएँ हैं। ये समय और काल के संकेतक हैं, और यह दर्शाते हैं कि सृष्टि का हर पहलू ईश्वर की योजना और रचना के अनुसार चलता है।
  2. प्राकृतिक तत्वों की रचना: “पवण पाणी अगनी पाताल” — हवा, पानी, अग्नि, और धरती के नीचे की दुनिया, ये सभी शक्तिशाली तत्व सृष्टि के आधार हैं। ये बताता है कि ईश्वर ने इस संसार के हर तत्व को अपनी योजना के अनुसार रचा है, और इन तत्वों के बिना जीवन संभव नहीं है।
  3. धरती को धर्म का स्थान बनाना: “तिसु विचि धरती थापि रखी धरम साल” — ईश्वर ने इस धरती को “धर्म का स्थान” बना कर स्थापित किया है, जिसका अर्थ यह है कि यह धरती एक ऐसा स्थान है जहाँ जीवन के लिए नैतिकता, धर्म, और सत्य का पालन आवश्यक है। धरती पर मनुष्यों का उद्देश्य केवल भौतिक सुख नहीं है, बल्कि यहाँ नैतिकता और धर्म का पालन करना जीवन का असली लक्ष्य है।
  4. जीवों की विविधता: “तिसु विचि जीअ जुगति के रंग” — धरती पर अनगिनत प्रकार के जीव रहते हैं, जो विभिन्न रूपों, रंगों और तरीकों से जीवन जीते हैं। यह विविधता भी ईश्वर की अद्भुत रचना का प्रतीक है, जहाँ हर जीव अपने ढंग से जीवन जी रहा है।
  5. असीमित नाम: “तिन के नाम अनेक अनंत” का अर्थ है कि इन जीवों के नाम अनगिनत हैं। उनकी विशेषताएँ, उनकी जीवनशैली और उनके कार्य इतने विविध हैं कि उनके नामों की कोई सीमा नहीं है। यह सृष्टि की विशालता और ईश्वर की असीम रचना शक्ति को दर्शाता है।

संदेश:

यह शबद हमें सिखाता है कि सृष्टि का हर पहलू—समय, तत्व, धरती, जीव—सब कुछ ईश्वर की महान रचना का हिस्सा है। धरती एक ऐसा स्थान है जहाँ धर्म और नैतिकता का पालन आवश्यक है, और यहाँ रहने वाले जीव अनगिनत रूपों और नामों में आते हैं। ईश्वर की रचना की विविधता और विशालता अनंत है, और हमें इस रचना में धर्म और सत्य का पालन करते हुए जीना चाहिए।

सारांश:

“राती रुती थिती वार” से लेकर “तिन के नाम अनेक अनंत” तक का संदेश यह है कि सृष्टि का हर तत्व, हर जीव, और समय की हर स्थिति ईश्वर की महान रचना का हिस्सा है। धरती एक पवित्र स्थान है जहाँ धर्म का पालन अनिवार्य है, और यहाँ रहने वाले जीवों की विविधता ईश्वर की असीम रचना क्षमता को दर्शाती है।

चरित्रहीन

पावक जरिओ न जात रहिओ जन धूरि लगि ॥
नीरु न साकसि बोरि चलहि हरि पंथि पगि ॥
नानक रोग दोख अघ मोह छिदे हरि नाम खगि ॥

 

एक बार महात्मा बुद्ध किसी गांव में गए। वहां एक स्त्री ने उनसे पूछा कि आप तो किसी राजकुमार की तरह दिखते हैं, आपने युवावस्था में गेरुआ वस्त्र क्यों धारण किया है?

बुद्ध ने उत्तर दिया कि मैंने तीन प्रश्नों के हल ढूंढने के लिए संन्यास लिया है।

बुद्ध ने कहा- हमारा शरीर युवा और आकर्षक है, लेकिन यह वृद्ध होगा, फिर बीमार होगा और अंत में यह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।

मुझे वृद्धावस्था, बीमारी और मृत्यु के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है।

बुद्ध की बात सुनकर स्त्री बहुत प्रभावित हो गई और उसने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया।

जैसे ही ये बात गांव के लोगों को मालूम हुई तो सभी ने बुद्ध से कहा कि वे उस स्त्री के यहां न जाए, क्योंकि वह स्त्री चरित्रहीन है।

बुद्ध ने गांव के सरपंच से पूछा कि क्या ये बात सही है? सरपंच ने भी गांव के लोगों की बात में सहमती जताई। तब बुद्ध ने सरपंच का एक हाथ पकड़ कर कहा कि अब ताली बजाकर दिखाओ।

इस पर सरपंच ने कहा कि यह असंभव है, एक हाथ से ताली नहीं बज सकती।

बुद्ध ने कहा कि ठीक इसी प्रकार कोई स्त्री अकेले ही चरित्रहीन नहीं हो सकती है। यदि इस गांव के पुरुष चरित्रहीन नहीं होते तो वह स्त्री भी चरित्रहीन नहीं होती। गांव के सभी पुरुष बुद्ध की ये बात सुनकर शर्मिदा हो गए।

जोरु न सुरती गिआनि वीचारि ॥ जोरु न जुगती छुटै संसारु…

जोरु न सुरती गिआनि वीचारि ॥ जोरु न जुगती छुटै संसारु ॥
जिसु हथि जोरु करि वेखै सोइ ॥ नानक उतमु नीचु न कोइ ॥

 

स्मरण शक्ति (ध्यान), ज्ञान और विचार पर कोई बल नहीं है।
संसार से मुक्ति पाने की विधि (जुगति) पर भी कोई बल नहीं है।
जिसके हाथ में बल है, वही सब कुछ देखता और करता है।
नानक कहते हैं, उसकी दृष्टि में कोई उच्च या नीच नहीं है।

गहरा विश्लेषण:

  1. ध्यान और ज्ञान पर कोई बल नहीं: “जोरु न सुरती गिआनि वीचारि” का अर्थ है कि हमारी स्मरण शक्ति (सुरति), ज्ञान (गिआन), और विचार करने की शक्ति (वीचार) हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। ये सब ईश्वर की कृपा पर निर्भर हैं। हम केवल अपने बल से ध्यान, ज्ञान, और विचार प्राप्त नहीं कर सकते, यह तभी संभव है जब ईश्वर हमें यह अनुग्रह प्रदान करता है।
  2. संसार से मुक्ति पर कोई नियंत्रण नहीं: “जोरु न जुगती छुटै संसारु” का मतलब है कि संसार से मुक्ति पाने की विधि (जुगति) भी हमारे नियंत्रण में नहीं है। मनुष्य अपने बल या प्रयास से संसार के बंधनों से छुटकारा नहीं पा सकता। यह केवल ईश्वर की कृपा से ही संभव है।
  3. सभी शक्तियाँ ईश्वर के हाथ में हैं: “जिसु हथि जोरु करि वेखै सोइ” में यह बताया गया है कि सब कुछ ईश्वर के हाथ में है। वही सारी शक्तियों का स्वामी है और वही देखता और नियंत्रित करता है कि क्या होना चाहिए। मनुष्य के पास कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है, सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर चलता है।
  4. समानता का सिद्धांत: “नानक उतमु नीचु न कोइ” का अर्थ है कि ईश्वर की दृष्टि में कोई भी उच्च या नीच नहीं है। वह सभी को एक समान देखता है, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, या सामाजिक स्तर का हो। ईश्वर की दृष्टि में सब बराबर हैं।

संदेश:

इस शबद का मूल संदेश यह है कि मनुष्य के पास किसी भी प्रकार का वास्तविक बल या नियंत्रण नहीं है। ध्यान, ज्ञान, विचार, और संसार से मुक्ति सभी ईश्वर की कृपा पर आधारित हैं। ईश्वर ही सारे कार्यों का संचालक है, और उसके बिना कुछ भी संभव नहीं है। साथ ही, ईश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं—कोई भी उच्च या नीच नहीं है।

सारांश:

“जोरु न सुरती गिआनि वीचारि” से लेकर “नानक उतमु नीचु न कोइ” तक का पूरा संदेश यह है कि संसार में हर चीज़—चाहे वह ध्यान, ज्ञान, मुक्ति, या विचार हो—सब कुछ ईश्वर की कृपा से होता है। हम केवल अपने प्रयासों से इन चीज़ों को प्राप्त नहीं कर सकते। ईश्वर की दृष्टि में कोई भी व्यक्ति उच्च या नीच नहीं है, वह सबको समान रूप से देखता है।

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