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सरम खंड की बाणी रूपु ॥ तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु ॥

सरम खंड की बाणी रूपु ॥ तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु ॥

 

सरम खंड (श्रम क्षेत्र) की बाणी (वाणी) सुंदर और अद्वितीय रूप से प्रकट होती है।
वहाँ अनगिनत सुंदर और अनुपम रूप गढ़े जाते हैं।

गहरा विश्लेषण:

  1. सरम खंड: “सरम खंड” का अर्थ है श्रम का क्षेत्र या वह अवस्था जहाँ आध्यात्मिक रूप से आत्मा को परिष्कृत किया जाता है। इस चरण में आत्मा अपनी असली सुंदरता और रूप प्राप्त करती है। यह कर्म, तपस्या, और ध्यान का वह स्तर है, जहाँ आत्मा की आंतरिक सुंदरता को गढ़ा और निखारा जाता है।
  2. बाणी रूपु: “बाणी रूपु” का तात्पर्य है कि इस क्षेत्र की वाणी सुंदरता का प्रतीक है। यहाँ वाणी का अर्थ केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक सुंदरता है, जो तपस्या और श्रम के द्वारा विकसित होती है। यह सुंदरता आत्मा की आंतरिक पवित्रता और शुद्धता को दर्शाती है।
  3. अनुपम रूप: “तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु” का अर्थ है कि उस क्षेत्र में अनगिनत सुंदर और अद्वितीय रूप बनाए जाते हैं। यह उस रचनात्मकता और आत्मिक विकास को दर्शाता है, जो इस चरण में होता है। आत्मा को विभिन्न प्रकार के सुंदर और अनूठे रूपों में गढ़ा जाता है, जो हर आत्मा की विशिष्टता और अनूठी पहचान को प्रकट करता है।

संदेश:

यह शबद हमें सिखाता है कि सरम खंड (श्रम और तपस्या का क्षेत्र) में आत्मा की आंतरिक सुंदरता प्रकट होती है। यह चरण आत्मा को परिष्कृत करता है और उसकी विशेषता को अद्वितीय रूप से गढ़ता है। इस क्षेत्र में आत्मा का विकास होता है, और यह उसके आंतरिक गुणों और रूपों को निखारता है। यह अनुपम रूप और सुंदरता ईश्वर के दिव्य प्रेम और कृपा से प्रकट होती है।

सारांश:

“सरम खंड की बाणी रूपु” से लेकर “तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु” तक का संदेश यह है कि सरम खंड में आत्मा की आंतरिक सुंदरता और गुण प्रकट होते हैं। यहाँ आत्मा को तपस्या और श्रम द्वारा विभिन्न सुंदर और अद्वितीय रूपों में गढ़ा जाता है। यह क्षेत्र आत्मा के विकास और उसकी दिव्यता का प्रतीक है, जहाँ वह अपने सच्चे रूप में निखरती है।

भागवत सर

अभर भरे पायउ अपारु रिद अंतरि धारिओ ॥
दुख भंजनु आतम प्रबोधु मनि ततु बीचारिओ ॥

 

“बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया नहीं है।” लाचार माता के शब्द है अपने बेटे को समझाने के लिये।

“देख मम्मी! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद वेकेशन में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने प्रोमिस किया था। आज मेरे आखरी पेपर के बाद दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।”

एक गरीब घर में बेटे मोहन की जिद्द और माता की लाचारी आमने सामने टकरा रही थी।

“बेटा! तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए एक्सिडेंट ..

मम्मी कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला “मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो बाइक चाहिये ही चाहिये ..!!”

ऐसा बोलकर मोहन अपनी मम्मी को गरीबी एवं लाचारी की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।

12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत ‘सर’ एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।

हालांकि भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधता से भरे ये परीक्षा अवश्य देने जाते थे।

इस साल परीक्षा का विषय था *मेरी पारिवारिक भूमिका*

मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।

उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे बाइक लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा।

भागवत सर के क्लास में सभी को पेपर वितरित हो गया। पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।

मोहन ने पहला प्रश्न पढा और जवाब लिखने की शुरुआत की।

*प्रश्न नंबर १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तर बताइये?*

मोहन ने जल्द से जवाब लिखना शुरू कर दिया।

जवाबः

पापा सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ओटोरिक्शा लेकर निकल जाते हैं। और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्दी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।

मम्मी सुबह चार बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार कर, बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है। और सभी लोगों के सो

जाने के बाद वह सोती हैं। लगभग रोज के सोलह घंटे।

दीदी सुबह कालेज जाती हैं, शाम को 4 से 8 पार्ट टाइम जोब करती हैं। और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।

मैं, सुबह छह बजे उठता हूँ, और दोपहर स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।

(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज में औसत सबसे कम है।)

पहले सवाल के जवाब के बाद मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..

*प्रश्न नंबर २ :- आपके घर की मासिक कुल आमदनी कितनी है?*

जवाबः

पापा की आमदनी लगभग दस हजार हैं। मम्मी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार

जोडते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हजार।

*प्रश्न नंबर ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मनपसंद टीवी पर आ रही तीन सीरियल के नाम, शहर के एक सिनेमा होल का पता और अभी वहां चल रही मूवी का नाम बताइये?*

सभी प्रश्नों के जवाब आसान होने से फटाफट दो मिनट में लिख दिये ..

*प्रश्न नंबर ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी हाल की कीमत क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल की कीमत बताइये? और जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये।*

मोहनभाई को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक जरुरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी तो मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मुवी का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम की

जवाबदेही लेने से या तो हाथ बटोर कर साथ देने से हम कतराते रहे हैं।

*प्रश्न नंबर ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो?*

जवाबः हां, मुझे आलू के सिवा कोई भी सब्जी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी मैं बगैर खाना खायें उठ खडा हो जाता हूँ।

(इतना लिखते ही मोहन को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती हैं। पेट में दर्द होता है, अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने गलती से मम्मी की सब्जी खा ली, और फिर मैंने थूक दिया था। और फिर पूछा कि मम्मी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी जिद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?)

मोहन ने अपनी यादों से बाहर आकर

अगले प्रश्न को पढा

*प्रश्न नंबर ६ :- आपने अपने घर में की हुई आखरी जिद के बारे में लिखिये ..*

मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन बाइक के लिये जिद्द की थी। पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था, मम्मी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में खाना खाना भी छोड़ दिया है। जबतक बाइक नहीं लेकर दोगे मैं खाना नहीं खाऊंगा। और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला

हूँ।

अपनी जिद का प्रामाणिकता से मोहन ने जवाब लिखा।

*प्रश्न नंबर ७ :- आपको अपने घर से मिल रही पोकेट मनी का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं?*

जवाब: हर महीने पापा मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं, या अपने दोस्तों की छोटीमोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ।

मेरी दीदी को भी पापा सौ रुपये देते हैं। वो खुद कमाती हैं और पगार के पैसे से मम्मी को आर्थिक मदद करती हैं। हां, उसको दिये गये पोकेटमनी को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई मौजशौख नहीं है, क्योंकि वो कंजूस भी हैं।

*प्रश्न नंबर ८ :- आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका को समझते हो?*

प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी मोहन ने जवाब लिखा।

परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं मददरूप होना चाहिये और ऐसे अपनी जवाबदेही निभानी चाहिये।

यह लिखते लिखते ही अंतरात्मासे आवाज आयी कि अरे मोहन! तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से जवाब आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!!

*प्रश्न नंबर ९ :- आपके परिणाम से आपके माता-पिता खुश हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे जिद करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?*

(इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले हुए मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)

लिखने की शुरुआत की ..

वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जिद नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रोमिस तोडे हैं।

फिर भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।

*प्रश्न नंबर १० :- पारिवारिक जीवन में असरकारक भूमिका निभाने के लिये इस वेकेशन में आप कैसे परिवार को मददरूप होंगें?*

जवाब में मोहन की कलम चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई .. बेंच के निचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया।

स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।

“भैया! ये ले आठ हजार रुपये, मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर आना।”

दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।

“कहाँ से लायी ये पैसे?” मोहन ने पूछा।

दीदी ने बताया

“मैंने मेरी ओफिस से एक महीने की सेलेरी एडवांस मांग ली। मम्मी भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और मेरी पोकेटमनी की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।

मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।

दीदी फिर बोली ” भाई, तुम मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौक हैं, लेकिन अपने शौक से अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पापा को पैर की तकलीफ हैं फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रोमिस को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किये जा रहे हैं। तेरी बाइक के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने प्रोमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। और इसके पीछे उनकी मजबूरी है।

बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रोमिस तोडे ही है न?

मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।

उसी समय उनका दोस्त वहां अपनी बाइक लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।

“ले .. मोहन आज से ये बाइक तुम्हारी, सब बारह हजार में मांग रहे हैं, मगर ये तुम्हारे लिये आठ हजार ।”

मोहन बाइक की ओर टगर टगर देख रहा था। और थोड़ी देर के बाद बोला

“दोस्त तुम अपनी बाइक उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की हाल संभावना भी नहीं है।”

और वो सीधा भागवत सर की केबिन में जा पहूंचा।

“अरे मोहन! कैसा लिखा है पेपर में?

भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।

“सर ..!!, यह कोई पेपर नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु ये जवाब लिखकर नहीं अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।

घर पहुंचते ही, मम्मी पापा दीदी सब उसकी राह देखकर खडे थे।

“बेटा! बाइक कहाँ हैं?” मम्मी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि सोरी! मुझे बाइक नहीं चाहिये। और पापा मुझे ओटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे वेकेशन तक ओटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन आराम करेंगे, और मम्मी आज मैं मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिये तुम अपनी पसंद की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।

मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर मम्मी ने उसको गले लगा लिया और कहा कि “बेटा! सुबह जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पापा को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।” मोहन ने कहा

“नहीं मम्मी! अब मै समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने आखरी जवाब नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मम्मी हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो”और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया। और बोले “वाह! मोहन जो जवाब तुमनें लिखकर नहीं दिये वे प्रेक्टिकल जीवन जीकर कर दोगे

“सर! आप और यहाँ?” मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।

“मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही

और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।”

ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।

मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा….

 

गिआन खंड महि गिआनु परचंडु ॥ तिथै नाद बिनोद कोड अनंदु ॥

गिआन खंड महि गिआनु परचंडु ॥ तिथै नाद बिनोद कोड अनंदु ॥

 

ज्ञान के क्षेत्र (गिआन खंड) में, ज्ञान अत्यधिक प्रखर और शक्तिशाली होता है।
वहाँ नाद (आध्यात्मिक ध्वनि), बिनोद (आनंदमयी खेल), और अपार आनंद होता है।

गहरा विश्लेषण:

  1. ज्ञान की शक्ति: “गिआन खंड महि गिआनु परचंडु” का अर्थ है कि ज्ञान के खंड (क्षेत्र) में प्रवेश करने पर ज्ञान बहुत ही प्रखर और शक्तिशाली हो जाता है। यह ज्ञान व्यक्ति को अज्ञानता से मुक्त करता है और उसे सच्चाई और ईश्वर के मार्ग की ओर ले जाता है। यह गहन ज्ञान ही व्यक्ति को आत्मा की सच्चाई का अनुभव कराता है, और उसकी आंतरिक दुनिया को प्रकाशमान करता है।
  2. नाद और बिनोद: “तिथै नाद बिनोद” से तात्पर्य है कि उस ज्ञान के क्षेत्र में “नाद” यानी आध्यात्मिक ध्वनि का अनुभव होता है। यह ध्वनि केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सत्य का प्रतीक है। “बिनोद” का अर्थ है आनंदमयी खेल या खुशी। यहाँ यह संकेत करता है कि इस क्षेत्र में आत्मा को अनंत आनंद और शांति का अनुभव होता है।
  3. कोटि आनंद: “कोड अनंदु” का अर्थ है अपार और असंख्य आनंद। यह उस अद्वितीय आनंद की ओर इशारा करता है जो ज्ञान की प्राप्ति से मिलता है। इस आनंद की कोई सीमा नहीं होती, यह स्थायी होता है, और व्यक्ति को परमानंद का अनुभव कराता है।

संदेश:

यह शबद हमें बताता है कि ज्ञान का मार्ग अत्यधिक शक्तिशाली और प्रचंड है। जब व्यक्ति इस ज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसे आध्यात्मिक ध्वनि (नाद), आनंदमयी खेल, और अपार आनंद का अनुभव होता है। यह क्षेत्र बाहरी सुख-सुविधाओं से परे है और व्यक्ति को आंतरिक शांति और परमानंद प्रदान करता है। ज्ञान की शक्ति इतनी महान होती है कि यह व्यक्ति को आत्मा और ईश्वर की वास्तविकता के करीब ले आती है।

सारांश:

“गिआन खंड महि गिआनु परचंडु” से लेकर “तिथै नाद बिनोद कोड अनंदु” तक का संदेश यह है कि ज्ञान का क्षेत्र अत्यधिक शक्तिशाली और आनंदमयी है। इस क्षेत्र में व्यक्ति को आध्यात्मिक ध्वनि, आनंदमयी खेल, और अपार परमानंद का अनुभव होता है। ज्ञान की शक्ति व्यक्ति को अज्ञानता से मुक्त करके आत्मा की सच्चाई और ईश्वर के आनंद की ओर ले जाती है।

फरिश्ता

रुद्र धिआन गिआन सतिगुर के कबि जन भल्य उनह जुो गावै ॥
भले अमरदास गुण तेरे तेरी उपमा तोहि बनि आवै ॥

 

भगवान के साथ नवजात शिशु की बातचीत
एक बच्चे ने भगवान से पूछा, “वे मुझे बता रहे हैं कि आप मुझे कल धरती पर भेज रहे हैं, लेकिन मैं इतना छोटा और असहाय होकर वहाँ कैसे रहूँगा?”

भगवान ने कहा, “आपका देवदूत आपका इंतज़ार कर रहा होगा और आपकी देखभाल करेगा।”

बच्चे ने आगे पूछा, “लेकिन मुझे बताओ, यहाँ स्वर्ग में मुझे खुश रहने के लिए गाने और मुस्कुराने के अलावा कुछ नहीं करना है..”

भगवान ने कहा, “आपका देवदूत आपके लिए गाएगा और आपके लिए मुस्कुराएगा भी। और आप अपने देवदूत के प्यार को महसूस करेंगे और बहुत खुश होंगे।”

फिर से छोटे बच्चे ने पूछा, “और जब लोग मुझसे बात करेंगे तो मैं कैसे समझ पाऊँगा अगर मैं भाषा नहीं जानता?”

भगवान ने कहा, “आपका देवदूत आपको सबसे सुंदर और मीठे शब्द बताएगा जो आपने कभी सुने होंगे, और बहुत धैर्य और देखभाल के साथ, आपका देवदूत आपको बोलना सिखाएगा।”

“और जब मैं आपसे बात करना चाहूँगा तो मैं क्या करूँगा?”

भगवान ने कहा, “आपका देवदूत आपके हाथों को जोड़ेगा और आपको प्रार्थना करना सिखाएगा।”

“मेरी रक्षा कौन करेगा?”

भगवान ने कहा, “तुम्हारा फरिश्ता तुम्हारी रक्षा करेगा, भले ही इसके लिए उसे अपनी जान जोखिम में डालनी पड़े।”

“लेकिन मैं हमेशा दुखी रहूँगा क्योंकि मैं तुम्हें अब और नहीं देख पाऊँगा।”

भगवान ने कहा, “तुम्हारा फरिश्ता हमेशा तुमसे मेरे बारे में बात करेगा और तुम्हें मेरे पास वापस आने का तरीका सिखाएगा, भले ही मैं हमेशा तुम्हारे बगल में रहूँगा।”

उस समय स्वर्ग में बहुत शांति थी, लेकिन पृथ्वी से आवाज़ें सुनी जा सकती थीं और बच्चे ने जल्दी से पूछा, “भगवान, अगर मुझे अभी जाना है, तो कृपया मुझे मेरी फरिश्ते का नाम बताएँ।”

भगवान ने कहा, “तुम उसे बस “माँ” कहकर बुलाओगे।”

केते देव दानव मुनि केते केते रतन समुंद…

केते देव दानव मुनि केते केते रतन समुंद ॥
केतीआ खाणी केतीआ बाणी केते पात नरिंद ॥
केतीआ सुरती सेवक केते नानक अंतु न अंतु ॥

 

कितने ही देवता, दानव, और मुनि (ऋषि-मुनि) हैं, और कितने ही रत्नों से भरे समुद्र हैं।
कितनी ही खाणियाँ (जीवों के जन्म स्थान), कितनी ही भाषाएँ, और कितने ही राजा (नरेश) हैं।
कितनी ही सुरतियाँ (ध्यान लगाने वाले) और सेवक हैं, नानक कहते हैं, इनका कोई अंत नहीं है।

गहरा विश्लेषण:

  1. देवता, दानव और मुनि: “केते देव दानव मुनि” का अर्थ है कि इस संसार में अनगिनत देवता (जो दिव्य शक्तियाँ हैं), दानव (जो बुराई और नकारात्मक शक्तियों का प्रतीक हैं), और मुनि (जो ज्ञान और ध्यान में लीन ऋषि-मुनि हैं) विद्यमान हैं। यह दर्शाता है कि सृष्टि में अच्छाई, बुराई, और ज्ञान के अनगिनत रूप हैं, जो एक संतुलन बनाए रखते हैं।
  2. रत्न और समुद्र: “केते रतन समुंद” का तात्पर्य यह है कि अनगिनत रत्नों से भरे समुद्र हैं, जो ईश्वर की कृपा और सृष्टि की अनंतता का प्रतीक हैं। रत्न यहाँ ज्ञान, गुण, और जीवन की विभिन्न संभावनाओं को भी दर्शा सकते हैं, जो सृष्टि के भीतर बिखरे हुए हैं।
  3. खाणियाँ और बाणियाँ: “केतीआ खाणी केतीआ बाणी” का मतलब है कि इस सृष्टि में अनगिनत खाणियाँ (जीवों के जन्म स्थान) हैं, जहाँ जीवन विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। “बाणी” का अर्थ है अनगिनत भाषाएँ, शब्द, और ध्वनियाँ, जिनके माध्यम से इस संसार में संवाद और शिक्षा होती है।
  4. राजा और नरेश: “केते पात नरिंद” का तात्पर्य है कि इस संसार में अनगिनत राजा और नरेश हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों पर शासन करते हैं। यह बताता है कि सृष्टि की विविधता केवल सामान्य लोगों में ही नहीं, बल्कि शासकों और नेताओं के रूप में भी है।
  5. सुरतियाँ और सेवक: “केतीआ सुरती सेवक” का अर्थ है कि अनगिनत लोग हैं जो ध्यान लगाते हैं और ईश्वर की सेवा में लीन रहते हैं। ये भक्त ईश्वर के प्रति समर्पित होकर अपने जीवन का मार्ग खोजते हैं।
  6. अंत का अभाव: “नानक अंतु न अंतु” का मतलब है कि इस अनंत सृष्टि का कोई अंत नहीं है। नानक जी कहते हैं कि यह सृष्टि इतनी विशाल और अनगिनत रूपों में फैली हुई है कि इसका कोई अंत नहीं है। ईश्वर की रचना और उसकी महिमा अनंत है, और इसे पूरी तरह से समझना असंभव है।

संदेश:

यह शबद हमें सिखाता है कि सृष्टि में अनगिनत देवता, दानव, ऋषि, रत्न, खाणियाँ, भाषाएँ, राजा, और सेवक हैं। सृष्टि की विशालता और विविधता का कोई अंत नहीं है। यह सृष्टि अनंत है और ईश्वर की रचना की अद्भुतता को समझ पाना मानवीय क्षमता से परे है।

सारांश:

“केते देव दानव मुनि” से लेकर “नानक अंतु न अंतु” तक का संदेश यह है कि इस संसार में हर चीज़ अनगिनत और अनंत है—देवता, दानव, मुनि, रत्न, भाषाएँ, राजा, और सेवक। नानक कहते हैं कि इस सृष्टि का कोई अंत नहीं है, और इसकी महिमा को पूरी तरह समझना असंभव है। सृष्टि की विविधता और विस्तार अद्भुत है, और हमें इसे स्वीकार करते हुए ईश्वर की महिमा का गुणगान करना चाहिए।

तितलियों का पीछा मत करो

इकु बिंनि दुगण जु तउ रहै जा सुमंत्रि मानवहि लहि ॥
जालपा पदारथ इतड़े गुर अमरदासि डिठै मिलहि ॥

 

एक युवा लड़के ने अपने दादा से पूछा,

“दादाजी, मैं एक स्टार बनना चाहता हूँ, मैं फिल्मों में काम करना चाहता हूँ। जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो मैं दुनिया देखना चाहता हूँ, अच्छी कारें चलाना चाहता हूँ, और कांच के बने घर में रहना चाहता हूँ। हाँ, मैं वास्तव में सफल और महान बनना चाहता हूँ। तो मुझे बताओ, मैं अपने सभी लक्ष्यों का पीछा कैसे करूँ, और उन्हें तेज़ी से कैसे पकड़ूँ?”

दादाजी एक पल के लिए रुके, पीछे मुड़े, और फिर एक बहुत बड़ी और बेहद खूबसूरत तितली को एक फूल पर नाचते हुए देखा। तुरंत, उन्होंने कहा,

“हे भगवान! क्या शानदार तितली है! अब, जल्दी करो… जल्दी करो और उसका पीछा करो! सुनिश्चित करो कि तुम उसे पकड़ लो! उसे उड़ने मत दो! हटो!”

युवा लड़का जल्दी से तितली की ओर भागा, लेकिन जैसे ही उसने उसे पकड़ने की कोशिश की, तितली अचानक हवा में उड़ गई। वह उसे पकड़ने की कोशिश करते हुए उसके पीछे भागा, लेकिन वह बहुत तेज़ उड़ रही थी। वह बगीचे में इधर-उधर भागता रहा जब तक कि वह थक नहीं गया, और फिर उसे तितली दिखाई नहीं दी। साँस फूलने से वह अपने दादा के पास लौटा, घरघराहट करते हुए,

“मैं इसे पकड़ नहीं सका, दादाजी! यह उड़ गई!”

दादाजी एक पल के लिए मुस्कुराए, फिर उस छोटे लड़के का हाथ पकड़कर उसे एक कोने में ले गए। उसने तब तक इंतजार किया जब तक वह शांत नहीं हो गया, फिर उसने उसके कान में फुसफुसाया,

“सुनो, बेटा, मैं तुम्हें एक सबक सिखाता हूँ, एक मूल्यवान जीवन सबक।

यदि तुम अपना समय तितलियों का पीछा करने में बिताते हो, तो वे उड़ जाएँगी। लेकिन यदि तुम अपना समय एक सुंदर बगीचा बनाने में बिताते हो, तो तितलियाँ तुम्हारे पास आएँगी।

तुम देखो… वह तितली जीवन में तुम्हारे लक्ष्यों की तरह है। सफलता की हमारी यात्रा में, तत्काल लक्ष्यों, जीवन की क्षणभंगुर तितलियों की खोज में फंसना आसान है।

हालाँकि, असली जादू तब होता है जब हम कुछ ठोस बनाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जैसे कि एक जीवंत उद्यान की खेती करना।

लगातार पीछा करने के बजाय, अपनी ऊर्जा को बनाने और पालने में लगाओ।

कुछ सार्थक बनाएँ, चाहे वह कोई प्रोजेक्ट हो, कोई कौशल हो या कोई रिश्ता हो।

आप जो सुंदरता विकसित करेंगे, वह स्वाभाविक रूप से अवसरों, अनुभव और सफलता को आकर्षित करेगी। इसलिए प्यार, पैसे या सफलता का पीछा मत करो।

खुद का सबसे अच्छा संस्करण बनो और वे चीजें तुम्हारे पास आएँगी।”

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