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एक साथ किया अर्जुन और हनुमान जी का अभिमान भंग

जिस कै अंतरि राज अभिमानु ॥
सो नरकपाती होवत सुआनु ॥

एक दिन भगवान कृष्ण जी को छोड़कर अकेले अर्जुन वन में शिकार खेलने गये और घूमते-घूमते दक्षिण दिशा की और चले गए. उस समय सारथी के स्थान पर वे स्वयं थे और घोड़ों को हांकते हुए चले जा रहे थे. इस तरह वन में घूम-घूमकर दोपहर के समय तक उन्होंने बहुत से शिकार किए. इसके बाद स्नान करने की तैयारियां करने लगे. स्नान करने के लिये वे सेतुबन्ध रामेश्वर के धनुषकोटि तीर्थ पर गए, वहां स्नान किया और कुछ गर्वं से समुद्र के तट पर घूमने लगे.

तभी उन्होंने एक पर्वत के ऊपर साधारण वानर का स्वरूप धारण किए हुए महावीर हनुमान जी को बैठे देखा. उस समय हनुमान जी राम नाम जप रहे थे. पीले रंग के रोएं उनके शरीर पर बड़े अच्छे लग रहे थे. उन्हें देखकर अर्जुन ने पूछा- हे वानर! तुम कौन हो? तुम्हारा नाम क्या है? अर्जुन का प्रश्न सुनकर हंसकर हनुमान जी बोले कि जिनके प्रताप से रामचन्द्रजी ने समुद्र पर सौ योजन विस्तृत सेतु बनाया था, मैं वही वायुपुत्र हनुमान हूं. इस तरह गर्व भरे वचन सुनकर अर्जुन ने भी हंसकर कहा कि राम ने व्यर्थ ही इतना कष्ट उठाया. उन्होंने बाणों का सेतु बनाकर क्यों नहीं अपना काम चला लिया. अर्जुन की बात सुनकर हनुमान ने कहा- हम जैसे बड़े बड़े वानरों के बोझ से वह बाण का सेतु डूब जाता, यही सोचकर उन्होंने ऐसा नहीं किया.

अर्जुन ने कहा- हे कपिश्रेष्ठ! यदि वानरों के बोझ से सेतु टूट जाने का भय हो तो उस धनुर्धारी की धनुर्विद्या की क्या ही विशेषता रही. अभी इसी समय मैं अपने कौशल से बाणों का सेतु बनायए देता हूं, तुम उसके ऊपर आनन्द से नाचो-कूदो. इस प्रकार मेरी धनुर्विद्या का नमूना भी देख लो. अर्जुन को ऐसी बात सुनकर हनुमान जी मुस्कुराते हुए कहने लगे कि यदि मेरे पैर के अंगूठे के बोझ से ही आपका बनाया सेतु डूब जाए तो क्या करियेगा? हनुमान जी की बात सुनकर अर्जुन ने कहा कि यदि तुम्हारे भार से सेतु डूब जायेगा तो मैं चिता लगाकर उसकी आग में अग्नि स्नान कर लूंगा. अच्छा, अब तुम (हनुमान जी से बोला) भी कोई बाजी लगाओ.

अर्जुन की बात सुनकर हनुमान कहने लगे कि यदि मैं अपने अंगूठे के ही भार से तुम्हारे बनाए सेतु को न डुबा सकूंगा तो तुम्हारे रथ के ध्वजा के पास बैठकर जीवन भर तुम्हारी सहायता करूंगा. “अच्छा, यही सही” ऐसा कहकर अर्जुन ने अपने धनुष का टंकार किया और अपने बाणों के सामूह से बहुत थोड़े समय में एक सुदृढ़ सेतु बनाकर तैयार कर दिया. उस सेतु का विस्तार सौ योजन था और वह सागर के ऊपर ही उतरा रहा था. उस सेतु को देखकर हनुमान जी ने उनके सामने ही अपने अंगूठे के भार से डुबा दिया. उस समय गंधर्वों के साथ-साथ देवताओं ने हनुमान जी पर फूलों की वर्षा की, हनुमान के इस कर्म से खिन्न होकर अर्जुन ने समुद्र के तटपर ही चिता तैयार की और हनुमान के रोकने पर भी वे उसमें कूदने को उद्यत हो गए.

इसी समय एक ब्रह्मचारी का रूप धारण करके श्रीकृष्ण जी वहां आए और उन्होंने अर्जुन से चिता में कूदने का कारण पूछा. अर्जुन के मुख से ही सब बात मालूम करके कहा कि तुम लोगों ने उस समय जो बाजी लगायी थी, वह व्यर्थ थी. क्योंकि उस समय तुम्हारी बातों का कोई साक्षी नहीं था. साक्षी के बिना सच-झूठ का कोई ठिकाना नहीं रहता. इस समय मैं तुम्हारे समय साक्षी के रूप में विद्यमान हूं. अब तुम लोग फिर पहले की तरह कार्य करो तो मैं तुम्हारे कर्मों को देखकर विजय-पराजय का निर्णय करूंगा. ब्रह्मचारी की बात सुनकर दोनों ने कहा- ठीक है और फिर अर्जुन ने पुनः सेतु की रचना की. अबकी बार सेतु के नीचे भगवान कृष्ण जी ने अपना सुदर्शन चक्र लगा दिया.

सेतु तैयार होने पर हनुमान पुनः अपने अंगूठे के भार से उसे डूबाने लगें,जब हनुमान जी ने अबकी बार सेतु को मजबूत देखा तो पैरों, घुटनों तथा हाथों के बल से उसे दबाया, किन्तु वह जरा भी नहीं डूबा. चुप–चाप हनुमान जी ने सोचा कि पहले तो मैने अंगूठे के ही बोझ से सेतु को डुबा दिया था तो फिर यह हाथ-पैर आदि मेरे पूरे शरीर के बोझ से भी क्यों नहीं डूबता. इसमें ये ब्रह्मचारी जी ही कारण हैं. ये ब्राह्मण नहीं, बल्कि साक्षात भगवान कृष्ण हैं, और मेरे गर्व का परिहार करने के लिए ही इन्होंने ऐसा किया हैं. भला, इन भगवान के सामने हम जैसे वानर की सामर्थ्य ही क्या है.

हनुमान जी ने अर्जुन से कहा कि आपने इन ब्रह्मचारी की सहायता से मुझे परास्त कर दिया है. ये कोई ब्रह्मचारी नहीं, साक्षात भगवान कृष्ण हैं. इन्होंने सेतु के नीचे अपना सुदर्शन चक्र लगा दिया है. हे अर्जुन! हमें यह बात मालूम हो गयी है कि ये आप की सहायता के लिए ही यहां आए हैं. यही रूप धारण करके त्रेता में राम ने हमें वरदान दिया था कि द्वापर के अंत में, मैं तुम्हें कृष्ण रूप में दर्शन दूंगा. आपके सेतु के बहाने इन्होंने अपना वरदान भी आज पूरा कर दिया. हनुमान जी अर्जुन से ऐसा कह ही रहे थे कि इतने में भगवान अपने ब्राह्मण रूप को त्यागकर कृष्ण बन गये. उस समय वे पीले वस्त्र पहने थे. उन कृष्णचन्द्र जी का दर्शन करते ही हनुमान जी के रोंगटे खड़े हो गये और उन्होंने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया. फिर श्रीकृष्ण ने हनुमान जी को उठाकर अपने हृदय से लगाया.

श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार वे सेतु से निकलकर अपने स्थान को चले गए और अर्जुन का बनाया सेतु भी समुद्र की तरंगो में लुप्त हो गया. इस तरह अर्जुन का गर्व नष्ट हो गया और उन्होंने समझा कि भगवान कृष्ण ने ही उन्हें जीवित रख लिया वरना अग्नि स्नान करना पड़ता. कुछ देर बाद श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन से कहा कि तुमने राम के साथ स्पर्धा की थी जो अनुचित था. इसलिए हनुमान जी ने तुम्हारी धनुर्विद्या को व्यर्थ कर दिया था. इसी प्रकार हे पवनसुत! तुमने भी राम से स्पर्धा की थी, इसी कारण तुम अर्जुन से परास्त हुए. तुम्हारा गर्व नष्ट हो गया है. अब तुम दोनों आनन्द के साथ मेरा भजन करो. ऐसा कहकर और हनुमान जी से पूछकर श्रीकृष्ण, अर्जुन के साथ हस्तिनापुर चले गए. इसी कारण अर्जुन का नाम कपिध्वज रखा गाया.

प्रभु के नाम महिमा

पारब्रहम की जिसु मनि भूख ॥
नानक तिसहि न लागहि दूख ॥

 

एक बार वृन्दावन के मंदिर में एक संत अक्षय तृतीया के दिन “श्री बांके बिहारी” के चरणों का दर्शन कर रहे थे। दर्शन करने के साथ साथ एक भाव भी गुनगुना रहे थे कि=

“श्री बिहारी जी” के चरण कमल में नयन हमारे अटके।
नयन हमारे अटके नयन हमारे अटके।

एक व्यक्ति वहीँ पर खड़ा खड़ा ये भाव सुन रहा था। उसे ये भाव पसंद आया। और इस भाव को गुनगुनाते हुए अपने घर पहुंचा। उसकी आँखे बंद है
“श्री बिहारी” के चरण ह्रदय में है और बड़े भाव से गाये जा रहा है। लेकिन उस व्यक्ति से एक गलती हो गई।
भाव था कि”श्री बिहारी जी” के चरण कमल में नयन हमारे अटके।
लेकिन उसने गुनगुनाया “श्री बिहारी जी” के नयन कमल में “चरण” हमारे अटके।
थोड़ा उल्टा हो गया। लेकिन ये व्यक्ति बड़ा मगन होकर गाने लगा। “श्री बिहारी जी” के नयन कमल में “चरण” हमारे अटके।
अब थोड़ा सोचिये हमारे नयन “श्री बिहारी जी” के चरणों में अटकने चाहिए। हमारा ध्यान “श्री बिहारी जी” के चरणों में होना चाहिए। क्योंकि भगवान के चरण कमल बहुत ही प्यारे हैं।
लेकिन उस व्यक्ति ने इतना मगन होकर गया कि भगवान बांके बिहारी आज सब कुछ भूल गए और “श्री बिहारी जी उसके सामने प्रकट हो गए।
बांके बिहारी ने उससे मंद मंद मुस्कुराते हुए कहा – अरे भईया! मेरे एक से बढ़कर एक बड़ा भक्त है लेकिन तुझ जैसा निराला भक्त मुझे मिलना बड़ा मुश्किल है।
लोगो के नयन तो हमारे चरणों के अटक जाते है पर तुमने तो हमारे ही नयन अपने चरणों में अटका दिये।
वो व्यक्ति समझ ही नहीं पाया कि क्या हो रहा है। आज भगवान ने उसे साक्षात् दर्शन दे दिए।
फिर अपनी भूल का एहसास भी हुआ कि मैंने भगवान के नयनों को अपने चरणों में अटकने के लिए कहा। लेकिन फिर उसे समझ आया कि भगवान तो केवल भाव के भूखें है।
अगर मुझसे कोई गलती होती तो भगवान मुझे दर्शन देने ही नहीं आते। मेरे भाव पे आज भगवान रीझ गए।
ऐसा सोचकर वह भगवान के प्रेम में खूब रोया उसने साक्षात् भगवान को और भगवान की कृपा को बरसते हुए देखा। धन्य हैं ऐसे भक्त और भगवान।
भगवान के चरणों का बहुत ही महत्व है। आप भगवान के चरणों में मन को लगा दें बस। क्योंकि भगवान के चरण दुखों का हरण कर लेते हैं।
श्री हरी चरण – दुःख हरण।

पुजारी और भगवान

कई कोटि होए पूजारी ॥ कई कोटि आचार बिउहारी ॥
कई कोटि भए तीरथ वासी ॥ कई कोटि बन भ्रमहि उदासी ॥

एक बड़ी नदी के किनारे एक छोटा सा गांव था,इस गांव में हर कोई खुशी से रहते थे और गांव के मंदिर में नियमित प्रार्थना करते थे।

एक बार बारिश के मौसम में खूब बादल बरसे इतने बरसे की नदी का जलस्तर ज्यादा बढ़ गया और गांव में बाढ़ आ गई।

सभी ने अपना घर खाली करना शुरू कर दिया और सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए निकल पड़े। इसी बीच एक आदमी मंदिर में भागा, वह जल्दी से पुजारी के कमरे में गया और उसे बताया कि बाढ़ का पानी हमारे घरों में घुस गया है और यह तेजी से बढ़ रहा है और अब पानी मंदिर में प्रवेश करना शुरू कर दिया है, हमें गांव छोड़ देना चाहिए।

क्योंकि कुछ ही समय में यह मंदिर भी पानी के नीचे डूब जाएगा, सभी को सुरक्षित स्थान पर जाना होगा और आपको साथ आना होगा।

लेकिन पुजारी ने उस आदमी से कहा – जाओ तुम सब यहां से, मैं आप सभी की तरह एक नास्तिक नहीं हूं, और मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है। मुझे भगवान पर इतना भरोसा है कि वह मुझे बचाने खुद आएंगे और तब तक मैं मंदिर नहीं छोड़ूंगा! आप जा सकते हैं और इसलिए वह आदमी चला गया। जल्द ही जल स्तर बढ़ना शुरू हो गया। अब पानी कमर तक पहोच गया। पुजारी एक टेबल पर चढ़ कर उसपर खड़ा हो गया।

कुछ मिनट बाद एक नाव वाला आदमी पुजारी को बचाने आया उसने पुजारी से कहा मुझे ग्रामीणों से पता चला कि आप अभी भी मंदिर के अंदर हैं इसलिए मैं आपको बचाने आया हूं, कृपया नाव पर चढ़ जाए।लेकिन पुजारी ने उसे वही कारण बताते हुए फिर से मना कर दिया और उस आदमी को वहा से जाने के लिए बोल दिया। नाविक भी वहां से चला गया।

अब पानी इतना बढ़ गया कि पुजारी को मंदिर की चोटी पर चढ़ना पड़ा। पुजारी भगवान से प्रार्थना करता रहा कि वह उसे जल्द से जल्द बचाए!

थोड़ी ही देर बाद एक हेलीकॉप्टर आया और उन्होंने पुजारी के लिए एक रस्सी की सीढ़ी गिरा दी और उसे चढ़ने और हेलीकॉप्टर के अंदर आने के लिए कहा ताकि वे उसे सुरक्षित स्थान पर ले जा सकें।

लेकिन ढ़ीट पुजारी ने एक बार फिर जाने से इनकार कर दिया,फिर से वही कारण बताते हुए। हेलीकॉप्टर दूसरे लोगों की खोज के लिए चला गया।

जब मंदिर लगभग पानी में डूब गया तब पुजारी ने अपना सिर ऊपर आसमान की ओर घुमाया और शिकायत करना शुरू कर दिया, हे भगवान, मैंने जीवन भर आपकी पूजा की और आप पर अपना विश्वास बनाए रखा, आप क्यों नहीं आए?

अचानक भगवान एक मुस्कान के साथ प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि अरे पागल आदमी, मैं तुम्हें बचाने के लिए तीन बार आया था। मैं तुमसे सबसे पहले सुरक्षित जगह पर जाने के लिए कहने के लिए दौड़ते हुए आया था।

मैं एक नाव के साथ आया था और मैं एक हेलीकॉप्टर के साथ भी तुम्हे बचाने आया था। और अब भी तुझे मुझिसे शिकायत है? क्या यह मेरी गलती है अगर तू मुझे नहीं पहचान पाया!

पुजारी को तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने माफी मांगी, उसे एक बार फिर सुरक्षित स्थान पर जाने का मौका मिला, जिसे उसने स्वीकार किया।

क्या हम भगवान पर पक्का विश्वास करते हैं? क्या हम भगवान को पहचानते हैं? क्या हम उन संकेतों को पहचानते हैं जो हमारे लिए भेजे जाते हैं?

भगवान हमारे लिए हर समय अवसर भेजता है, जिनसे हम अनजान होते हैं।

कई बार मौके और अवसर हम समझ ही नहीं पाते। अगर आप को जीवन में आगे बढ़ने का एक अवसर भी दिखता हो तो दो बार मत सोचो, जाओ और अपना अवसर पकड़ो और जीवन के उस संकेत को पकड़ो। आपके पास पुजारी की तरह बार बार अवसर नहीं आएगा।

गलत चुनाव

तुम मात पिता हम बारिक तेरे ॥
तुमरी क्रिपा महि सूख घनेरे ॥
कोइ न जानै तुमरा अंतु ॥
ऊचे ते ऊचा भगवंत ॥

 

सबको अपनी अपनी ड्यूटी मिल गयी लेकिन माटसाब का नाम आ गया रिजर्व दल में।

रिजर्व दल वालों की हालत उस फूफा जैसी होती है जिसको सम्मान चाहिए लेकिन कोई पानी तक नहीं पूछता।

इसलिए माटसाब किस्मत को दोष दे रहे थे कि इससे अच्छा तो रनिंग में ड्यूटी आ जाती तो कम से कम दिन तो काम करते करते आराम से कट जाता।

रिजर्व दल वालों को किसी कस्बे की कोई एक सरकारी बिल्डिंग में पटक दिया जाता है और वहां से जरूरत पड़ने पर उठा लिया जाता है।
तो माटसाब के ग्रुप को भी एक पुरानी तहसील बिल्डिंग में पटक दिया जहाँ सभी टीमों के मेम्बर्स ने अपना अपना कोना पकड़ लिया।
जैसे तैसे शाम हुई सभी को खाने की चिंता सताने लग गयी क्योंकि रिजर्व पार्टी को खाने पीने की सारी व्यवस्थाएं अपने स्तर पर देखनी होती है।

माटसाब भी अपने पेट भरने के जुगाड़ में किसी होटल में गए। वहाँ 280 वाली थाली ऑर्डर की.
खाना शुरू ही किया था कि अधिकारियों का कॉल आ गया। और माटसाब को ऑर्डर दिया गया कि आपको तुरंत फलाने बूथ पर अतिरिक्त मतदान अधिकारी द्वितीय के रूप में लगाया जाता है।

माटसाब जल्दी से खाना खाकर वहां पहुंचे तो उन्हें लेने जीप आई जिसमें उनके जैसे ड्यूटी लगने वाले और भी कार्मिक थे।
माटसाब को उनके बूथ पर छोड़ दिया गया जहाँ पर उन्होंने बाकी साथियों से परिचय किया और उन्हें आश्वासन दिया कि काम मे कोई कमी नहीं आएगी।

खैर रात तो जैसे तैसे गुजर गई। अगले दिन सुबह 4 बजे उठकर मतदान की तैयारियां शुरू की।

निर्धारित समय पर मतदान शुरू हो गया। माटसाब PO2 थे इसलिए उनका काम था आने वाले मतदाता की रजिस्टर में एंट्री करना।

9 बजे के आसपास भीड़ ज्यादा ही थी इसलिए माटसाब को ऊपर देखने का टाइम ही नहीं मिल रहा था।

PO1 मतदाता का निर्वाचक नामावली में नम्बर और नाम जोर से पुकारता और माटसाब बस ID मांगते और रजिस्टर में एंट्री कर देते। चूंकि टीम में 2 PO2 थे इसलिए दूसरे को पर्ची देने और स्याही लगाने का काम दे दिया।

अचानक से माटसाब के कानो में एक परिचित सा नाम सुनाई पड़ा। उन्होंने गौर नही किया और पूर्ववत अपने काम मे लगे रहे, रजिस्टर में नम्बर एंट्री की और ID के लिए हाथ आगे बढ़ाया।

उनके हाथ मे एक आधार कार्ड आया जिसको देखकर उनके हाथ रुक गए। हालांकि उन्हें केवल उसके अंतिम 4 अंक ही लिखने थे। लेकिन उनकी नजर आधार कार्ड की फोटो पर चली गयी। फिर उन्होंने नाम पढ़ा “अरुणा” और ऊपर नजर उठाकर देखा तो देखते ही रह गए। गोद मे बच्चा लिए हुए बहुत दुबली पतली सी एक औरत सामने खड़ी थी जिसके चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी।

माटसाब के मुंह से निकला अरुणा!

माटसाब ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस लड़की से कभी जीवन मे दुबारा मुलाकात होगी।

पूरे 15 साल बीत गए थे फिर भी उसने देखते ही माटसाब को पहचान लिया।

और पहचानती भी क्यो नहीं, क्योंकि कॉलेज के दिनों में अरुणा माटसाब के साथ पढ़ती थी। माटसाब की अच्छी दोस्त थी। माटसाब उसे छोटी बहन की तरह मानते थे।

एक पल के लिए समय रुक गया और माटसाब फ्लेशबैक में चले गए जब माटसाब एक स्टूडेंट थे।

माटसाब के पास एक दिन अरुणा के पापा का फोन आया, उन्हें साहिल के बारे में पता चल गया था। और इसी सिलसिले में बात करने के लिए उन्होंने माटसाब को घर बुलाया था

दरअसल अरुणा साहिल से बहुत प्यार करती थी। और उनके रिश्ते के बारे में माटसाब को भी पता था। माटसाब अरुणा को बहुत समझाते भी थे कि ये लड़का तुम्हारे लिए ठीक नहीं है। क्योंकि साहिल छपरी लौंडा था, नशे भी करता था। लेकिन अरुणा का मानना था कि प्यार अंधा होता है। धीरे धीरे साहिल सुधर जाएगा।

कोई साहिल के लिए कुछ भी कहता तो अरुणा कहाँ किसी की सुनती…

माटसाब उनके घर पहुंचे वहां अरुणा और अरुणा के पापा पहले से बहस कर रहे थे।

दरअसल अरुणा के लिए एक रिश्ता आया था लड़का स्टेशन मास्टर था।

माटसाब ने अरुणा को समझाया कि अगर सच मे साहिल अच्छा लड़का होता तो मैं जरूर तुम्हारे पापा को समझाता

लेकिन वो साहिल के प्यार में इस कदर अंधी थी कि उसे किसी की बात समझ नहीं आती।

उसके पापा ने तो पगड़ी भी उसके पाँव में रख दी। खूब हाथ जोड़े लेकिन वो टस से मस नही हुई।

अब एक तरफ साहिल का प्यार था दूसरी तरफ उसके पापा की पगड़ी थी। एक तरफ साहिल की खुशी दूसरी तरफ उसके पिता के आँसू। साफ था कि उसे साहिल या पिता में से किसी एक को चुनना था।

माटसाब ने अरुणा से कहा कि तुम्हें किसी एक का चुनाव करना होगा और ये चुनाव तुम्हारा भविष्य तय करेगा।
इतना कहकर माटसाब वहां से चले गए।

उस दिन के बाद माटसाब ने कभी अरुणा को नहीं देखा। क्योंकि अरुणा ने साहिल को चुना। अरुणा के पिता ये सदमा नहीं सहन कर सके और उन्हें हार्ट अटैक आ गया।

अचानक से आवाज आई माटसाब थोड़ा जल्दी काम करो भीड़ बढ़ रही है। माटसाब की चेतना लौटी।

उन्होंने अरुणा को देखा और मुस्कुरा दिए।

अरुणा की आंखें पश्चाताप से झुक गयी।

उसे एहसास हो गया था कि उसका चुनाव गलत था।

माटसाब अपने काम मे बिजी हो गए।

शाम को पेटियां जमा कराने के लिए बस से जाते टाइम माटसाब सोचते रहे कि एक गलत चुनाव की वजह से अरुणा की जिंदगी पर क्या असर पड़ा…

इसलिए चुनाव कोई भी हो, उसमें दूरदर्शिता जरूरी है। किसी भी चुनाव से अपने भविष्य पर पड़ने वाले असर पर जरूर गौर करें। अपना कीमती वोट चाहे जिसे दे। पर वोट अवश्य करे। ओर देश ओर धर्म की उन्नति में सहभागी बने।

सच्‍चा गुरुभक्‍त

ब्रहम गिआनी सदा निरलेप ॥ जैसे जल महि कमल अलेप ॥
ब्रहम गिआनी सदा निरदोख ॥ जैसे सूरु सरब कउ सोख ॥

गोदावरी नदी के तट पर महात्‍मा वेदधर्मजी का आश्रम था । उनके आश्रम में अलग-अलग स्‍थानों से वेद अध्‍ययन करने के लिए विद्यार्थी आते थे । उनके शिष्‍यों में संदीपक नाम का अत्‍यंत बुद्धिमान शिष्‍य था । वह गुरुभक्‍त भी था ।

वेदों का अभ्‍यास पूर्ण होने पर उन्‍होंने अपने सभी शिष्‍यों को बुलाया और कहा कि, ‘‘मेरे प्रिय शिष्‍यों, तुम सभी गुरुभक्‍त हो इसमें कोई संदेह नहीं है । मुझसे जितना हो सका उतना ज्ञान तुम सबको मैंने दिया है । परन्‍तु अब मेरे पूर्व जन्‍म के कर्मों के कारण आगे आनेवाले समय में मुझे कोढ होगा, मैं अंधा हो जाऊंगा, मेरे शरीर में कीडे पड जायेगे, मेरे शरीर से दुर्गंध आने लगेगी । इसलिए अब मैं यह आश्रम छोडकर जानेवाला हूं और अपने इस व्‍याधिकाल को काशी में निवास कर के व्‍यतीत करूंगा । मेरा प्रारब्‍ध समाप्‍त होने तक मैं वहीं रहूंगा । तो आप सभी में से कौन-कौन मेरे साथ आने के लिए तैयार है ?’’

गुरुदेवजी की यह बात सुनकर सारे शिष्‍य स्‍तब्‍ध रह गए । तभी संदीपक आगे आया और उसने कहा कि, ‘‘हे गुरुदेवजी, मैं प्रत्‍येक स्‍थिति में, प्रत्‍येक स्‍थान पर आपके साथ रहकर आपकी सेवा करने के लिए तैयार हूं ।’’

गुरुदेवजी बोले, ‘‘देखो संदीपक, मैं अंधा हो जाऊंगा, मेरी शरीर रोग के कारण कैसा होगा । तुम्‍हें मेरे लिए अत्‍यंत कष्‍ट झेलने पडेंगे । इसलिए सोच-समझकर बताओ ।

संदीपक ने कहा, ‘‘ हे गुरुदेवजी, मैं किसी भी प्रकार का कष्‍ट सहने के लिए मैं तैयार हुं । बस आप केवल मुझे आपके साथ चलने की अनुमति दीजिए ।

दूसरे दिन गुरु वेदधर्मजी संदीपक के साथ काशी जाने के लिए निकल पडे । काशी में कंवलेश्‍वर नाम के स्‍थान पर वे दोनों रहने लगे ।

कुछ ही दिनों में गुरु वेदधर्मजी के पूरे शरीर पर कोढ उभर आया, उसमें पस पडने लगा और कीडे भी पड गए । उनको आंखों से कुछ दिखाई भी नहीं देने लगा अर्थात वह अंधे हो गए । उनका स्‍वभाव चिडचिडा और विचित्र सा हो गया । जिस प्रकार गुरुदेवजी ने काशी आने से पहले बताया था, उसी प्रकार से उनकी स्‍थिति हो गई ।

संदीपक दिनरात बहुत लगन से गुरुदेवजी की सेवा करता । उनको स्नान करवाना, शरीर पर हुए जख्‍मों को साफ करना, उनपर औषधि लगाना, कपडे पहनाना, भोजन करवाना, यह सब वह करता था । तब भी गुरुदेवजी सदैव उसी पर चिडचिड करते रहते थे; परंतु संदीपक मन लगाकर उनकी सेवा करता रहता था । उसके मन में गुरुदेवजी के प्रति कभी कोई अनुचित प्रतिक्रिया नहीं आती थी ।

ये सारी सेवाएं करते-करते संदीपक की सारी वासनाएं अर्थात इच्‍छाएं नष्‍ट हो गई । उसकी बुद्धि में एक अलौकिक ज्ञान का प्रकाश फैल गया । वह कहने लगा, अपने मनानुसार साधना करोगे तो कुछ भी हाथ नहीं लगेगा । गुरुदेवजी की बताई राह पर चलोगे तो जीवन में कहीं नहीं भटकोगे ।

इस प्रकार गुरुदेवजी की सेवा करते करते अनेक वर्ष बीत गए । संदीपक की गुरुसेवा देखकर प्रत्‍यक्ष भगवान शिव उसके सामने प्रकट हो गए । उन्‍होंने कहा, ‘‘संदीपक, लोग काशी विश्‍वनाथ का दर्शन करने के लिए आते हैं; मैं तो स्‍वयं तुम्‍हारे पास बिना बुलाए आ गया हूं । तुम अपने गुरु की सेवा अत्‍यंत श्रद्धा और भाव से करते हो, उन गुरु के हृदय में मैं सोऽहं स्‍वरूप में निवास करता हूं । अर्थात तुम्‍हारे द्वारा की गई प्रत्‍येक सेवा मुझ तक पहुंचती है । मैं तुमसे अत्‍यधिक प्रसन्‍न हूं, तुमको जो चाहिए वह वर तुम मुझसे मांग लो !’’

संदीपक ने नम्रतापूर्वक भगवान शिव से कहा कि, ‘‘हे प्रभु, आपकी प्रसन्‍नता ही मेरे लिए सबकुछ है । परन्‍तु भगवान शिवजी ने कहा कि, ‘‘ तुम्‍हें मुझसे कुछ तो मांगना ही पडेगा !’’

भगवान शिवजी के ऐसे वचन सुनकर संदीपक ने कहा कि, ‘‘हे महादेव, आप मुझपर प्रसन्‍न हो गए हैं, यह मेरा परमभाग्‍य है । परन्‍तु मैं अपने गुरुदेवजी की आज्ञा के बिना किसी से कुछ नहीं मांग सकता ।

भगवान बोले, ‘‘ ठीक है, तुम अपने गुरु से पूछकर आओ ।’’

संदीपक गुरुदेवजी के पास आया और उनसे बोला, ‘‘ हे गुरुदेवजी, आपकी कृपा से भगवान शंकर मुझपर प्रसन्‍न होकर मुझे वर देना चाहते हैं । यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं आपका कोढ और अंधत्‍व दूर होने के लिए उनसे वर मांगू ?’’

यह सुनकर गुरुदेवजी को बहुत गुस्‍सा आ गया और वह बोले, ‘‘संदीपक, लगता है कि तुम मेरी सेवा करते-करते ऊब गए हो तथा मेरी सेवा टालना चाहते हो । मेरी सेवा करके थक गए हो इसलिए भीख मांग रहे हो ? शिवजी जो देंगे उससे मेरा प्रारब्‍ध तो नहीं बदलेगा ? चले जाओ, मैंने तो तुम्‍हें पहले ही मना किया था; परंतु तुम ही जिद करके मेरे साथ चले आए, चले जाओ ।
संदीपक दौडते हुए भगवान शिवजी के पास गया और उनसे बोला ‘हे भगवन, मुझे कुछ भी नहीं चाहिए ।’, यह सुनकर भगवान शिवजी उसपर प्रसन्‍न हो गए, परन्‍तु उससे बोले, तुम अपने गुरु की इतनी सेवा करते हो; परंतु तुम्‍हारे गुरु तुम्‍हें ही इतना डांटते रहते हैं ?’’

अपने गुरुदेव की निंदा संदीपक को अच्‍छी नहीं लगी । वह बोला ‘केवल गुरुकृपा से ही शिष्‍य का भला होता है’ और उस स्‍थान को छोडकर वह गुरुदेव की सेवा करने के लिए चला गया ।

भगवान शिवजी ने यह बात भगवान श्री विष्‍णु को बताते हुए संदीपक की गुरुभक्‍ति का वर्णन किया । वह सुनकर भगवान श्री विष्‍णु ने भी संदीपक की परीक्षा ली और उसे वर मांगने के लिए कहा । संदीपक ने उनके चरण पकडकर कहा, ‘‘हे त्रिभुवन के अधिपति, गुरुकृपा से ही मुझे आपके दर्शन हुए हैं । गुरुचरणों में मेरी श्रद्धा सदैव बनी रहे और मुझसे उनकी अखंड सेवा होती रहे, यही वरदान मुझे दीजिए ।’

श्री विष्‍णु ने प्रसन्‍न होकर उसे आशीर्वाद दिया । जब महात्‍मा वेदधर्मजी को यह बात पता चली तब वह अतिप्रसन्‍न हो गए । उन्‍होंने संदीपक को गले से लगाया और आशीर्वाद देकर कहा, ‘‘वत्‍स, तुम ही मेरे सर्वश्रेष्‍ठ शिष्‍य हो । तुम्‍हें सारी सिद्धियां प्राप्‍त होंगी । ऋद्धि-सिद्धि तुम्‍हारे हृदय में निवास करेंगी । संदीपक ने कहा, ‘‘गुरुवर, आपके चरणों में ही मेरी ऋद्धि-सिद्धि हैं । आप केवल मुझे निरंतर आनंदावस्‍था में रहने का आशीर्वाद दीजिए ।’’

उसी समय महात्‍मा वेदधर्मजी का कोढ नष्‍ट हो गया । उनका शरीर पहले की तरह से कांतिमान हो गया । गुरुदेवने अपने इस प्रिय शिष्‍य के सत्‍व की परीक्षा लेकर उसे ब्रह्मविद्या का विशाल खजाना समर्पित किया ।

सच्‍चा गुरुभक्‍त कैसा होता है, यह आप के ध्‍यान में आया ना ?

साध कै संगि मुख ऊजल होत

साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥ साधसंगि मलु सगली खोत ॥
साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥ साध कै संगि प्रगटै सुगिआनु ॥
साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ॥ साधसंगि सभु होत निबेरा ॥
साध कै संगि पाए नाम रतनु ॥ साध कै संगि एक ऊपरि जतनु ॥
साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी ॥ नानक साध की सोभा प्रभ माहि समानी ॥

 

पुराने समय में एक महिला सुबह-शाम पूजा करती थी, साधु-संतों का सम्मान करती थी, लेकिन उसे मन की शांति नहीं मिल रही थी।

एक दिन उसके गांव में प्रसिद्ध संत पहुंचे। संत गांव के लोगों को प्रवचन देते थे। जीवन यापन के लिए घर-घर जाकर भिक्षा मांगते थे।

संत उस महिला के घर भिक्षा मांगने पहुंचे। महिला ने संत को खाना देते हुए कहा कि महाराज जीवन में सच्चा सुख और आनंद कैसे मिलता है? मैं सुबह-शाम पूजा करती हूं, लेकिन मेरा मन शांत नहीं है। कृपया मेरे परेशानी को दूर करें।

संत ने कहा कि इसका जवाब मैं कल दूंगा।

अगले दिन संत महिला के घर फिर आने वाले थे। इस वजह से महिला ने संत के सत्कार के लिए खीर बनाई। वह संत से सुख और आनंद का ज्ञान जानना चाहती थी। संत महिला के घर पहुंचे। उन्होंने भिक्षा के लिए महिला को आवाज लगाई। महिला खीर लेकर बाहर आई। संत ने खीर लेने के लिए अपना कमंडल आगे बढ़ा दिया।

महिला कमंडल में खीर डालने वाली थी, तभी उसकी नजर कमंडल के अंदर गंदगी पर पड़ी। उसने बोला महाराज आपका कमंडल तो गंदा है, इसमें कचरा पड़ा हुआ है।

संत ने कहा कि हां ये गंदा तो है, लेकिन आप खीर इसी में डाल दो। महिला ने कहा कि नहीं महाराज, ऐसे तो खीर खराब हो जाएगी। आप कमंडल दें, मैं इसे धोकर साफ कर देती हूं।

संत ने पूछा कि मतलब जब कमंडल साफ होगा, तभी आप इसमें खीर देंगी? महिला ने जवाब दिया कि जी महाराज इसे साफ करने के बाद ही मैं इसमें खीर दूंगी।

संत ने कहा कि ठीक इसी तरह जब तक हमारे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, बुरे विचारों की गंदगी है, तब तक उसमें ज्ञान कैसे डाल सकते हैं?

अगर ऐसे मन में उपदेश डालेंगे तो अपना असर नहीं दिखा पाएंगे। इसीलिए उपदेश सुनने से पहले हमें हमारे मन को शांत और पवित्र करना चाहिए। तभी हम ज्ञान की बातें ग्रहण कर सकते हैं। पवित्र मन वाले ही सच्चा सुख और आनंद प्राप्त कर पाते हैं।

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