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फेरि कि अगै रखीऐ जितु दिसै दरबारु ॥ मुहौ कि बोलणु बोलीऐ जितु सुणि धरे पिआरु ॥

फेरि कि अगै रखीऐ जितु दिसै दरबारु ॥ मुहौ कि बोलणु बोलीऐ जितु सुणि धरे पिआरु ॥

हे प्रभु !  फिर क्या चीज़ तेरे सामने पेश की जाए, जिससे तेरा दरबार दिखाई दे ?

हे प्रभु ! क्या बोल बोलें, जिसे सुनकर तुझे प्यार हो जाए ?

 

 

इन पंक्तियों का विश्लेषण नीचे दिए गए विभिन्न संदर्भों में:

करियर और आर्थिक स्थिरता

करियर और आर्थिक स्थिरता के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि हमारी सफलता और स्थिरता के लिए हमें ईमानदारी, मेहनत और सत्य का पालन करना चाहिए। जो कुछ भी हम करते हैं, उसे ईमानदारी और सच्चाई से करना चाहिए, जिससे परमात्मा भी प्रसन्न हों। उदाहरण के तौर पर, एक व्यक्ति जो अपने करियर में आगे बढ़ना चाहता है, उसे ईमानदारी से काम करना चाहिए और सही रास्ते पर चलना चाहिए, ताकि उसे परमात्मा की कृपा प्राप्त हो और आर्थिक स्थिरता मिले।

स्वास्थ्य और भलाई

स्वास्थ्य और भलाई के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि हमें अपने स्वास्थ्य और भलाई के लिए सही और सत्य मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। हमें अपनी जीवनशैली को स्वस्थ रखने और सही खानपान का पालन करना चाहिए, जिससे परमात्मा भी प्रसन्न हों। जैसे कि एक व्यक्ति जो नियमित रूप से योग और ध्यान करता है, और सही आहार का पालन करता है, उसे अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है और परमात्मा की कृपा मिलती है।

पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ

पारिवारिक जिम्मेदारियों के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि हमें अपने परिवार के प्रति सच्चाई और प्रेम से पेश आना चाहिए। हमें अपने परिवार की देखभाल और उन्हें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए, जिससे परमात्मा भी प्रसन्न हों। जैसे कि एक माता-पिता जो अपने बच्चों को सच्चाई और ईमानदारी का मार्ग दिखाते हैं, उन्हें परमात्मा की कृपा से अपने बच्चों की भलाई और सफलता मिलती है।

आध्यात्मिक नेतृत्व

आध्यात्मिक नेतृत्व के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि एक सच्चा आध्यात्मिक नेता वही होता है जो सत्य और प्रेम के मार्ग पर चलता है और अपने अनुयायियों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है। जैसे कि एक गुरु जो अपने शिष्यों को सच्चाई और प्रेम की शिक्षा देता है, उसे परमात्मा की कृपा से आध्यात्मिक सफलता प्राप्त होती है।

परिवार और रिश्तों की गतिशीलता

परिवार और रिश्तों की गतिशीलता के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि हमें अपने परिवार और रिश्तों में सच्चाई और प्रेम का पालन करना चाहिए। हमें अपने रिश्तों को सहेजने और मजबूत बनाने के लिए सच्चे दिल से प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक पति और पत्नी जो एक-दूसरे के प्रति सच्चे और ईमानदार हैं, उनके रिश्ते परमात्मा की कृपा से मजबूत होते हैं।

व्यक्तिगत पहचान और विकास

व्यक्तिगत पहचान और विकास के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि हमारी पहचान और विकास के लिए हमें सत्य और प्रेम का पालन करना चाहिए। हमें अपने जीवन के हर पहलू में सच्चाई और ईमानदारी का पालन करना चाहिए, जिससे परमात्मा प्रसन्न हों। जैसे कि एक व्यक्ति जो अपने व्यक्तित्व को निखारने के लिए सच्चाई और प्रेम का पालन करता है, उसे परमात्मा की कृपा से व्यक्तिगत विकास और पहचान मिलती है।

स्वास्थ्य और सुरक्षा

स्वास्थ्य और सुरक्षा के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि हमें अपने स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए सत्य और प्रेम का पालन करना चाहिए। हमें अपने जीवन में सही मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, जिससे हमें परमात्मा की कृपा से स्वास्थ्य और सुरक्षा मिलती है। जैसे कि एक व्यक्ति जो सही खानपान और जीवनशैली का पालन करता है, उसे परमात्मा की कृपा से स्वास्थ्य और सुरक्षा प्राप्त होती है।

विभिन्न भूमिकाओं का संतुलन

विभिन्न भूमिकाओं का संतुलन बनाए रखते हुए, यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि हमें अपने जीवन की विभिन्न भूमिकाओं में संतुलन बनाए रखने के लिए सत्य और प्रेम का पालन करना चाहिए। जैसे कि एक महिला जो एक ही समय में एक माँ, पत्नी, और कर्मचारी की भूमिका निभाती है, उसे परमात्मा की कृपा से सभी भूमिकाओं में संतुलन मिलता है और वह सभी को अच्छे से निभा पाती है।

मासूमियत और सीखना

मासूमियत और सीखने के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि बच्चों की मासूमियत और उनकी सीखने की प्रक्रिया भी सत्य और प्रेम से ही होती है। हमें बच्चों को सही मार्गदर्शन देना चाहिए और उनकी शिक्षा का ध्यान रखना चाहिए। जैसे कि माता-पिता जो अपने बच्चों को सिखाते हैं और उनकी मासूमियत को संजोते हैं, वे परमात्मा की कृपा से उन्हें सही मार्ग दिखाते हैं।

पारिवारिक और पर्यावरणीय प्रभाव

पारिवारिक और पर्यावरणीय प्रभाव के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि हमारे परिवार और पर्यावरण का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव होता है, और यह सब सत्य और प्रेम के पालन से ही होता है। हमें अपने परिवार और पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए और उन्हें सकारात्मक बनाना चाहिए। जैसे कि एक परिवार जो एक-दूसरे का सहयोग करता है और एक स्वस्थ पर्यावरण में रहता है, वह परमात्मा की कृपा से खुशहाल होता है।

दोस्ती और सामाजिक स्वीकृति

दोस्ती और सामाजिक स्वीकृति के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि हमारी दोस्ती और समाज में स्वीकृति भी सत्य और प्रेम से ही होती है। हमें सच्चे मित्र बनाने और समाज में सम्मान प्राप्त करने के लिए सही मार्ग पर चलना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो ईमानदारी और सच्चाई से मित्रता करता है, उसे परमात्मा की कृपा से सच्चे मित्र और समाज में सम्मान प्राप्त होता है।

बौद्धिक संदेह

बौद्धिक संदेह के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि हमारे बौद्धिक संदेह और उनकी जांच भी सत्य और प्रेम से ही होती है। हमें हमेशा सच्चाई की खोज में रहना चाहिए और अपने संदेहों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक वैज्ञानिक जो नए-नए अनुसंधान करता है और अपने संदेहों का समाधान खोजता है, उसे परमात्मा की कृपा से नए ज्ञान की प्राप्ति होती है।

भावनात्मक उथल-पुथल

भावनात्मक उथल-पुथल के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि हमारी भावनाएँ भी सत्य और प्रेम से ही चलती हैं। हमें अपनी भावनाओं को समझने और उन्हें संभालने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना करता है, उसे अपनी भावनाओं को संभालने और उनसे उबरने के लिए परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान

सांस्कृतिक आदान-प्रदान के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि विभिन्न संस्कृतियों का आदान-प्रदान भी सत्य और प्रेम से ही होता है। हमें विभिन्न संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए और उनसे सीखना चाहिए। जैसे कि विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ मेलजोल बढ़ाने से हमें उनकी संस्कृति और परंपराओं के बारे में जानने का मौका मिलता है और हम परमात्मा की कृपा से उनका सम्मान करना सीखते हैं।

रिश्तों का प्रभाव

रिश्तों का प्रभाव के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि हमारे रिश्ते भी सत्य और प्रेम से ही चलते हैं। हमें अपने रिश्तों को सहेजने और मजबूत बनाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक पति और पत्नी जो एक-दूसरे का सम्मान और सहयोग करते हैं, उनके रिश्ते परमात्मा की कृपा से मजबूत होते हैं।

सत्य की खोज

सत्य की खोज के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि सत्य की खोज भी सत्य और प्रेम से ही होती है। हमें हमेशा सच्चाई की तलाश में रहना चाहिए और अपने जीवन में सत्य को अपनाना चाहिए। जैसे कि एक साधु जो हमेशा सत्य की खोज में रहता है और अपने ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करता है, उसे परमात्मा की कृपा से सत्य की प्राप्ति होती है।

धार्मिक संस्थानों से निराशा

धार्मिक संस्थानों से निराशा के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि भले ही धार्मिक संस्थानों में निराशा मिलती हो, हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए। हमें परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए और सच्चाई के मार्ग पर चलते रहना चाहिए। जैसे कि अगर हमें किसी धार्मिक संस्थान से निराशा मिलती है, तो हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

व्यक्तिगत पीड़ा

व्यक्तिगत पीड़ा के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि हमारी पीड़ा भी सत्य और प्रेम से ही होती है। हमें अपनी पीड़ा से उबरने और उससे सीखने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो जीवन में कठिनाइयों का सामना करता है, उसे अपनी पीड़ा से उबरने और उससे मजबूत बनने के लिए परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

अनुभवजन्य अन्याय

अनुभवजन्य अन्याय के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि हमें अन्याय का सामना करते समय भी अपने सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए। हमें अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहिए और न्याय की प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए। जैसे कि अगर हमें जीवन में अन्याय का सामना करना पड़ता है, तो हमें अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर कायम रहना चाहिए और न्याय के लिए प्रयास करना चाहिए।

दार्शनिक अन्वेषण

दार्शनिक अन्वेषण के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि हमारे दार्शनिक विचार और अन्वेषण भी सत्य और प्रेम से ही होते हैं। हमें हमेशा नए-नए प्रश्नों की तलाश में रहना चाहिए और उनके उत्तर खोजने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक दार्शनिक जो जीवन के अर्थ और उद्देश्य की खोज में रहता है, उसे परमात्मा की कृपा से नए-नए विचारों और उत्तरों की प्राप्ति होती है।

विज्ञान और तर्क

विज्ञान और तर्क के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि हमारे वैज्ञानिक अनुसंधान और तर्क भी सत्य और प्रेम से ही चलते हैं। हमें हमेशा नए-नए अनुसंधान और खोज में लगे रहना चाहिए और अपने ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक वैज्ञानिक जो नए-नए अनुसंधान करता है और अपने तर्कों का परीक्षण करता है, उसे परमात्मा की कृपा से नए ज्ञान की प्राप्ति होती है।

धार्मिक घोटाले

धार्मिक घोटालों के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि हमें सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलना चाहिए, भले ही धार्मिक संस्थानों में घोटाले हों। हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए। जैसे कि अगर हमें किसी धार्मिक संस्थान से निराशा मिलती है, तो हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं होना

अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं होने के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि हमें अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं रखनी चाहिए, भले ही हमें उम्मीदों के अनुरूप परिणाम न मिलें। हमें निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो अपने काम में सफलता नहीं मिलती, तो उसे निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

सामाजिक दबाव

सामाजिक दबाव के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ संकेत करती हैं कि हमें सामाजिक दबाव के बावजूद अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर कायम रहना चाहिए। हमें अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। जैसे कि अगर समाज हमें किसी गलत काम के लिए मजबूर करता है, तो हमें अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए और सही मार्ग पर चलना चाहिए।

व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास

व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि हमारे व्यक्तिगत विश्वास और आत्म-विश्वास में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। हमें अपने आत्म-विश्वास को बनाए रखना चाहिए और कठिनाइयों का सामना करने के लिए प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो कठिनाइयों का सामना करता है, उसे अपने आत्म-विश्वास को बनाए रखना चाहिए और उनसे उबरने का प्रयास करना चाहिए।

जीवन के परिवर्तन

जीवन के परिवर्तन के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ बताती हैं कि जीवन में परिवर्तन निरंतर होते रहते हैं और हमें उन्हें स्वीकार करके आगे बढ़ना चाहिए। हमें जीवन के नए परिस्थितियों को स्वीकार करके अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो नई स्थिति का सामना करता है, उसे स्वीकार करके अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए।

अस्तित्व संबंधी प्रश्न

अस्तित्व संबंधी प्रश्नों के संदर्भ में, यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि जीवन और अस्तित्व के प्रश्न अनंत हैं, और हमें हमेशा उनकी खोज में लगे रहना चाहिए। हमें नए-नए प्रश्नों का सामना करना चाहिए और उनके उत्तर खोजने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक दार्शनिक जो जीवन के अर्थ और उद्देश्य की खोज में रहता है, उसे नए-नए प्रश्नों का सामना करना पड़ता है और उनके उत्तर खोजने का प्रयास करना चाहिए।

इन पंक्तियों का सार यह है कि परमात्मा का हुक्म ही सभी चीजों का संचालन करता है और हमें इसे स्वीकार करके और इस पर विश्वास करके अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहिए। चाहे किसी भी संदर्भ में इसे देखें, हमें हमेशा सकारात्मक बने रहना चाहिए और निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।

मायके आयी बेटी

कुलहां देंदे बावले लैंदे वडे निलज ॥
चूहा खड न मावई तिकलि बंन्है छज ॥

विवाह के बाद पहली बार मायके आयी बेटी का स्वागत सप्ताह भर चला
सप्ताह भर बेटी को जो पसन्द है, वही सब किया गया।वापिस ससुराल जाते समय पिता ने बेटी को एक अति सुगंधित अगरबत्ती का पुडा दिया और कहा की-बेटी, तुम जब ससुराल में पूजा करने जाओगी,तब यह अगरबत्ती जरूर जलाना

माँ ने कहा-
बिटिया प्रथम बार मायके से ससुराल जारही है,तो भला कोई अगरबत्ती जैसी चीज देता है?
पिता ने झट से जेब मे हाथ डाला और जेब मे जितने भी रुपये थे,वो सब बेटी को दे दिए

ससुराल में पहुंचते ही सासु माँ ने बहु के माता-पिता ने बेटी को बिदाई में क्या दिया,यह देखा तो वह अगरबत्ती का पुडा भी दिखा। सासु माँ ने मुंह बना कर बहु को बोला कि-कल पूजा में यह अगरबत्ती लगा लेना

सुबह जब बेटी पूजा करने बैठी, अगरबत्ती का पुडा खोला तो उसमे से एक चिट्ठी निकली

लिखा था…

“बेटा यह अगरबत्ती स्वतः जलती है,मगर संपूर्ण घर को सुगंधित कर देती है।इतना ही नही, आजू-बाजू के पूरे वातावरण को भी अपनी महक से सुगंधित एवम प्रफुल्लित कर देती है…!!

हो सकता है की तुम कभी पति से कुछ समय के लिए रुठ जाओगी या कभी अपने सास-ससुरजी से नाराज हो जाओगी,कभी देवर या ननद से भी रूठोगी, कभी तुम्हे किसी से बाते सुननी भी पड़ जाए, या फिर कभी अडोस-पड़ोसियों के वर्तन पर तुम्हारा दिल खट्टा हो जाये, तब तुम मेरी यह भेंट ध्यान में रखना

अगरबत्ती की तरह जलना, जैसे अगरबत्ती स्वयं जलते हुए पूरे घर और सम्पूर्ण परिसर को सुगंधित और प्रफुल्लित कर ऊर्जा से भरती है, ठीक उसी तरह तुम स्वतः सहन करते हुए ससुराल को अपना मायका समझ कर सब को अपने व्यवहार और कर्म से सुगंधित और प्रफुल्लित करना…

बेटी चिट्ठी पढ़कर फफक कर रोने लगी,सासू मां लपककर आयी, पति और ससुरजी भी पूजा घर मे पहुंचे जहां बहु रो रही थी।

“अरे हाथ को चटका लग गया क्या?, ऐसा पति ने पूछा।

“क्या हुआ यह तो बताओ, ससुरजी बोले।

सासु माँ आजु बाजु के सामान में कुछ है,क्या यह देखने लगी

तो उन्हें पिता द्वारा सुंदर अक्षरों में लिखी हुई चिठ्ठी नजर आयी, चिट्ठी पढ़ते ही उन्होंने बहु को गले से लगा लिया और चिट्ठी ससुरजी के हाथों में दी।चश्मा ना पहने होने की वजह से चिट्ठी बेटे को देकर पढ़ने के लिए कहा।

सारी बात समझते ही संपूर्ण घर स्तब्ध हो गया।

“सासु माँ बोली अरे, यह चिठ्ठी फ्रेम करानी है।यह मेरी बहु को मिली हुई सबसे अनमोल भेंट है, पूजा घर के बाजू में में ही इसकी फ्रेम होनी चाहिए,

और फिर सदैव वह फ्रेम अपने शब्दों से, सम्पूर्ण घर, और अगल-बगल के वातावरण को अपने अर्थ से महकाती रही, अगरबत्ती का पुडा खत्म होने के बावजूद भी…

क्या आप भी ऐसे संस्कार अपनी बेटी को देना चाहेंगे

साचा साहिबु साचु नाइ भाखिआ भाउ अपारु ॥ आखहि मंगहि देहि देहि दाति करे दातारु ॥

साचा साहिबु साचु नाइ भाखिआ भाउ अपारु ॥ आखहि मंगहि देहि देहि दाति करे दातारु ॥

सच्चा परमात्मा और उसका नाम सत्य है, और अपार प्रेम के साथ उसकी महिमा की जाती है। लोग उससे मांगते रहते हैं, “दे दो, दे दो,” और वह दाता अपनी कृपा से सबको देता रहता है।

इन पंक्तियों का विश्लेषण नीचे दिए गए विभिन्न संदर्भों में:

करियर और आर्थिक स्थिरता

करियर और आर्थिक स्थिरता के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि परमात्मा का नाम सच्चा है और अगर हम सच्चे मन से परमात्मा की भक्ति करते हैं, तो वह हमारी आवश्यकताओं को पूरा करता है। उदाहरण के तौर पर, एक व्यक्ति जो अपने करियर में आगे बढ़ना चाहता है और ईमानदारी से काम करता है, उसे परमात्मा की कृपा से आर्थिक स्थिरता मिलती है। जैसे एक कर्मचारी जो सच्चे दिल से मेहनत करता है और परमात्मा पर विश्वास रखता है, उसे तरक्की और स्थिरता प्राप्त होती है।

स्वास्थ्य और भलाई

स्वास्थ्य और भलाई के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि अगर हम परमात्मा के नाम की महिमा करते हैं और सच्चे दिल से उसकी भक्ति करते हैं, तो वह हमें स्वास्थ्य और भलाई प्रदान करता है। जैसे कि एक व्यक्ति जो नियमित रूप से प्रार्थना करता है और अपनी भलाई के लिए परमात्मा से प्रार्थना करता है, उसे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।

पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ

पारिवारिक जिम्मेदारियों के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि अगर हम सच्चे दिल से परमात्मा की भक्ति करते हैं और अपने परिवार के लिए प्रार्थना करते हैं, तो परमात्मा हमारी पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में मदद करता है। जैसे कि एक माता-पिता जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते हैं, उन्हें परमात्मा की कृपा से अपने बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए आवश्यक संसाधन मिलते हैं।

आध्यात्मिक नेतृत्व

आध्यात्मिक नेतृत्व के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि सच्चा आध्यात्मिक नेता वह है जो सच्चे दिल से परमात्मा की भक्ति करता है और अपने अनुयायियों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है। जैसे कि एक गुरु जो अपने शिष्यों को सच्चाई और ईमानदारी का मार्ग दिखाता है, उसे परमात्मा की कृपा से उनके लिए सही मार्गदर्शन करने की शक्ति मिलती है।

परिवार और रिश्तों की गतिशीलता

परिवार और रिश्तों की गतिशीलता के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि सच्चे दिल से परमात्मा की भक्ति करने से हमारे पारिवारिक रिश्ते मजबूत होते हैं और उनमें प्रेम और सामंजस्य बना रहता है। जैसे कि एक पति और पत्नी जो नियमित रूप से परमात्मा की पूजा करते हैं, उनके बीच का प्रेम और समझदारी बढ़ती है और उनका परिवार खुशहाल रहता है।

व्यक्तिगत पहचान और विकास

व्यक्तिगत पहचान और विकास के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि अगर हम सच्चे दिल से परमात्मा की भक्ति करते हैं, तो वह हमें व्यक्तिगत पहचान और विकास की दिशा में मार्गदर्शन करता है। जैसे कि एक व्यक्ति जो आत्म-विकास के लिए प्रयास करता है और परमात्मा पर विश्वास रखता है, उसे अपने जीवन में सही दिशा और पहचान मिलती है।

स्वास्थ्य और सुरक्षा

स्वास्थ्य और सुरक्षा के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि सच्चे दिल से परमात्मा की भक्ति करने से हमें स्वास्थ्य और सुरक्षा प्राप्त होती है। जैसे कि एक व्यक्ति जो नियमित रूप से परमात्मा से अपने स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करता है, उसे परमात्मा की कृपा से शारीरिक और मानसिक सुरक्षा मिलती है।

विभिन्न भूमिकाओं का संतुलन

विभिन्न भूमिकाओं का संतुलन बनाए रखते हुए, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि सच्चे दिल से परमात्मा की भक्ति करने से हम अपने जीवन की विभिन्न भूमिकाओं में संतुलन बना सकते हैं। जैसे कि एक महिला जो एक ही समय में एक माँ, पत्नी, और कर्मचारी की भूमिका निभाती है, उसे परमात्मा की कृपा से संतुलन मिलता है और वह सभी भूमिकाओं को अच्छे से निभा पाती है।

मासूमियत और सीखना

मासूमियत और सीखने के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि बच्चों की मासूमियत और उनकी सीखने की प्रक्रिया भी परमात्मा की कृपा से होती है। हमें बच्चों को सही मार्गदर्शन देना चाहिए और उनकी शिक्षा का ध्यान रखना चाहिए। जैसे कि माता-पिता जो अपने बच्चों को सिखाते हैं और उनकी मासूमियत को संजोते हैं, वे परमात्मा की कृपा से उन्हें सही मार्ग दिखाते हैं।

पारिवारिक और पर्यावरणीय प्रभाव

पारिवारिक और पर्यावरणीय प्रभाव के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे परिवार और पर्यावरण का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव होता है, और यह सब परमात्मा की कृपा से ही होता है। हमें अपने परिवार और पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए और उन्हें सकारात्मक बनाना चाहिए। जैसे कि एक परिवार जो एक-दूसरे का सहयोग करता है और एक स्वस्थ पर्यावरण में रहता है, वह परमात्मा की कृपा से खुशहाल होता है।

दोस्ती और सामाजिक स्वीकृति

दोस्ती और सामाजिक स्वीकृति के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि हमारी दोस्ती और समाज में स्वीकृति भी परमात्मा की कृपा से होती है। हमें सच्चे मित्र बनाने और समाज में सम्मान प्राप्त करने के लिए सही मार्ग पर चलना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो ईमानदारी और सच्चाई से मित्रता करता है, उसे परमात्मा की कृपा से सच्चे मित्र और समाज में सम्मान प्राप्त होता है।

बौद्धिक संदेह

बौद्धिक संदेह के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे बौद्धिक संदेह और उनकी जांच भी परमात्मा की कृपा से होती है। हमें हमेशा सच्चाई की खोज में रहना चाहिए और अपने संदेहों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक वैज्ञानिक जो नए-नए अनुसंधान करता है और अपने संदेहों का समाधान खोजता है, उसे परमात्मा की कृपा से नए ज्ञान की प्राप्ति होती है।

भावनात्मक उथल-पुथल

भावनात्मक उथल-पुथल के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि हमारी भावनाएँ भी परमात्मा की कृपा से चलती हैं। हमें अपनी भावनाओं को समझने और उन्हें संभालने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना करता है, उसे अपनी भावनाओं को संभालने और उनसे उबरने के लिए परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान

सांस्कृतिक आदान-प्रदान के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि विभिन्न संस्कृतियों का आदान-प्रदान भी परमात्मा की कृपा से होता है। हमें विभिन्न संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए और उनसे सीखना चाहिए। जैसे कि विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ मेलजोल बढ़ाने से हमें उनकी संस्कृति और परंपराओं के बारे में जानने का मौका मिलता है और हम परमात्मा की कृपा से उनका सम्मान करना सीखते हैं।

रिश्तों का प्रभाव

रिश्तों का प्रभाव के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे रिश्ते भी परमात्मा की कृपा से चलते हैं। हमें अपने रिश्तों को सहेजने और मजबूत बनाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक पति और पत्नी जो एक-दूसरे का सम्मान और सहयोग करते हैं, उनके रिश्ते परमात्मा की कृपा से मजबूत होते हैं।

सत्य की खोज

सत्य की खोज के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि सत्य की खोज भी परमात्मा की कृपा से होती है। हमें हमेशा सच्चाई की तलाश में रहना चाहिए और अपने जीवन में सत्य को अपनाना चाहिए। जैसे कि एक साधु जो हमेशा सत्य की खोज में रहता है और अपने ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करता है, उसे परमात्मा की कृपा से सत्य की प्राप्ति होती है।

धार्मिक संस्थानों से निराशा

धार्मिक संस्थानों से निराशा के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि भले ही धार्मिक संस्थानों में निराशा मिलती हो, हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए। हमें परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए और सच्चाई के मार्ग पर चलते रहना चाहिए। जैसे कि अगर हमें किसी धार्मिक संस्थान से निराशा मिलती है, तो हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

व्यक्तिगत पीड़ा

व्यक्तिगत पीड़ा के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि हमारी पीड़ा भी परमात्मा की कृपा से होती है। हमें अपनी पीड़ा से उबरने और उससे सीखने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो जीवन में कठिनाइयों का सामना करता है, उसे अपनी पीड़ा से उबरने और उससे मजबूत बनने के लिए परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

अनुभवजन्य अन्याय

अनुभवजन्य अन्याय के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमें अन्याय का सामना करते समय भी अपने सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए। हमें अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहिए और न्याय की प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए। जैसे कि अगर हमें जीवन में अन्याय का सामना करना पड़ता है, तो हमें अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर कायम रहना चाहिए और न्याय के लिए प्रयास करना चाहिए।

दार्शनिक अन्वेषण

दार्शनिक अन्वेषण के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि हमारे दार्शनिक विचार और अन्वेषण भी परमात्मा की कृपा से होते हैं। हमें हमेशा नए-नए प्रश्नों की तलाश में रहना चाहिए और उनके उत्तर खोजने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक दार्शनिक जो जीवन के अर्थ और उद्देश्य की खोज में रहता है, उसे परमात्मा की कृपा से नए-नए विचारों और उत्तरों की प्राप्ति होती है।

विज्ञान और तर्क

विज्ञान और तर्क के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे वैज्ञानिक अनुसंधान और तर्क भी परमात्मा की कृपा से चलते हैं। हमें हमेशा नए-नए अनुसंधान और खोज में लगे रहना चाहिए और अपने ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक वैज्ञानिक जो नए-नए अनुसंधान करता है और अपने तर्कों का परीक्षण करता है, उसे परमात्मा की कृपा से नए ज्ञान की प्राप्ति होती है।

धार्मिक घोटाले

धार्मिक घोटालों के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि हमें सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलना चाहिए, भले ही धार्मिक संस्थानों में घोटाले हों। हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए और परमात्मा के हुक्म को मानकर चलना चाहिए। जैसे कि अगर हमें किसी धार्मिक संस्थान से निराशा मिलती है, तो हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं होना

अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं होने के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमें अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं रखनी चाहिए, भले ही हमें उम्मीदों के अनुरूप परिणाम न मिलें। हमें निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो अपने काम में सफलता नहीं मिलती, तो उसे निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

सामाजिक दबाव

सामाजिक दबाव के संदर्भ में, यह पंक्ति संकेत करती है कि हमें सामाजिक दबाव के बावजूद अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर कायम रहना चाहिए। हमें अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। जैसे कि अगर समाज हमें किसी गलत काम के लिए मजबूर करता है, तो हमें अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए और सही मार्ग पर चलना चाहिए।

व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास

व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि हमारे व्यक्तिगत विश्वास और आत्म-विश्वास में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। हमें अपने आत्म-विश्वास को बनाए रखना चाहिए और कठिनाइयों का सामना करने के लिए प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो कठिनाइयों का सामना करता है, उसे अपने आत्म-विश्वास को बनाए रखना चाहिए और उनसे उबरने का प्रयास करना चाहिए।

जीवन के परिवर्तन

जीवन के परिवर्तन के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि जीवन में परिवर्तन निरंतर होते रहते हैं और हमें उन्हें स्वीकार करके आगे बढ़ना चाहिए। हमें जीवन के नए परिस्थितियों को स्वीकार करके अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो नई स्थिति का सामना करता है, उसे स्वीकार करके अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए।

अस्तित्व संबंधी प्रश्न

अस्तित्व संबंधी प्रश्नों के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि जीवन और अस्तित्व के प्रश्न अनंत हैं, और हमें हमेशा उनकी खोज में लगे रहना चाहिए। हमें नए-नए प्रश्नों का सामना करना चाहिए और उनके उत्तर खोजने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक दार्शनिक जो जीवन के अर्थ और उद्देश्य की खोज में रहता है, उसे नए-नए प्रश्नों का सामना करना पड़ता है और उनके उत्तर खोजने का प्रयास करना चाहिए।

इन पंक्तियों का सार यह है कि परमात्मा का हुक्म ही सभी चीजों का संचालन करता है और हमें इसे स्वीकार करके और इस पर विश्वास करके अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहिए। चाहे किसी भी संदर्भ में इसे देखें, हमें हमेशा सकारात्मक बने रहना चाहिए और निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।

लव यु आल

सचा अलख अभेउ हठि न पतीजई ॥
इकि गावहि राग परीआ रागि न भीजई ॥

एक प्राथमिक स्कूल मे अंजलि नाम की एक शिक्षिका थीं वह कक्षा 5 की क्लास टीचर थी, उसकी एक आदत थी कि वह कक्षा मे आते ही हमेशा “लव यु आल” बोला करतीं थी।

मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं बोल रही ।

वह कक्षा के सभी बच्चों से एक जैसा प्यार नहीं करती थीं।

कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो उनको फटी आंख भी नहीं भाता था। उसका नाम राजू था। राजू मैली कुचेली स्थिति में स्कूल आ जाया करता है। उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मेल के निशान । पढ़ाई के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता था।

मेडम के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखता, मगर उसकी खाली खाली नज़रों से साफ पता लगता रहता.कि राजू शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब हे यानी (प्रजेंट बाडी अफसेटं माइड) .धीरे धीरे मेडम को राजू से नफरत सी होने लगी। क्लास में घुसते ही राजू मेडम की आलोचना का निशाना बनने लगता। सब बुराई उदाहरण राजू के नाम पर किये जाते. बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते.और मेडम उसको अपमानित कर के संतोष प्राप्त करतीं।

राजू ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया था।

मेडम को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता जिसके अंदर आत्मा नाम की कोई चीज नहीं थी। प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी भावनाओं से खाली नज़रों से उन्हें देखा करता और सिर झुका लेता। मेडम को अब इससे गंभीर नफरत हो चुकी थी।

पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और प्रोग्रेस रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो मेडम ने राजू की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी । प्रगति रिपोर्ट माता पिता को दिखाने से पहले हेड मास्टर के पास जाया करती थी। उन्होंने जब राजू की प्रोग्रेस रिपोर्ट देखी तो मेडम को बुला लिया। “मेडम प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो राजू की प्रगति भी लिखनी चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे राजू के पिता इससे बिल्कुल निराश हो जाएंगे।” मेडम ने कहा “मैं माफी माँगती हूँ, लेकिन राजू एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है । मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ लिख सकती हूँ। “मेडम घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ कर चली गई स्कूल की छुट्टी हो गई आज तो ।

अगले दिन हेड मास्टर ने एक विचार किया ओर उन्होंने चपरासी के हाथ मेडम की डेस्क पर राजू की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी । अगले दिन मेडम ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी। पलट कर देखा तो पता लगा कि यह राजू की रिपोर्ट हैं। ” मेडम ने सोचा कि पिछली कक्षाओं में भी राजू ने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे।” उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली। रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है। “राजू जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा।” “बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षक से बेहद लगाव रखता है।” ”

यह लिखा था
अंतिम सेमेस्टर में भी राजू ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। “मेडम ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली।” राजू ने अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव लिया। .उसका ध्यान पढ़ाई से हट रहा है। “” राजू की माँ को अंतिम चरण का कैंसर हुआ है। । घर पर उसका और कोई ध्यान रखनेवाला नहीं है.जिसका गहरा प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ा है। “” लिखा था

निचे हेड मास्टर ने लिखा कि राजू की माँ मर चुकी है और इसके साथ ही राजू के जीवन की चमक और रौनक भी। । उसे बचाना होगा…इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। ” यह पढ़कर मेडम के दिमाग पर भयानक बोझ हावी हो गया। कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । मेडम की आखो से आंसू एक के बाद एक गिरने लगे. मेडम ने साङी से अपने आंसू पोछे

अगले दिन जब मेडम कक्षा में दाख़िल हुईं तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश “आई लव यू ऑल” दोहराया।

मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं। क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे बालों वाले बच्चे राजू के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं..वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से अधिक था ।

पढ़ाई के दौरान उन्होंने रोजाना दिनचर्या की तरह एक सवाल राजू पर दागा और हमेशा की तरह राजू ने सिर झुका लिया। जब कुछ देर तक मेडम से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हंसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी तो उसने अचंभे में सिर उठाकर मेडम की ओर देखा। अप्रत्याशित उनके माथे पर आज बल न थे, वह मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने राजू को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर जबरन दोहराने के लिए कहा। राजू तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत:बोल ही पड़ा। इसके जवाब देते ही मेडम ने न सिर्फ खुद खुशान्दाज़ होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी बच्चो से भी बजवायी..

फिर तो यह दिनचर्या बन गयी।मेडम हर सवाल का जवाब अपने आप बताती और फिर उसकी खूब सराहना तारीफ करतीं। प्रत्येक अच्छा उदाहरण राजू के कारण दिया जाने लगा । धीरे-धीरे पुराना राजू सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आ गया। अब मेडम को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिना त्रुटि उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नये नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी करता ।

उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था। देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और राजू ने दूसरा स्थान हासिल कर कक्षा 5 वी पास कर लिया यानी अब दुसरी जगह स्कूल मे दाखिले के लिए तैयार था।

कक्षा 5 वी के विदाई समारोह में सभी बच्चे मेडम के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और मेडम की टेबल पर ढेर लग गया । इन खूबसूरती से पैक हुए उपहारो में एक पुराने अखबार में बदतर सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था। बच्चे उसे देखकर हंस रहे थे । किसी को जानने में देर न लगी कि यह उपहार राजू लाया होगा। मेडम ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर राजू वाले उपहार को निकाला। खोलकर देखा तो उसके अंदर एक महिलाओं द्वारा इस्तेमाल करने वाली इत्र की आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक बड़ा सा कड़ा कंगन था जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे। मिस ने चुपचाप इस इत्र को खुद पर छिड़का और हाथ में कंगन पहन लिया। बच्चे यह दृश्य देखकर सब हैरान रह गए। खुद राजू भी। आखिर राजू से रहा न गया और मिस के पास आकर खड़ा हो गया। ।

कुछ देर बाद उसने अटक अटक कर मेडम को बोला “आज आप में से मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है।” इतना सुनकर मेडम के आखो मे आसू आ गये ओर मेडम ने राजू को अपने गले से लगा लिया

राजू अब दुसरी स्कूल मे जाने वाला था

राजू ने दुसरी जगह स्कूल मे दाखिले ले लिया था

समय बितने लगा।

दिन सप्ताह,

सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है?

मगर हर साल के अंत में मेडम को राजू से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता जिसमें लिखा होता कि “इस साल कई नए टीचर्स से मिला।। मगर आप जैसा मेडम कोई नहीं था।”

फिर राजू की पढ़ाई समाप्त हो गया और पत्रों का सिलसिला भी सम्माप्त । कई साल आगे गुज़रे और मेडम रिटायर हो गईं।

एक दिन मेडम के घर अपनी मेल में राजू का पत्र मिला जिसमें लिखा था:

“इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपके बिना शादी की बात मैं नहीं सोच सकता। एक और बात .. मैं जीवन में बहुत सारे लोगों से मिल चुका हूं।। आप जैसा कोई नहीं है………आपका डॉक्टर राजू

पत्र मे साथ ही विमान का आने जाने का टिकट भी लिफाफे में मौजूद था।

मेडम खुद को हरगिज़ न रोक सकी। उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह राजू के शहर के लिए रवाना हो गईं। शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं।

उन्हें लगा समारोह समाप्त हो चुका होगा.. मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि शहर के बड़े डॉक्टर , बिजनेसमैन और यहां तक कि वहां पर शादी कराने वाले पंडितजी भी थक गये थे. कि आखिर कौन आना बाकी है…मगर राजू समारोह में शादी के मंडप के बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने का इंतजार कर रहा था। फिर सबने देखा कि जैसे ही एक बुड्ढी ओरत ने गेट से प्रवेश किया राजू उनकी ओर लपका और उनका वह हाथ पकड़ा जिसमें उन्होंने अब तक वह कड़ा पहना हुआ था कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा मंच पर ले गया।

राजू ने माइक हाथ में पकड़ कर कुछ यूं बोला “दोस्तों आप सभी हमेशा मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको उनसे मिलाउंगा।।।……..

ध्यान से देखो यह यह मेरी प्यारी सी मां दुनिया की सबसे अच्छी है यह मेरी मां यह मेरी माँ हैं –

!! प्रिय दोस्तों…. इस सुंदर कहानी को सिर्फ शिक्षक और शिष्य के रिश्ते के कारण ही मत सोचिएगा । अपने आसपास देखें, राजू जैसे कई फूल मुरझा रहे हैं जिन्हें आप का जरा सा ध्यान, प्यार और स्नेह नया जीवन दे सकता है……..

हुकमी हुकमु चलाए राहु ॥ नानक विगसै वेपरवाहु ॥

हुकमी हुकमु चलाए राहु ॥ नानक विगसै वेपरवाहु ॥

हुक्म वाले रब का हुक्म ही , संसार की गाड़ी वाला रास्ता चला रहा है। हे नानक! वह निरंकार सदा बेपरवाह है, प्रसंन्न है।
(भाव, हलांकि, ईश्वर हर वक्त संसार के बेअंत जीवों को अटूट पदार्थ व रिज़क दे रहा है, पर इतने बड़े कार्य में उसे कोई घबराहट/परेशानी नहीं हो रही। वह सदा ही प्रसंन्न अवस्था में है। उसे इतने बड़े पसारे में खचित नहीं होना पड़ता। उसकी एक हुक्म रूप सत्ता ही सारे व्यवहार को निबाह रही है।)

 

करियर और आर्थिक स्थिरता

करियर और आर्थिक स्थिरता के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि हमारे करियर और आर्थिक स्थिरता का मार्ग भी परमात्मा के हुक्म से निर्धारित होता है। यदि हम ईमानदारी और मेहनत से काम करते हैं, तो परमात्मा की कृपा से हमें सफलता मिलती है। जैसे कि एक व्यक्ति जो अपने काम में निरंतर प्रयासरत रहता है, उसे परमात्मा की कृपा से तरक्की और आर्थिक स्थिरता प्राप्त होती है।

स्वास्थ्य और भलाई

स्वास्थ्य और भलाई के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारा स्वास्थ्य भी परमात्मा के हुक्म से ही चलता है। हमें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए और अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए सही आदतों को अपनाना चाहिए। यदि हम सही तरीके से जीवन जीते हैं, तो परमात्मा की कृपा से हमें अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है। जैसे कि एक व्यक्ति जो स्वस्थ आहार लेता है और नियमित व्यायाम करता है, उसे अच्छा स्वास्थ्य मिलता है।

पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ

पारिवारिक जिम्मेदारियों के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे पारिवारिक संबंध और जिम्मेदारियाँ भी परमात्मा के हुक्म से ही निर्धारित होती हैं। हमें अपने परिवार के सदस्यों की देखभाल करनी चाहिए और उनकी जरूरतों को पूरा करना चाहिए। जैसे कि माता-पिता जो अपने बच्चों की देखभाल और शिक्षा के लिए पूरी जिम्मेदारी निभाते हैं, वे परमात्मा की कृपा से अपने परिवार को खुशहाल बनाते हैं।

आध्यात्मिक नेतृत्व

आध्यात्मिक नेतृत्व के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि सच्चा आध्यात्मिक नेता वह होता है जो परमात्मा के हुक्म को मानकर चलता है। वह अपने अनुयायियों को सही मार्ग दिखाता है और उन्हें परमात्मा की भक्ति में लीन करता है। जैसे कि गुरु नानक देव जी ने अपने अनुयायियों को परमात्मा के हुक्म को मानने और उसकी भक्ति करने की शिक्षा दी।

परिवार और रिश्तों की गतिशीलता

परिवार और रिश्तों की गतिशीलता के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे रिश्तों का संचालन भी परमात्मा के हुक्म से होता है। हमें अपने रिश्तों को सहेजने और मजबूत बनाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक पति और पत्नी जो एक-दूसरे का सम्मान और सहयोग करते हैं, उनके रिश्ते परमात्मा की कृपा से मजबूत होते हैं।

व्यक्तिगत पहचान और विकास

व्यक्तिगत पहचान और विकास के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारा व्यक्तिगत विकास भी परमात्मा के हुक्म से ही होता है। हमें अपने कौशल और क्षमताओं को बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक छात्र जो अपनी पढ़ाई में मेहनत करता है और नई चीजें सीखता है, उसे परमात्मा की कृपा से सफलता और पहचान मिलती है।

स्वास्थ्य और सुरक्षा

स्वास्थ्य और सुरक्षा के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारी सुरक्षा भी परमात्मा के हुक्म से होती है। हमें अपनी सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने चाहिए और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो सुरक्षा के नियमों का पालन करता है और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखता है, उसे परमात्मा की कृपा से सुरक्षा और भलाई मिलती है।

विभिन्न भूमिकाओं का संतुलन

विभिन्न भूमिकाओं का संतुलन बनाए रखते हुए, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि जीवन में हमें कई भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं और हर भूमिका में परमात्मा का हुक्म होता है। हमें इन भूमिकाओं में संतुलन बनाए रखना चाहिए। जैसे कि एक महिला जो एक ही समय में एक माँ, पत्नी, और कर्मचारी की भूमिका निभाती है, उसे परमात्मा की कृपा से संतुलन मिलता है।

मासूमियत और सीखना

मासूमियत और सीखने के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि बच्चों की मासूमियत और उनकी सीखने की प्रक्रिया भी परमात्मा के हुक्म से चलती है। हमें बच्चों को सही मार्गदर्शन देना चाहिए और उनकी शिक्षा का ध्यान रखना चाहिए। जैसे कि माता-पिता जो अपने बच्चों को सिखाते हैं और उनकी मासूमियत को संजोते हैं, वे परमात्मा की कृपा से उन्हें सही मार्ग दिखाते हैं।

पारिवारिक और पर्यावरणीय प्रभाव

पारिवारिक और पर्यावरणीय प्रभाव के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे परिवार और पर्यावरण का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव होता है, और यह सब परमात्मा के हुक्म से ही होता है। हमें अपने परिवार और पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए और उन्हें सकारात्मक बनाना चाहिए। जैसे कि एक परिवार जो एक-दूसरे का सहयोग करता है और एक स्वस्थ पर्यावरण में रहता है, वह परमात्मा की कृपा से खुशहाल होता है।

दोस्ती और सामाजिक स्वीकृति

दोस्ती और सामाजिक स्वीकृति के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि हमारी दोस्ती और समाज में स्वीकृति भी परमात्मा के हुक्म से होती है। हमें सच्चे मित्र बनाने और समाज में सम्मान प्राप्त करने के लिए सही मार्ग पर चलना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो ईमानदारी और सच्चाई से मित्रता करता है, उसे परमात्मा की कृपा से सच्चे मित्र और समाज में सम्मान प्राप्त होता है।

बौद्धिक संदेह

बौद्धिक संदेह के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे बौद्धिक संदेह और उनकी जांच भी परमात्मा के हुक्म से होती है। हमें हमेशा सच्चाई की खोज में रहना चाहिए और अपने संदेहों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक वैज्ञानिक जो नए-नए अनुसंधान करता है और अपने संदेहों का समाधान खोजता है, उसे परमात्मा की कृपा से नए ज्ञान की प्राप्ति होती है।

भावनात्मक उथल-पुथल

भावनात्मक उथल-पुथल के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि हमारी भावनाएँ भी परमात्मा के हुक्म से चलती हैं। हमें अपनी भावनाओं को समझने और उन्हें संभालने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना करता है, उसे अपनी भावनाओं को संभालने और उनसे उबरने के लिए परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान

सांस्कृतिक आदान-प्रदान के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि विभिन्न संस्कृतियों का आदान-प्रदान भी परमात्मा के हुक्म से होता है। हमें विभिन्न संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए और उनसे सीखना चाहिए। जैसे कि विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ मेलजोल बढ़ाने से हमें उनकी संस्कृति और परंपराओं के बारे में जानने का मौका मिलता है और हम परमात्मा की कृपा से उनका सम्मान करना सीखते हैं।

रिश्तों का प्रभाव

रिश्तों का प्रभाव के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे रिश्ते भी परमात्मा के हुक्म से चलते हैं। हमें अपने रिश्तों को सहेजने और मजबूत बनाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक पति और पत्नी जो एक-दूसरे का सम्मान और सहयोग करते हैं, उनके रिश्ते परमात्मा की कृपा से मजबूत होते हैं।

सत्य की खोज

सत्य की खोज के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि सत्य की खोज भी परमात्मा के हुक्म से होती है। हमें हमेशा सच्चाई की तलाश में रहना चाहिए और अपने जीवन में सत्य को अपनाना चाहिए। जैसे कि एक साधु जो हमेशा सत्य की खोज में रहता है और अपने ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करता है, उसे परमात्मा की कृपा से सत्य की प्राप्ति होती है।

धार्मिक संस्थानों से निराशा

धार्मिक संस्थानों से निराशा के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि भले ही धार्मिक संस्थानों में निराशा मिलती हो, हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए। हमें परमात्मा के हुक्म को मानकर चलना चाहिए और सच्चाई के मार्ग पर चलते रहना चाहिए। जैसे कि अगर हमें किसी धार्मिक संस्थान से निराशा मिलती है, तो हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

व्यक्तिगत पीड़ा

व्यक्तिगत पीड़ा के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि हमारी पीड़ा भी परमात्मा के हुक्म से होती है। हमें अपनी पीड़ा से उबरने और उससे सीखने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो जीवन में कठिनाइयों का सामना करता है, उसे अपनी पीड़ा से उबरने के लिए परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए और निरंतर प्रयास करना चाहिए।

अनुभवजन्य अन्याय

अनुभवजन्य अन्याय के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमें अन्याय का सामना करते समय भी अपने सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए। हमें अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहिए और न्याय की प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए। जैसे कि अगर हमें जीवन में अन्याय का सामना करना पड़ता है, तो हमें अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर कायम रहना चाहिए और न्याय के लिए प्रयास करना चाहिए।

दार्शनिक अन्वेषण

दार्शनिक अन्वेषण के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि हमारे दार्शनिक विचार और अन्वेषण भी परमात्मा के हुक्म से होते हैं। हमें हमेशा नए-नए प्रश्नों की तलाश में रहना चाहिए और उनके उत्तर खोजने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक दार्शनिक जो जीवन के अर्थ और उद्देश्य की खोज में रहता है, उसे परमात्मा की कृपा से नए-नए विचारों और उत्तरों की प्राप्ति होती है।

विज्ञान और तर्क

विज्ञान और तर्क के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमारे वैज्ञानिक अनुसंधान और तर्क भी परमात्मा के हुक्म से चलते हैं। हमें हमेशा नए-नए अनुसंधान और खोज में लगे रहना चाहिए और अपने ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक वैज्ञानिक जो नए-नए अनुसंधान करता है और अपने तर्कों का परीक्षण करता है, उसे परमात्मा की कृपा से नए ज्ञान की प्राप्ति होती है।

धार्मिक घोटाले

धार्मिक घोटालों के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि हमें सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलना चाहिए, भले ही धार्मिक संस्थानों में घोटाले हों। हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए और परमात्मा के हुक्म को मानकर चलना चाहिए। जैसे कि अगर हमें किसी धार्मिक संस्थान से निराशा मिलती है, तो हमें अपने विश्वास और भक्ति को बनाए रखना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं होना

अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं होने के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि हमें अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं रखनी चाहिए, भले ही हमें उम्मीदों के अनुरूप परिणाम न मिलें। हमें निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो अपने काम में सफलता नहीं मिलती, तो उसे निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए और परमात्मा की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।

सामाजिक दबाव

सामाजिक दबाव के संदर्भ में, यह पंक्ति संकेत करती है कि हमें सामाजिक दबाव के बावजूद अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर कायम रहना चाहिए। हमें अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। जैसे कि अगर समाज हमें किसी गलत काम के लिए मजबूर करता है, तो हमें अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए और सही मार्ग पर चलना चाहिए।

व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास

व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास के संदर्भ में, यह पंक्ति दर्शाती है कि हमारे व्यक्तिगत विश्वास और आत्म-विश्वास में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। हमें अपने आत्म-विश्वास को बनाए रखना चाहिए और कठिनाइयों का सामना करने के लिए प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो कठिनाइयों का सामना करता है, उसे अपने आत्म-विश्वास को बनाए रखना चाहिए और उनसे उबरने का प्रयास करना चाहिए।

जीवन के परिवर्तन

जीवन के परिवर्तन के संदर्भ में, यह पंक्ति बताती है कि जीवन में परिवर्तन निरंतर होते रहते हैं और हमें उन्हें स्वीकार करके आगे बढ़ना चाहिए। हमें जीवन के नए परिस्थितियों को स्वीकार करके अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक व्यक्ति जो नई स्थिति का सामना करता है, उसे स्वीकार करके अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए।

अस्तित्व संबंधी प्रश्न

अस्तित्व संबंधी प्रश्नों के संदर्भ में, यह पंक्ति हमें सिखाती है कि जीवन और अस्तित्व के प्रश्न अनंत हैं, और हमें हमेशा उनकी खोज में लगे रहना चाहिए। हमें नए-नए प्रश्नों का सामना करना चाहिए और उनके उत्तर खोजने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कि एक दार्शनिक जो जीवन के अर्थ और उद्देश्य की खोज में रहता है, उसे नए-नए प्रश्नों का सामना करना पड़ता है और उनके उत्तर खोजने का प्रयास करना चाहिए।

इन पंक्तियों का सार यह है कि परमात्मा का हुक्म ही सभी चीजों का संचालन करता है और हमें इसे स्वीकार करके और इस पर विश्वास करके अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहिए। चाहे किसी भी संदर्भ में इसे देखें, हमें हमेशा सकारात्मक बने रहना चाहिए और निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।

पिता का उपहार

बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥
जल बिनु पिआस न ऊतरै छुटकि जांहि मेरे प्रान ॥

एक बहुत ही बड़े उद्योगपति का पुत्र कॉलेज में अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी में लगा रहता है,

तो उसके पिता उसकी परीक्षा के विषय में पूछते है तो वो जवाब में कहता है कि हो सकता है कॉलेज में अव्वल आऊँ,

अगर मै अव्वल आया तो मुझे वो महंगी वाली कार ला कर दोगे जो मुझे बहुत पसन्द है..

तो पिता खुश होकर कहते हैं क्यों नहीं अवश्य ला दूंगा.

ये तो उनके लिए आसान था. उनके पास पैसो की कोई कमी नहीं थी।

जब पुत्र ने सुना तो वो दो गुने उत्साह से पढाई में लग गया। रोज कॉलेज आते जाते वो शो रुम में रखी कार को निहारता और मन ही मन कल्पना करता की वह अपनी मनपसंद कार चला रहा है।

दिन बीतते गए और परीक्षा खत्म हुई। परिणाम आया वो कॉलेज में अव्वल आया उसने कॉलेज से ही पिता को फोन लगाकर बताया की वे उसका इनाम कार तैयार रखे मै घर आ रहा हूं।

घर आते आते वो ख्यालो में गाडी को घर के आँगन में खड़ा देख रहा था। जैसे ही घर पंहुचा उसे वहाँ कोई कार नही दिखी.

वो बुझे मन से पिता के कमरे में दाखिल हुआ.

उसे देखते ही पिता ने गले लगाकर बधाई दी और उसके हाथ में कागज में लिपटी एक वस्तु थमाई और कहा लो यह तुम्हारा गिफ्ट।

पुत्र ने बहुत ही अनमने दिल से गिफ्ट हाथ में लिया और अपने कमरे में चला गया। मन ही मन पिता को कोसते हुए उसने कागज खोल कर देखा उसमे सोने के कवर में रामायण दिखी ये देखकर अपने पिता पर बहुत गुस्सा आया..

लेकिन उसने अपने गुस्से को संयमित कर एक चिठ्ठी अपने पिता के नाम लिखी की पिता जी आपने मेरी कार गिफ्ट न देकर ये रामायण दी शायद इसके पीछे आपका कोई अच्छा राज छिपा होगा.. लेकिन मै यह घर छोड़ कर जा रहा हु और तब तक वापस नही आऊंगा जब तक मै बहुत पैसा ना कमा लू और चिठ्ठी रामायण के साथ पिता के कमरे में रख कर घर छोड कर चला गया।

समय बीतता गया..

पुत्र होशियार था होनहार था जल्दी ही बहुत धनवान बन गया. शादी की और शान से अपना जीवन जीने लगा कभी कभी उसे अपने पिता की याद आ जाती तो उसकी चाहत पर पिता से गिफ्ट ना पाने की खीज हावी हो जाती, वो सोचता माँ के जाने के बाद मेरे सिवा उनका कौन था इतना पैसा रहने के बाद भी मेरी छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं की.

यह सोचकर वो पिता से मिलने से कतराता था।

एक दिन उसे अपने पिता की बहुत याद आने लगी.

उसने सोचा क्या छोटी सी बात को लेकर अपने पिता से नाराज हुआ अच्छा नहीं हुआ.

ये सोचकर उसने पिता को फोन लगाया बहुत दिनों बाद पिता से बात कर रहा हूँ .

ये सोच धड़कते दिल से रिसीवर थामे खड़ा रहा.

तभी सामने से पिता के नौकर ने फ़ोन उठाया और उसे बताया की मालिक तो दस दिन पहले स्वर्ग सिधार गए और अंत तक तुम्हे याद करते रहे और रोते हुए चल बसे.

जाते जाते कह गए की मेरे बेटे का फोन आया तो उसे कहना की आकर अपना व्यवसाय सम्भाल ले.

तुम्हारा कोई पता नही होनेे से तुम्हे सूचना नहीं दे पाये।

यह जानकर पुत्र को गहरा दुःख हुआ और दुखी मन से अपने पिता के घर रवाना हुआ.

घर पहुच कर पिता के कमरे जाकर उनकी तस्वीर के सामने रोते हुए रुंधे गले से उसने पिता का दिया हुआ गिफ्ट रामायण को उठाकर माथे पर लगाया और उसे खोलकर देखा.

पहले पन्ने पर पिता द्वारा लिखे वाक्य पढ़ा जिसमे लिखा था “मेरे प्यारे पुत्र, तुम दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करो और साथ ही साथ मै तुम्हे कुछ अच्छे संस्कार दे पाऊं.. ये सोचकर ये रामायण दे रहा हूँ “,

पढ़ते वक्त उस रामायण से एक लिफाफा सरक कर नीचे गिरा जिसमे उसी गाड़ी की चाबी और नगद भुगतान वाला बिल रखा हुआ था।

ये देखकर उस पुत्र को बहुत दुख हुआ और धड़ाम से जमींन पर गिर रोने लगा।

हम हमारा मनचाहा उपहार हमारी पैकिंग में ना पाकर उसे अनजाने में खो देते है।

ईश्वर भी हमे अपार गिफ्ट देते है, लेकिन हम अज्ञानी हमारे मन पसन्द पैकिंग में ना देखकर, गिफ्ट पा कर भी उसे खो देते है।

हमे अपने माता पिता के प्रेम से दिये ऐसे अन गिनत उपहारों का प्रेम से सम्मान करना चाहिए और उनका धन्यवाद करना चाहिए।

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