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चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि…

चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि ॥
करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि ॥

 

अच्छे और बुरे कर्मों का लेखा-जोखा धर्म के न्यायालय में रखा जाता है।
हर व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार ईश्वर के समीप या दूर होता है।

गहरा विश्लेषण:

  1. कर्मों का हिसाब और न्याय: “चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि” का भावार्थ यह है कि हमारे जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब एक दिव्य न्यायालय में होता है। “धरमु” से तात्पर्य उस परम शक्ति से है जो निष्पक्षता और न्याय का प्रतीक है। हमारे कर्मों का लेखा-जोखा उसी के समक्ष प्रस्तुत होता है, और वह न्याय के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों का फल देता है।
  2. कर्मों के आधार पर दूरी या निकटता: “करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि” का अर्थ है कि हमारे कर्म ही हमें ईश्वर के करीब या दूर ले जाते हैं। अच्छे कर्म हमें आध्यात्मिक निकटता की ओर बढ़ाते हैं, जबकि बुरे कर्म हमें परमात्मा से दूर कर देते हैं। यह विचार हमें सिखाता है कि हमारी प्रत्येक क्रिया का प्रभाव हमारे आत्मिक विकास और हमारे ईश्वर से संबंध पर पड़ता है।
  3. जीवन में कर्म का महत्व: इन पंक्तियों में यह सन्देश है कि मनुष्य को अपने कर्मों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि वही उसे ईश्वर के समीप या दूर ले जाते हैं। यह केवल बाहरी कार्य नहीं, बल्कि हमारे विचार, इरादे और व्यवहार भी इसमें सम्मिलित हैं। जीवन में धर्म की सार्थकता और कर्म की जिम्मेदारी को समझने का यह एक महत्वपूर्ण संदेश है।

संदेश:

इस शबद का मुख्य संदेश यह है कि हमारे कर्मों का फल हमें ईश्वर से निकटता या दूरी के रूप में मिलता है। हमें सिखाया गया है कि ईश्वर के न्यायालय में सभी कर्मों का लेखा-जोखा होता है और प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के अनुरूप फल पाता है। यह दृष्टिकोण हमें सच्चाई और न्याय के पथ पर चलने और अच्छे कर्मों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

सारांश:

“चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि” से लेकर “करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि” तक का संदेश यह है कि हमारे कर्म ही हमें ईश्वर के समीप या दूर करते हैं, और धर्म के न्यायालय में हमारे कर्मों का निष्पक्ष मूल्यांकन होता है। यह दृष्टिकोण जीवन में अच्छे कार्यों को अपनाने और आत्मिक विकास की दिशा में प्रेरित करता है।

सच्चा प्रेम, सच्ची निष्ठा और सच्चा समर्पण

ततु बिचारु यहै मथुरा जग तारन कउ अवतारु बनायउ ॥
जप्यउ जिन्ह अरजुन देव गुरू फिरि संकट जोनि गरभ न आयउ ॥

 

एक दिन की बात है, जब मैं अपने ऑफिस से थका हुआ घर लौटा। रास्ते में कुछ छोटे-छोटे कुत्ते के बच्चे हर रोज की तरह मेरे पीछे-पीछे दौड़ते हुए आ रहे थे। इन बच्चों से मेरी जान-पहचान कुछ ही दिनों पहले हुई थी, जब मैंने पहली बार उन्हें रास्ते में बिस्किट खिलाए थे। तब से ये छोटे जीव हर शाम मुझे देखते ही मेरे पीछे दौड़ते आते, मानो मेरे लौटने का इंतजार कर रहे हों।

उस दिन काम से बहुत थका हुआ था और ध्यान ही नहीं रहा कि बिस्किट खत्म हो चुके थे। रात भी गहरी हो चुकी थी और आस-पास की दुकानें भी बंद हो चुकी थीं। जैसे ही मैं अपने घर के दरवाजे तक पहुंचा, मैंने देखा कि उन छोटे कुत्तों में से कुछ बच्चे अब भी मेरे साथ आए थे। उनकी आंखों में एक मासूम-सी उम्मीद थी कि मैं उन्हें बिस्किट खिलाऊं, जैसे रोज खिलाता था। मुझे खेद महसूस हुआ, लेकिन उस समय मैं कुछ नहीं कर सकता था।

मैंने दरवाजा खोला और अंदर चला गया, सोचा कि शायद कल उन्हें कुछ अच्छा खिलाने का वादा कर पाऊंगा। लेकिन जब मैंने एक बार दरवाजा बंद किया और मुड़कर देखा, तो उन कुत्तों में से केवल एक ही कुत्ता का बच्चा बाहर खड़ा रहा। बाकी सभी अपने-अपने रास्ते जा चुके थे। यह छोटा बच्चा अपने नन्हे पंजों पर धीरे-धीरे आगे-पीछे टहलता रहा, मानो उसे यकीन हो कि मैं बाहर आऊंगा और उसे कुछ दूंगा।

उस मासूम के इस भरोसे ने मुझे कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। एक गहरी अनुभूति मन में जागी – ये छोटा कुत्ता बिना किसी उम्मीद के, बिना किसी स्वार्थ के, केवल भरोसे और स्नेह से मेरे साथ खड़ा था। उसे पता था कि शायद उसे आज बिस्किट नहीं मिलेंगे, लेकिन फिर भी उसने मेरा साथ नहीं छोड़ा। उसकी मासूमियत में मुझे एक गहरा संदेश मिला।

असल में यह छोटे कुत्ते का बच्चा मुझे समझा रहा था कि विश्वास और निष्ठा का अर्थ क्या होता है। हमारे जीवन में भी कुछ ऐसा ही होता है। जब तक हमें भगवान से सबकुछ मिलता रहता है, हम उनकी पूजा-अर्चना में लगे रहते हैं, उनको धन्यवाद देते हैं। लेकिन जैसे ही कोई कठिनाई आती है या हमारी उम्मीदें पूरी नहीं होतीं, हम उनका साथ छोड़ देते हैं, उनकी याद से दूर हो जाते हैं। हमारी आस्था डगमगाने लगती है।

उस नन्हे जीव ने मेरी ओर टकटकी बांधे देखा और धीरे-धीरे पूंछ हिलाई, मानो मुझे सांत्वना दे रहा हो कि वह यहां है और उसे मेरा इंतजार करने में कोई आपत्ति नहीं। मैंने दरवाजा खोला और बाहर आकर उसे प्यार से सहलाया। भले ही उस रात उसके लिए बिस्किट न था, लेकिन उसकी निष्ठा ने मेरे दिल में एक खास जगह बना ली थी। मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा और मन में संकल्प लिया कि अगले दिन उसे कुछ अच्छा खिलाने का वादा पूरा करूंगा।

उस छोटे कुत्ते ने मुझे यह सिखाया कि सच्ची निष्ठा वह होती है, जो बिना शर्त और बिना किसी अपेक्षा के साथ बनी रहे। जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, चाहे कैसी भी परिस्थितियां हों, जिस तरह वह छोटा-सा जीव मेरे साथ खड़ा रहा, उसी तरह हमें भी अपने विश्वास को, अपने आराध्य के प्रति प्रेम को बनाए रखना चाहिए।

हमारे जीवन में भी भगवान कई रूपों में हमारे साथ होते हैं। जब तक वह हमें सबकुछ देते रहते हैं, तब तक हम उनके प्रति कृतज्ञ रहते हैं। लेकिन जैसे ही हमें कुछ कम मिलता है, हम उनसे शिकायत करने लगते हैं या उनकी पूजा छोड़ देते हैं। परन्तु सच्चा भक्त वही है, जो अंत तक अपने आराध्य में आस्था बनाए रखता है, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों।

अगले दिन जब मैं ऑफिस से लौटा, तो मेरी जेब में कुत्तों के लिए विशेष रूप से खरीदे हुए बिस्किट थे। जैसे ही वह छोटा कुत्ता मुझे देखता, खुशी से उछलने लगा। मैंने उसके आगे बिस्किट रखे, और वह खुशी-खुशी खाने लगा। उस मासूम के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी, और मेरा दिल भी उस छोटे-से जीव की निष्ठा को देखकर भर आया।

उस दिन के बाद से मेरी दृष्टि में भगवान का आशीर्वाद सिर्फ भौतिक चीजों तक सीमित नहीं रह गया। मुझे महसूस हुआ कि उनके साथ हमारा रिश्ता भी इसी मासूम और निःस्वार्थ भावनाओं पर आधारित होना चाहिए। जिस तरह वह छोटा कुत्ता बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी शर्त के मेरे पास रहा, वैसे ही हमें भी अपने ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, सच्ची भक्ति और अटूट आस्था बनाए रखनी चाहिए।

आखिर में, वह नन्हा कुत्ता सिर्फ एक जीव नहीं था, बल्कि एक अनमोल शिक्षा देने वाला गुरु बन गया। उसने मुझे दिखाया कि सच्चा प्रेम, सच्ची निष्ठा और सच्चा समर्पण कैसे बिना किसी अपेक्षा के होता है।

पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु…

पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥
दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु ॥

 

हवा गुरु है, पानी पिता है, और धरती महान माता है।
दिन और रात दो धायें (दाई माँ) हैं, और पूरे संसार का खेल इनकी छत्रछाया में चलता है।

गहरा विश्लेषण:

  1. प्रकृति का माता-पिता के रूप में सम्मान: “पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु” का भावार्थ यह है कि जिस तरह एक गुरु हमारा मार्गदर्शन करता है, उसी तरह हवा (वायु) भी हमारे जीवन का सहारा और मार्गदर्शक है। पानी को पिता के रूप में मान्यता दी गई है क्योंकि यह जीवन का स्रोत है और हमें स्थिरता प्रदान करता है। धरती को माता के रूप में देखा गया है, जो हमें पोषण और आश्रय देती है। इस पंक्ति में प्रकृति के तत्वों को माता-पिता के रूप में आदर देना सिखाया गया है, जिससे हमें उनकी महत्ता और हमारे जीवन में उनके महत्व का एहसास होता है।
  2. दिन और रात की धाय माँ के रूप में भूमिका: “दिवसु राति दुइ दाई दाइआ” का अर्थ है कि दिन और रात हमारे जीवन की देखभाल करने वाली धाय (पालने वाली) हैं। दिन हमें कार्य, प्रगति, और ज्ञान का अवसर देता है, जबकि रात हमें विश्राम और शांति प्रदान करती है। यह दर्शाता है कि जीवन का प्रत्येक क्षण, चाहे वह दिन हो या रात, हमें आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है। संसार एक खेल है, और इसमें सब कुछ उस दैवीय व्यवस्था के तहत चलता है।
  3. जीवन का व्यापक दृष्टिकोण: इन पंक्तियों में, प्रकृति के तत्वों को सम्मान देने की प्रेरणा है और यह समझने का प्रयास है कि जीवन एक खेल की भांति चलता है, जहाँ दिन-रात हमें अलग-अलग भूमिकाओं में मार्गदर्शन करते हैं। यह हमें हमारे अस्तित्व की एकता और उस दिव्य शक्ति के प्रति हमारी निर्भरता का एहसास कराता है।

संदेश:

इस पंक्ति में प्रकृति के तत्वों के प्रति आदरभाव रखने की शिक्षा दी गई है। हमें सिखाया गया है कि हर क्षण, हर तत्व जो हमें जीवन देने और पोषित करने में योगदान देता है, हमारे लिए एक मार्गदर्शक और पालक की तरह है। इस प्रकार का दृष्टिकोण हमें पर्यावरण के प्रति सजग रहने और जीवन की महत्ता को समझने की प्रेरणा देता है।

सारांश:

“पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु” से लेकर “दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु” तक का संदेश यह है कि प्रकृति के तत्व हमारे जीवन के आधार हैं, और दिन-रात जीवन को सँभालने वाली धायें हैं। यह दृष्टिकोण हमें हमारे अस्तित्व की एकता, प्रकृति के प्रति आभार, और पर्यावरण के संरक्षण की ओर प्रेरित करता है।

परिवार

गुर रामदास दरसनु परसि कहि मथुरा अम्रित बयण ॥

मूरति पंच प्रमाण पुरखु गुरु अरजुनु पिखहु नयण ॥

 

एक गांव में दो बुजुर्ग बातें कर रहे थे….

पहला :- मेरी एक पोती है, शादी के लायक है… BA किया है, नौकरी करती है, कद – 5″2 इंच है.. सुंदर है, कोई लडका नजर मे हो तो बताइएगा..

दूसरा :- आपकी पोती को किस तरह का परिवार चाहिए ..?

पहला :- कुछ खास नही.. बस लडका MA/M.TECH किया हो, अपना घर हो, कार हो,घर मे एसी हो, अपने बाग बगीचा हो, अच्छा job, अच्छी सैलरी, कोई लाख रू. तक हो…

दूसरा :- और कुछ…

पहला :- हाँ सबसे जरूरी बात.. अकेला होना चाहिए..
मां-बाप,भाई-बहन नही होने चाहिए..वो क्या है लडाई झगड़े होते है…

दूसरे बुजुर्ग की आँखें भर आई फिर आँसू पोछते हुए बोला – मेरे एक दोस्त का पोता है उसके भाई- बहन नही है, मां बाप एक दुर्घटना मे चल बसे, अच्छी नौकरी है, डेढ़ लाख सैलरी है, गाड़ी है बंगला है, नौकर-चाकर है..

पहला :- तो करवाओ ना रिश्ता पक्का..

दूसरा:- मगर उस लड़के की भी यही शर्त है की लडकी के भी मां-बाप,भाई-बहन या कोई रिश्तेदार ना हो…कहते कहते उनका गला भर आया..फिर बोले :- अगर आपका परिवार आत्महत्या कर ले तो बात बन सकती है.. आपकी पोती की शादी उससे हो जाएगी और वो बहुत सुखी रहेगी….

पहला :- ये क्या बकवास है, हमारा परिवार क्यों करे आत्महत्या.. कल को उसकी खुशियों मे, दुःख मे कौन उसके साथ व उसके पास होगा…

दूसरा:- वाह मेरे दोस्त, खुद का परिवार, परिवार है और दूसरे का कुछ नही…

अपने बच्चो को परिवार का महत्व समझाओ, घर के बडे ,घर के छोटे सभी अपनो के लिए जरूरी होते है।
.. वरना इंसान खुशियों का और गम का महत्व ही भूल जाएगा, जिंदगी नीरस बन जाएगी

पहले वाले बुजुर्ग बेहद शर्मिंदगी के कारण कुछ नही बोल पाए…
परिवार है तो जीवन मे हर खुशी, खुशी लगती है अगर परिवार नही तो किससे अपनी खुशियाँ और गम बांटोगे…

अच्छी सोच रखे,अच्छी सीख दे।

 

जिन कउ नदरि करमु तिन कार ॥ नानक नदरी नदरि निहाल ॥

जिन कउ नदरि करमु तिन कार ॥ नानक नदरी नदरि निहाल ॥

 

जिन पर ईश्वर की कृपा दृष्टि होती है, वे ही सच्चे कर्म कर पाते हैं।
हे नानक! ईश्वर की कृपा दृष्टि से ही जीव आनंदित और संतुष्ट हो सकता है।

गहरा विश्लेषण:

  1. ईश्वर की कृपा से कर्म: “जिन कउ नदरि करमु तिन कार” का अर्थ है कि जिन पर ईश्वर की कृपा दृष्टि होती है, वे ही सच्चे, नेक, और परोपकारी कर्म कर पाते हैं। ये कर्म स्वयं की इच्छा से नहीं बल्कि ईश्वरीय प्रेरणा से होते हैं, और उनके माध्यम से जीव परमात्मा की सेवा में अपने जीवन का उपयोग करता है। यह भक्ति भावना में कर्म करने का संकेत है, जिसमें अहंकार का त्याग और निःस्वार्थता होती है।
  2. कृपा दृष्टि से संतुष्टि: “नानक नदरी नदरि निहाल” का अर्थ है कि केवल ईश्वर की कृपा से ही जीवन में आनंद, संतोष और आंतरिक शांति प्राप्त की जा सकती है। कृपा दृष्टि का आशय है कि व्यक्ति को उस आत्मिक संतोष का अनुभव होता है जो सांसारिक इच्छाओं और उपलब्धियों से परे है। ईश्वर का सच्चा अनुभव प्राप्त करना तभी संभव है जब उनकी दृष्टि या अनुकंपा हो।

संदेश:

इस पंक्ति का गहरा संदेश यह है कि मानव जीवन में सच्चे कर्म और आनंद ईश्वर की कृपा से ही संभव होते हैं। हम अपने प्रयासों के बावजूद अपनी सीमाओं में बंधे रहते हैं, लेकिन जब ईश्वर कृपा करते हैं, तो हमारे जीवन में आंतरिक शांति, संतोष, और सच्चे सेवा भाव का संचार होता है। यह पंक्ति आत्म-समर्पण, भक्ति, और ईश्वर की इच्छा को सर्वोपरि मानने का आह्वान करती है।

सारांश:

“जिन कउ नदरि करमु तिन कार” से लेकर “नानक नदरी नदरि निहाल” तक का संदेश यह है कि सच्चे कर्म और आत्मिक संतोष का स्रोत ईश्वर की कृपा है। उनकी दृष्टि की कृपा से ही व्यक्ति सच्चे मार्ग पर चल पाता है और वास्तविक आनंद और संतोष का अनुभव करता है।

क्रियाकाड

गुरि नानकि अंगदु वर्यउ गुरि अंगदि अमर निधानु ॥
गुरि रामदास अरजुनु वर्यउ पारसु परसु प्रमाणु ॥

एक रात ऐसा हुआ, एक पति घर वापस लौटा थका-मादा यात्रा से। प्यासा था, थका था। आकर बिस्तर पर बैठ गया। उसने अपनी पत्नी से कहा कि पानी ले आ, मुझे बड़ी प्यास लगी है। पत्नी पानी लेकर आयी, लेकिन वह इतना थका-मादा था कि लेट गया, उसकी नींद लग गयी। तो पत्नी रातभर पानी का गिलास लिए खड़ी रही बिस्तर के पास। क्योंकि उठाए, तो ठीक नहीं, नींद टूटेगी। खुद सो जाए, तो ठीक नहीं, पता नहीं कब नींद टूटे और पानी की मांग उठे, क्योंकि पति प्यासा सो गया है। तो रातभर गिलास लिए खड़ी रही।

सुबह पति की आंख खुली, तो उसने कहा, पागल, तू सो गयी होती! उसने कहा, यह संभव न था। तुम्हें प्यास थी, तुम कभी भी उठ आते! तो तू उठा लेती, पति ने कहा। उसने कहा, वह भी मुझसे न हो सका, क्योंकि तुम थके भी थे और तुम्हें नींद भी आ गयी थी। तो यही उचित था कि तुम सोए रहो, मैं गिलास लिए खड़ी रहूं। जब नींद खुलेगी, पानी पी लोगे। नहीं नींद खुलेगी, तो कोई हर्जा नहीं, एक रात जागने से कुछ बिगड़ा तो नहीं जाता है।

यह बात पूरे गांव में फैल गयी। सम्राट ने गांव के उस पत्नी को बुलाकर बहुत हीरे—जवाहरातों से स्वागत किया। उसने कहा कि ऐसी प्रेम की धारा मेरी इस राजधानी में थोड़ी भी बहती है, तो हम अभी मर नहीं गए हैं; अभी हमारी संस्कृति का प्राण जीवित है, स्पंदित है।

पड़ोस की महिला इससे बड़ी ईर्ष्या से भर गयी कि यह भी कोई खास बात थी! एक रात गिलास हाथ में लिए खड़े रहे, इसके लिए लाखों रुपए के हीरे-जवाहरात दे दिए हैं! यह भी कोई बात है?

उसने अपने पति से कहा कि देखो जी, आज तुम थके-मांदे होकर लौटना। आते से ही बिस्तर पर बैठ जाना। पानी मांगना। मैं पानी लेकर आ जाऊंगी। लेकिन तुम आंख बंद करके सो जाना और मैं खड़ी रहूंगी रातभर। और सुबह जब तुम्हारी आंख खुले, तो तुम इस तरह के वचन मुझसे बोलना, कि तू क्यों रातभर खड़ी रही? तू उठा लेती। मैं कहूंगी, कैसे उठा सकती थी? तुम थके -मांदे थे। कि तू सो जाती! तो मैं कहूंगी, कैसे सो जाती? तुम्हें प्यास लगी थीं। और इतने जोर से यह बात चाहिए कि पड़ोस में लोगों को पता चल जाए, सुनाई पड़ जाए। क्योंकि यह तो हद हो गयी! जरा रातभर… और किसको पक्का पता है कि खड़ी भी रही कि नहीं, क्योंकि रात सो ली हो, झपकी ले ली हो और फिर सुबह उठ आयी हो, और बात फैला दी हो! मगर हमें भी यह सम्राट से पुरस्कार लेना है।

पति सांझ थका—मादा वापस लौटा। लौटना पड़ा, जब पत्नी कहे, थके-मांदे लौटो, लौटना पड़ा। आते ही बिस्तर पर बैठा। कहा, प्यास लगी है। पत्नी पानी लेकर आयी। पति आंख बंद करके लेट गया। कोई नींद तो आई नहीं, लेकिन मजबूरी है। जब पत्नी कहती है, तो मानना पड़ेगा। और फिर लाखों—करोड़ों के हीरे—जवाहरात उसके मन को भी भा गए।

अब पत्नी ने सोचा कि बाकी दृश्य तो सुबह ही होने वाला है। अब कोई रातभर बेकार खड़े रहने में भी क्या सार है? और किसको पता चलता है कि खड़े रहे कि नहीं खड़े रहे? वह भी सो गयी गिलास—विलास रखकर।

सुबह उठकर उसने जोर से बातचीत शुरू की कि पड़ोस जान ले। सम्राट के द्वार से उसके लिए भी बुलावा आया, तो बहुत प्रसन्न हुई। लेकिन जब दरबार में पहुंची, तो बड़ी हैरान हुई; सम्राट ने वहा कोड़े लिए हुए आदमी तैयार रखे थे, और उस पर कोड़ों की वर्षा करवा दी। वह चीखी—चिल्लाई कि यह क्या अन्याय है? एक को हीरे—जवाहरात; मुझे कोड़े? किया मैंने भी वही है!

सम्राट ने कहा, किया वही है, हुआ नहीं है। और होने का मूल्य है, करने का कोई मूल्य नहीं है। और जीवन में यह रोज होता है। अगर हृदय में स्पंदन न हो रहा हो, तो तुम कर सकते हो, लेकिन उस करने से क्या अर्थ है?

सारे मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे कर रहे हैं। धर्म क्रियाकांड है। हो नहीं रहा है। गीता पढ़ी जा रही है, की जा रही है; हो नहीं रही है। तुमने सुन लिया है कि गीता को पढ़ने वाले पाप से मुक्त हो गए, मोक्ष को उपलब्ध हो गए। तुमने सोचा, हम भी हो जाएं! तुमने भी पढ़ ली। लेकिन तुम्हारा पढ़ना उस दूसरी पत्नी जैसा है। तुम परमात्मा को धोखा न दे पाओगे। साधारण सम्राट भी धोखा न खा सका, वह भी समझ गया कि ऐसी घटनाएं रोज नहीं घटती। और पड़ोस में ही घट गई! और वही की वही घटी, बिलकुल वैसी ही घटी! यह तो कोई नाटक हुआ।

जीवन पुनरुक्त नहीं होता। हर भक्त ने परमात्मा की प्रार्थना अपने ढंग से की है, किसी और के ढंग से नहीं। हर प्रेमी ने प्रेम अपने ढंग से किया है। कोई मजनू और शीरी और फरिहाद, उनकी किताब रखकर और पन्ने पढ़—पढ़कर और कंठस्थ कर—करके प्रेम नहीं किया है।

कोई जीवन नाटक नहीं है कि उसमें पीछे प्राम्पटर खड़ा है, और वह कहे चले जा रहा है, अब यह कहो, अब यह कहो। जीवन जीवन है। तुम उसे पुनरुक्त करके खराब कर लोगे। गीता तुम हजार दफे पढ़ लो; लेकिन जैसे अर्जुन ने पूछा था, वैसी जिज्ञासा न होगी, वैसी प्राणपण से उठी हुई मुमुक्षा न होगी। तो जो कृष्ण को सरल हुआ कहना, जो अर्जुन को संभव हुआ समझना, वह तुम्हें न घट सकेगा।

दोहराया जा ही नहीं सकता जगत में कुछ। प्रत्येक घटना अनूठी है। इसलिए सभी रिचुअल, सभी क्रियाकाड धोखाधड़ी है, पाखंड है। तुम भूलकर भी किसी की पुनरुक्ति मत करना, क्योंकि वहीं धोखा आ जाता है और प्रामाणिकता खो जाती है।

प्रामाणिक के लिए मुक्ति है, पाखंड के लिए मुक्ति नहीं है। और तुम कितना ही लाख सिर पटको और कहो कि मैंने भी तो वैसा ही किया था, मैंने भी तो ठीक अक्षरश: पालन किया था नियम का, फिर यह अन्याय क्यों हो रहा है? अक्षरश: पालन का सवाल ही नहीं है। अपने ईश्वर को अपने तरीके से भजो, राजा के भाँति वो आपको भी उचित सम्मान देगा।

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