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कौन शूद्र कौन ब्राह्मण……..

कबीर कउडी कउडी जोरि कै जोरे लाख करोरि ॥
चलती बार न कछु मिलिओ लई लंगोटी तोरि ॥

 

एक शूद्र महिला रानी रासमणि ने मंदिर बनवाया। चूंकि वह शूद्र थी, उसके मंदिर में कोई ब्राह्मण पूजा करने को राजी न हुआ। हालांकि रासमणि खुद भी कभी मंदिर में अंदर नहीं गई थी, क्योंकि कहीं मंदिर अपवित्र न हो जाए! यह तो ब्राह्मण होने का लक्षण हुआ। जो अपने को शूद्र समझे, वह ब्राह्मण। जो अपने को ब्राह्मण समझे, वह शूद्र।

रासमणि कभी मंदिर के भीतर भी नहीं गई, बाहर-बाहर से घूम आती थी। दक्षिणेश्वर का विशाल मंदिर उसने बनाया था, लेकिन कोई पुजारी न मिलता था। और रासमणि शूद्र थी, इसलिए वह खुद पूजा न कर सकती थी। मंदिर क्या बिना पूजा के रह जाएगा? वह बड़ी दुखी थी, बड़ी पीड़ित थी। रोती थी, चिल्लाती थी–कि कोई पुजारी भेज दो!

फिर किसी ने खबर दी कि गदाधर नाम का एक ब्राह्मण लड़का है, उसका दिमाग थोड़ा गड़बड़ है, शायद वह राजी हो जाए। क्योंकि यह दुनिया इतनी समझदार है कि इसमें शायद गड़बड़ दिमाग के लोग ही कभी थोड़े से समझदार हों तो हों। यह गदाधर ही बाद में रामकृष्ण बना।

गदाधर को पूछा। उसने कहा कि ठीक है, आ जाएंगे। उसने एक बार भी न कहा कि ब्राह्मण होकर मैं शूद्र के मंदिर में कैसे जाऊं? गदाधर ने कहा, ठीक है। प्रार्थना यहां करते हैं, वहां करेंगे। घर के लोगों ने भी रोका, मित्रों ने भी कहा कि कहीं और नौकरी दिला देंगे। नौकरी के पीछे अपने धर्म को खो रहा है? पर गदाधर ने कहा, नौकरी का सवाल नहीं है; भगवान बिना पूजा के रह जाएं, यह बात अच्छी नहीं।

मगर तब खबर रासमणि को मिली कि यह पूजा तो करेगा, लेकिन पूजा में यह दीक्षित नहीं है। इसने कभी पूजा की नहीं है। यह अपने घर ही करता रहा है। इसकी पूजा का कोई शास्त्रीय ढंग, विधि-विधान नहीं है। और इसकी पूजा भी जरा अनूठी है।

कभी करता है, कभी नहीं भी करता। कभी दिन भर करता है, कभी महीनों भूल जाता है और भी इसमें कुछ गड़बड़ हैं; कि यह भी खबर आई है कि यह पूजा करते वक्त पहले खुद भोग लगा लेता है अपने को, फिर भगवान को लगाता है। खुद चख लेता है मिठाई वगैरह हो, तो रासमणि ने कहा, अब आने दो। कम से कम कोई तो आता है।

वह आया, लेकिन ये गड़बड़ें शुरू हो गईं। कभी पूजा होती, कभी मंदिर के द्वार बंद रहते। कभी दिन बीत जाते, घंटा न बजता, दीया न जलता; और कभी ऐसा होता कि सुबह से प्रार्थना चलती तो बारह-बारह घंटे नाचते ही रहते रामकृष्ण।

आखिर रासमणि ने कहा कि यह कैसे होगा? ट्रस्टी हैं मंदिर के, उन्होंने बैठक बुलाई। उन्होंने कहा, यह किस तरह की पूजा है? किस शास्त्र में लिखी है?

रामकृष्ण ने कहा, शास्त्र से पूजा का क्या संबंध है? पूजा प्रेम की है। जब मन ही नहीं होता करने का, तो करना गलत होगा और वह तो पहचान ही लेगा कि बिना मन के किया जा रहा है। तुम्हारे लिए थोड़े ही पूजा कर रहा हूं। उसको मैं धोखा न दे सकूंगा। जब मन ही करने का नहीं हो रहा, जब भाव ही नहीं उठता, तो झूठे आंसू बहाऊंगा, तो परमात्मा पहचान लेगा। वह तो पूजा न करने से भी बड़ा पाप हो जाएगा कि भगवान को धोखा दे रहा हूं। जब उठता है भाव तो इकट्ठी कर लेता हूं। दो तीन सप्ताह की एक दिन में निपटा देता हूं। लेकिन बिना भाव के मैं पूजा न करूंगा।

और उन्होंने कहा, तुम्हारा कुछ विधि-विधान नहीं मालूम पड़ता। कहां से शुरू करते, कहां अंत करते।

रामकृष्ण ने कहा, वह जैसा करवाता है, वैसा हम करते हैं। हम अपना विधि-विधान उस पर थोपते नहीं। यह कोई क्रियाकांड नहीं है, पूजा है। यह प्रेम है। रोज जैसी भाव-दशा होती है, वैसा होता है। कभी पहले फूल चढ़ाते हैं, कभी पहले आरती करते हैं। कभी नाचते हैं, कभी शांत बैठते हैं। कभी घंटा बजाते हैं, कभी नहीं भी बजाते। जैसा आविर्भाव होता है भीतर, जैसा वह करवाता है, वैसा करते हैं। हम कोई करने वाले नहीं।

उन्होंने कहा, यह भी जाने दो। लेकिन यह तो बात गुनाह की है कि तुम पहले खुद चख लेते हो, फिर भगवान को भोग लगाते हो! कहीं दुनिया में ऐसा सुना नहीं। पहले भगवान को भोग लगाओ, फिर प्रसाद ग्रहण करो। तुम भोग खुद को लगाते हो, प्रसाद भगवान को देते हो।

रामकृष्ण ने कहा, जैसा मैं करता हूं, वैसा ही करूंगा। मेरी मां भी जब कुछ बनाती थी तो पहले खुद चख लेती थी, फिर मुझे देती थी। पता नहीं, देने योग्य है भी या नहीं। कभी मिठाई में शक्कर ज्यादा होती है, मुझे ही नहीं जंचती, तो मैं उसे नहीं लगाता। कभी शक्कर होती ही नहीं, मुझे ही नहीं जंचती, तो भगवान को कैसे प्रीतिकर लगेगी? जो मेरी मां न कर सकी मेरे लिए, वह मैं परमात्मा के लिए नहीं कर सकता हूं।

ऐसे प्रेम से जो भक्ति उठती है, वह तो रोज-रोज नई होगी। उसका कोई क्रियाकांड नहीं हो सकता। उसका कोई बंधा हुआ ढांचा नहीं हो सकता। प्रेम भी कहीं ढांचे में हुआ है? पूजा का भी कहीं कोई शास्त्र है? प्रार्थना की भी कोई विधि है? वह तो भाव का सहज आवेदन है। भाव की तरंग है।

सेई तुधुनो गावहि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले…

सेई तुधुनो गावहि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले ॥
होरि केते गावनि से मै चिति न आवनि नानकु किआ वीचारे ॥

वही तेरा गुणगान करते हैं, जो तेरी इच्छा में रत हैं, जो तेरे भक्त हैं और प्रेम रस में लीन हैं।
अन्य बहुत से लोग भी तेरा गुणगान करते हैं, परंतु वे मेरे मन में नहीं आते। नानक कहते हैं, मैं क्या सोचूं या विचार करूं?

गहरा विश्लेषण:

1. ईश्वर की इच्छा में रत भक्त:

“सेई तुधुनो गावहि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले” का अर्थ है कि वे ही लोग सच्चे तौर पर ईश्वर का गुणगान करते हैं, जो उनकी इच्छा में पूरी तरह से लीन हैं। यह इस बात को दर्शाता है कि जो भक्त सच्चे दिल से और ईश्वर के प्रति प्रेम में डूबे हुए हैं, वे ही उनके वास्तविक भजन गा सकते हैं। उनकी भक्ति ईश्वर की इच्छा के अनुसार होती है, और उनके हृदय में केवल ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण होता है।

2. सच्चे भक्तों का प्रेम रस:

“तेरे भगत रसाले” का अर्थ है कि तेरे भक्त प्रेम रस में डूबे हुए हैं। यहाँ “रस” का अर्थ प्रेम, आनंद, और ईश्वर के प्रति लगाव से है। जो भक्त ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम और भक्ति से जुड़े होते हैं, उनके हृदय में ईश्वर के प्रति एक गहरा प्रेम और आनंद होता है। उनकी भक्ति एक मीठे प्रेम रस की तरह होती है, जिसमें वे ईश्वर की महिमा का गान करते हैं।

3. अन्य लोगों द्वारा गान:

“होरि केते गावनि” का अर्थ है कि और भी बहुत से लोग ईश्वर की महिमा गाते हैं। इस पंक्ति से यह बात स्पष्ट होती है कि दुनिया में बहुत से लोग ईश्वर के नाम का जाप करते हैं, उनकी स्तुति करते हैं, लेकिन उनकी भक्ति सच्ची हो, यह जरूरी नहीं है। केवल भौतिक रूप से या दिखावे के लिए किया गया भजन ईश्वर तक नहीं पहुँचता, क्योंकि वह सच्चे दिल से नहीं होता।

4. सच्ची भक्ति और दिखावे की भक्ति का अंतर:

“से मै चिति न आवनि” का अर्थ है कि नानक के मन में उन लोगों की भक्ति नहीं आती, जो केवल बाहरी दिखावे के लिए ईश्वर का गुणगान करते हैं। यहाँ गुरु नानकजी यह संदेश दे रहे हैं कि केवल वही भक्त सच्चे माने जाते हैं, जो हृदय से ईश्वर में लीन होते हैं। अन्य लोग, जो केवल औपचारिकता निभाते हैं या दिखावे के लिए भक्ति करते हैं, उनकी भक्ति सच्ची नहीं होती और वह ईश्वर के प्रेम में नहीं होती।

5. नानक की विनम्रता:

“नानकु किआ वीचारे” का अर्थ है कि नानक विनम्रतापूर्वक कहते हैं, “मैं क्या सोच सकता हूँ, मैं क्या विचार कर सकता हूँ?”। यहाँ गुरु नानकजी अपनी विनम्रता व्यक्त कर रहे हैं और यह कह रहे हैं कि सच्ची भक्ति को परखने की शक्ति उनके पास नहीं है, यह तो केवल ईश्वर ही जान सकते हैं। नानकजी अपने आप को एक सामान्य भक्त के रूप में देखते हैं, जो ईश्वर के सच्चे भक्तों की तरह भक्ति करने की कोशिश करते हैं।

6. भक्ति में ईश्वर की इच्छा का महत्व:

इस शबद का प्रमुख संदेश यह है कि सच्ची भक्ति वही है, जो ईश्वर की इच्छा के अनुसार हो। जो भक्त ईश्वर की इच्छा में रत होते हैं, वे सच्चे होते हैं, क्योंकि वे दिखावे के लिए नहीं बल्कि सच्चे प्रेम और समर्पण के साथ भक्ति करते हैं। नानकजी इस पंक्ति में यही समझा रहे हैं कि भले ही बहुत लोग ईश्वर का नाम लेते हैं, लेकिन सच्ची भक्ति केवल वही होती है, जो हृदय से और ईश्वर के प्रेम में डूबकर की जाती है।

सारांश:

“सेई तुधुनो गावहि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले ॥
होरि केते गावनि से मै चिति न आवनि नानकु किआ वीचारे ॥”
का संदेश यह है कि सच्चे भक्त वही हैं, जो ईश्वर की इच्छा में लीन होकर, प्रेम के रस में डूबकर उनकी स्तुति करते हैं। अन्य लोग भी भजन करते हैं, लेकिन उनकी भक्ति नानक के मन में नहीं आती, क्योंकि वह सच्चे प्रेम और समर्पण से रहित होती है। नानकजी कहते हैं कि सच्ची भक्ति की पहचान केवल ईश्वर ही कर सकते हैं, और वे खुद को एक विनम्र भक्त मानते हैं।

 

 

परिश्रम और सफलता

कबीर सूता किआ करहि बैठा रहु अरु जागु ॥
जा के संग ते बीछुरा ता ही के संगि लागु ॥

क्या?? भैया ये तो रोज तुम्हे बेबकूब बना कर चला जाता है। आप को अपने दुकान पर ध्यान देना चाहिए,उसे एक आदमी बोलता है, जिस पर वह दुकानदार हंसने लगता है।

मेरे घर से करीब एक किलोमीटर कि दूरी पर एक समोसे बेचने वाला का दुकान था। मै जब भी ऑफिस जाता है तो उसके समोसे जरूर खाता था। उसके समोसे की बात ही अलग थी, क्युकी वह अपने समोसे में पनीर डाला करता था जिस कारण से उसका स्वाद और भी बढ़ जाता था।

शायद यही कारण था जिस बजे से उसके दुकान पर हमेशा भीड़ लगा रहता था। मेरी डेली का रूटीन था उसके वहाँ से ऑफिस जाते और आते हमेशा समोसे खाता था।

मैने देखा कि उसके दुकना पर एक आदमी रोज आता है और समोसे खाता था और बीन पैसे दी चला जाता था। पहले तो मुझे लगा शायद उसे भूख लगी होगी और उसके पास पैसे नहीं होगी,इस कारण से बीन पैसे दिये चल गया होगा।

लेकिन यह आदमी हर रोज ऐसा ही करता था । मुझ से रहा नहीं गया और एक दिन मैंने दुकान के मालिक से कहा,”आप के दुकान पर एक आदमी रोज आता है। समोसे खाता है और बीन पैसे दिए चला जाता है।

इस पर वह आदमी कहता है,”आप पहले इंसान नहीं है जो आप मुझे यह बता रहे है। इस से पहले भी कई लोगो ने मुझे उस आदमी के बारे में बताया है। इस पर मैंने कहा,”आप उसे पकड़ते क्यों नहीं है??

एक दिन मैंने(दुकानदार) उसका पीछा किया ताकि मुझे पता तो चले आख़री यह आदमी ऐसा क्यों करता है?? तो मैने देखा कि यह आदमी खाना खाने के बाद मंदिर जाता और भगवान से प्रथना करता कि आज दुकान में ज्यादा भीड़ हो ताकि मै आराम से समोसा खा सकू।

यह देख में वहा से लौट कर दुकान चला आया,उस दिन से मैंने भी उस आदमी को देखे हुए भी अनदेखा कर दिया करता था।

जीवन में हमें कभी भी अपने परिश्रम और सफलता पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि हमारी सफलता में कई बार दूसरों की प्रार्थनाएँ और परिस्थितियाँ भी योगदान देती हैं। जिस चीज़ को हम केवल अपने प्रयास का परिणाम मानते हैं, वह कभी-कभी किसी और की दुआओं और इच्छाओं का परिणाम हो सकती है। इसलिए, हमें सदैव विनम्र रहना चाहिए और दूसरों की भावनाओं और हालात को समझने का प्रयास करना चाहिए।

 

गावनि रतन उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले…

गावनि रतन उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले ॥
गावहि जोध महाबल सूरा गावहि खाणी चारे ॥
गावहि खंड मंडल वरभंडा करि करि रखे धारे ॥

 

तेरे द्वारा उत्पन्न किए गए रत्न (कीमती गुण) और 68 तीर्थ स्थान भी तेरी महिमा गाते हैं।
वीर योद्धा, शक्तिशाली सूरमा, और चारों प्रकार की जीवन श्रेणियाँ (खाणी) भी तेरा गुणगान करती हैं।
सभी खंड (भूभाग), मंडल (ग्रह-मंडल), और सृष्टि के विशाल संसार, जो तूने रचे और स्थिर रखे हैं, वे भी तेरी महिमा गाते हैं।

इस पंक्ति का गहरा विश्लेषण:

1. रत्नों और तीर्थों द्वारा ईश्वर की स्तुति:

“गावनि रतन उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले” का अर्थ है कि जिन रत्नों (गुणों) को ईश्वर ने उत्पन्न किया है और 68 तीर्थ स्थान, ये सब मिलकर ईश्वर की महिमा गाते हैं। यहाँ “रत्न” का अर्थ केवल भौतिक रत्नों से नहीं है, बल्कि उन गुणों, सिद्धांतों, और अनमोल तत्वों से है, जिन्हें ईश्वर ने सृष्टि में उत्पन्न किया है। 68 तीर्थ स्थान भी प्रतीक हैं, जो मानव जीवन के शुद्धिकरण के लिए जाने जाते हैं। इन तीर्थों का उद्देश्य भी ईश्वर की महिमा को बढ़ाना और उनकी दिव्यता को समझाना है।

2. वीर योद्धाओं और शक्तिशाली पुरुषों द्वारा स्तुति:

“गावहि जोध महाबल सूरा” का अर्थ है कि वीर योद्धा, जो अत्यधिक शक्तिशाली और साहसी होते हैं, वे भी ईश्वर की स्तुति गाते हैं। इस पंक्ति से यह पता चलता है कि भले ही योद्धा अपनी ताकत और वीरता के लिए जाने जाते हैं, लेकिन वे भी समझते हैं कि उनकी शक्ति और साहस का स्रोत ईश्वर ही है। उनका अस्तित्व और उनकी वीरता भी ईश्वर की महिमा का हिस्सा है। यहाँ यह सिखाया जा रहा है कि संसार के शक्तिशाली और वीर लोग भी ईश्वर की स्तुति में लीन होते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी शक्तियाँ ईश्वर की ही देन हैं।

3. चार खाणियों का वर्णन:

“गावहि खाणी चारे” का मतलब है कि सृष्टि के चार प्रकार की जीवन श्रेणियाँ, जिन्हें चार खाणियाँ कहा गया है, वे भी ईश्वर की स्तुति गाते हैं। ये चार खाणियाँ हैं:

  1. अंडज – अंड से उत्पन्न होने वाले प्राणी।
  2. जेरज – गर्भ से उत्पन्न होने वाले प्राणी।
  3. उत्भुज – धरती से उत्पन्न होने वाले प्राणी।
  4. सेतज – पसीने या नमी से उत्पन्न होने वाले प्राणी।

यह बताता है कि सृष्टि के सभी जीव-जंतु, चाहे वे किसी भी प्रकार से उत्पन्न हुए हों, वे भी ईश्वर की महिमा गाते हैं। इसका अर्थ है कि समस्त जीव-जंतु और सृष्टि में मौजूद सभी प्राणी ईश्वर की रचना हैं और वे उनकी स्तुति में लगे रहते हैं।

4. खंड, मंडल, और विश्व के विशाल ढाँचे द्वारा स्तुति:

“गावहि खंड मंडल वरभंडा” का अर्थ है कि समस्त खंड (भूमि खंड), मंडल (ग्रह-मंडल), और वरभंडा (सृष्टि के विशाल ढाँचे) जो ईश्वर ने रचे हैं और उन्हें स्थिर रखा है, वे भी ईश्वर की महिमा गाते हैं। यह पंक्ति इस बात को दर्शाती है कि संपूर्ण ब्रह्मांड, जिसमें विभिन्न ग्रह, तारे, आकाशगंगाएँ, और पृथ्वी के भूभाग शामिल हैं, वे भी ईश्वर की रचना का हिस्सा हैं और उनकी स्तुति करते हैं। यह दर्शाता है कि ईश्वर की महिमा न केवल पृथ्वी पर बल्कि पूरे ब्रह्मांड में फैली हुई है।

5. सृष्टि के स्थायित्व का महत्व:

“करि करि रखे धारे” का अर्थ है कि ईश्वर ने जो कुछ भी रचा है, उसे बनाए रखा है और उसकी स्थिरता भी उन्हीं की कृपा पर निर्भर है। यह बताता है कि सृष्टि के निर्माण के बाद भी ईश्वर ही उसे संभालते हैं और उसकी देखभाल करते हैं। चाहे वह ग्रह हों, तारे हों या जीव-जंतु, उनकी स्थिरता और अस्तित्व ईश्वर के हाथों में है। इसका गहरा संदेश यह है कि संसार की सभी चीज़ें ईश्वर की रचना हैं, और उनका अस्तित्व ईश्वर की कृपा से ही संभव है।

6. संपूर्ण सृष्टि का ईश्वर के प्रति समर्पण:

इस पंक्ति का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि सृष्टि के हर कण, चाहे वह भौतिक हो या आत्मिक, चाहे वह जीव हो या निर्जीव, सब कुछ ईश्वर की महिमा का गान करता है। ईश्वर की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमानता का यह वर्णन हमें बताता है कि सृष्टि की हर चीज़, चाहे वह कितनी भी महान या छोटी हो, वह ईश्वर की कृपा और उनकी शक्ति से ही चलती है।

सारांश:

“गावनि रतन उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले ॥
गावहि जोध महाबल सूरा गावहि खाणी चारे ॥
गावहि खंड मंडल वरभंडा करि करि रखे धारे ॥”
का संदेश यह है कि ईश्वर द्वारा उत्पन्न किए गए रत्न (गुण) और 68 तीर्थ स्थान, वीर योद्धा, शक्तिशाली लोग, चारों प्रकार की जीवन श्रेणियाँ, सभी भूखंड, ग्रह-मंडल, और विशाल ब्रह्मांड की रचना ईश्वर की महिमा गाती है। यह पंक्ति दर्शाती है कि सृष्टि की हर छोटी-बड़ी चीज़, चाहे वह पृथ्वी पर हो या आकाश में, सभी कुछ ईश्वर के प्रति समर्पित हैं और उनकी स्तुति करते हैं।

 

 

 

 

ठाकुरजी की भाभी

कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥
इक दिन सोवनु होइगो लांबे गोड पसारि ॥

 

एक लडकी थी जो कृष्ण जी की अनन्य भक्त थी, बचपन से ही कृष्ण भगवान का भजन करती थी, भक्ति करती थी, भक्ति करते-करते बड़ी हो गई, भगवान की कृपासे उसका विवाह भी श्रीधाम वृंदावन में किसी अच्छे घर में हो गया। विवाह होकर पहली बार वृंदावन गई, पर नई दुल्हन होने से कही जा न सकी, और मायके चली गई। फिर वो दिन भी आ गया जब उसका पति उसे लेने उसके मायके आया, अपने पति के साथ फिर वृंदावन पहुँच गई। पहुँचते पहुँचते उसे शाम हो गई, पति वृंदावन में यमुना किनारे रूककर कहने लगा – देखो! शाम का समय है में यमुना जी मे स्नान करके अभी आता हूँ, तुम इस पेड़ के नीचे बैठ जाओ और सामान की देखरेख करना मै थोड़े ही समय में आ जाऊँगा। यही सामने ही हूँ, कुछ लगे तो मुझे आवाज दे देना, इतना कहकर पति चला गया और वह लडकी बैठ गई।

एक हाथ लंबा घूँघट निकाल रखा है, क्योकि गाँव है, ससुराल है और वही बैठ गई, मन ही मन विचार करने लगी – कि देखो! ठाकुर जी की कितनी कृपा है उन्हें मैंने बचपन से भजा और उनकी कृपा से मेरा विवाह भी श्रीधाम वृंदावन में हो गया। मैं इतने वर्षों से ठाकुर जी को मानती हूँ परन्तु अब तक उनसे कोई रिश्ता नहीं जोड़ा? फिर सोचती है ठाकुर जी की उम्र क्या होगी ? लगभग १६ वर्ष के होंगे, मेरे पति २० वर्ष के हैं तो उनसे थोड़े से छोटे है, इसलिए मेरे पति के छोटे भाई की तरह हुए, और मेरे देवर की तरह, तो आज से ठाकुर जी मेरे देवर हुए, अब तो ठाकुर जी से नया सम्बन्ध जोड़कर बड़ी प्रसन्न हुई और मन ही मन ठाकुर जी से कहने लगी – “देखो ठाकुर जी ! आज से मै तुम्हारी भाभी और तुम मेरे देवर हो गए। इतना सोच ही रही थी तभी एक १०- १५ वर्ष का बालक आया और उस लडकी से बोला – भाभी-भाभी !

लडकी अचानक अपने भाव से बाहर आई और सोचने लगी वृंदावन में तो मै नई हूँ ये भाभी कहकर कौन बुला रहा है, नई थी इसलिए घूँघट उठकर नहीं देखा कि गाँव के किसी बड़े-बूढ़े ने देख लिया तो बड़ी बदनामी होगी। अब वह बालक बार-बार कहता पर वह उत्तर न देती बालक पास आया और बोला – भाभी! नेक अपना चेहरा तो देखाय दे, अब वह सोचने लगी अरे ये बालक तो बड़ी जिद कर रहा है, इसलिए कस केघूँघट पकड़कर बैठ गई कि कही घूँघट उठकर देखन ले, लेकिन उस बालक ने जबरदस्ती घूँघट उठकर चेहरा देखा और भाग गया। थोड़ी देर में उसका पति आ गया, उसने सारी बात अपने पति से कही। पति नेकहा – तुमने मुझे आवाज क्यों नहीं दी ? लड़की बोली – वह तो इतनेमें भाग ही गया था। पति बोला – चिंता मत करो, वृंदावन बहुत बड़ा थोड़े ही है, कभी किसी गली में खेलता मिल गया तो हड्डी पसली एक कर दूँगा फिर कभी ऐसा नहीं कर सकेगा। तुम्हे जहाँ भी दिखे, मुझे जरुर बताना।

फिर दोनों घर गए, कुछ दिन बाद उसकी सास ने अपने बेटे से कहा- बेटा! देख तेरा विवाह हो गया, बहू मायके से भी आ गई, पर तुम दोनों अभी तक बाँके बिहारी जी के दर्शन के लिए नहीं गए कल जाकर बहू को दर्शन कराकर लाना। अब अगले दिन दोनों पति पत्नी ठाकुर जी के दर्शन के लिए मंदिर जाते है मंदिर में बहुत भीड़ थी, लड़का कहने लगा – देखो! तुम स्त्रियों के साथ आगे जाकर दर्शन करो, में भी आता हूँ। अब वह आगे गई पर घूंघट नहीं उठाती उसे डर लगता कोई बड़ा बुढा देखेगा तो कहेगा नई बहू घूँघट के बिना घूम रही है।

बहुत देर हो गई पीछे से पति ने आकर कहा – अरी बाबली ! बिहारी जी सामने है, घूँघट काहे नाय खोले, घूँघट नाय खोलेगी तो दर्शन कैसे करेगी, अब उसने अपना घूँघट उठाया और जो बाँके बिहारी जी की ओर देखा तो बाँके बिहारी जी कि जगह वही बालक मुस्कुराता हुआ दिखा। उसे देख वह एकदम से चिल्लाने लगी – सुनिये जल्दी आओ!- जल्दी आओ ! पति पीछे से भागा- भागा आया बोला क्या हुआ? लड़की बोली – उस दिन जो मुझे भाभी-भाभी कहकर भागा था वह बालक मिल गया। पति ने कहा – कहाँ है ,अभी उसे देखता हूँ ?

तो ठाकुर जी की ओर इशारा करके बोली- ये रहा, आपके सामने ही तो है।

उसके पति ने जो देखा तो अवाक रह गया और वही मंदिर में ही अपनी पत्नी के चरणों में गिर पड़ा बोला तुम धन्य हो वास्तव में तुम्हारे ह्रदय में सच्चा भाव ठाकुर जी के प्रति है, मै इतने वर्षों से वृंदावन मै हूँ मुझे आज तक उनके दर्शन नहीं हुए और तेरा भाव इतना उच्च है कि बिहारी जी के तुझे दर्शन हुए।

 

 

गावनि पंडित पड़नि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले…

गावनि पंडित पड़नि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले ॥
गावहि मोहणीआ मनु मोहनि सुरगा मछ पइआले ॥

 

पंडित और धार्मिक विद्वान वेदों के साथ ईश्वर की स्तुति गाते हैं, वे अनंत काल से वेदों का पाठ कर रहे हैं।
मोहिनी (आकर्षक) देवियाँ, जो मन को मोह लेती हैं, स्वर्गों में और समुद्रों में ईश्वर की महिमा गाती हैं।

इस पंक्ति का गहरा विश्लेषण:

1. धार्मिक विद्वानों द्वारा ईश्वर की स्तुति:

“गावनि पंडित पड़नि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले” का अर्थ है कि पंडित (धार्मिक विद्वान) और ऋषि-मुनि वेदों के साथ-साथ ईश्वर की स्तुति गाते हैं। यह दर्शाता है कि वेद, जो हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन और पवित्र ग्रंथ माने जाते हैं, उन्हें सदियों से विद्वान और पंडित पढ़ते आ रहे हैं और उनके माध्यम से ईश्वर की महिमा करते रहे हैं। यहाँ यह बताने की कोशिश की गई है कि सच्चे ज्ञान और विद्वता का उद्देश्य ईश्वर की स्तुति और उनकी महिमा को समझना है।

2. वेदों की अनंत महिमा:

“जुगु जुगु वेदा नाले” का मतलब है कि वेदों का पाठ युगों-युगों से होता आ रहा है। वेद शाश्वत सत्य का प्रतीक हैं, और उनका अध्ययन और गान अनंत काल तक जारी रहेगा। वेदों के माध्यम से ईश्वर की महिमा गाई जाती है, क्योंकि वेदों में ईश्वर की महानता और सृष्टि के रहस्यों का वर्णन होता है। यह दर्शाता है कि वेद और धार्मिक ग्रंथों का मूल उद्देश्य ईश्वर की भक्ति और उनके प्रति समर्पण को बढ़ावा देना है।

3. मोहिनी देवियों द्वारा ईश्वर की स्तुति:

“गावहि मोहणीआ मनु मोहनि” का अर्थ है कि मोहिनी देवियाँ, जो मन को आकर्षित करती हैं, वे भी ईश्वर की स्तुति गाती हैं। मोहिनी देवियाँ यहाँ उन शक्तियों का प्रतीक हैं, जो संसार में लोगों को आकर्षित करती हैं। यहाँ यह दिखाया गया है कि मोहिनी देवियाँ, जो आकर्षण की प्रतीक हैं, वे भी ईश्वर की महिमा का गान करती हैं। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि जो भी संसार में सुंदर और आकर्षक है, वह भी ईश्वर का एक अंश है और उनकी महिमा का ही विस्तार है।

4. स्वर्ग और समुद्रों में स्तुति:

“सुरगा मछ पइआले” का मतलब है कि स्वर्गों में और समुद्रों में भी ईश्वर की महिमा गाई जाती है। यह दर्शाता है कि चाहे वह स्वर्ग हो या समुद्र, हर जगह ईश्वर की स्तुति हो रही है। स्वर्ग और समुद्र, दो बिलकुल अलग-अलग स्थान, यह बताते हैं कि ईश्वर की महिमा और उनका साम्राज्य हर जगह व्याप्त है—आकाश में (स्वर्ग) और धरती के नीचे (समुद्र)। इसका गहरा अर्थ यह है कि ईश्वर की महिमा किसी एक जगह तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूरी सृष्टि में व्याप्त है।

5. मोहिनी शक्तियों का ईश्वर के प्रति समर्पण:

यह शबद यह भी बताता है कि संसार की मोहिनी शक्तियाँ, जो मनुष्य को भटकाने का कार्य करती हैं, वे भी अंततः ईश्वर की ही महिमा गा रही हैं। यानी, जो कुछ भी संसार में आकर्षण का कारण बनता है, उसका मूल स्रोत भी ईश्वर ही हैं। संसार के सभी आकर्षण ईश्वर के ही अंश हैं, और वे भी ईश्वर की स्तुति में लीन रहते हैं।

6. ज्ञान और मोह दोनों का समर्पण:

इस शबद का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि चाहे वह विद्वानों का ज्ञान हो या संसार की मोहिनी शक्तियाँ, दोनों ही ईश्वर के प्रति समर्पित हैं। विद्वान वेदों के ज्ञान के माध्यम से ईश्वर की महिमा गाते हैं, और मोहिनी शक्तियाँ अपने आकर्षण के बावजूद ईश्वर की स्तुति करती हैं। यह हमें यह सिखाता है कि ज्ञान और मोह दोनों का अंतिम उद्देश्य ईश्वर की भक्ति और उनके प्रति समर्पण है।

सारांश:

“गावनि पंडित पड़नि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले ॥
गावहि मोहणीआ मनु मोहनि सुरगा मछ पइआले ॥”
का संदेश यह है कि पंडित, धार्मिक विद्वान और ऋषि-मुनि सदियों से वेदों का पाठ करते हुए ईश्वर की महिमा गाते आ रहे हैं। साथ ही, मोहिनी देवियाँ, जो मन को आकर्षित करती हैं, वे भी स्वर्गों और समुद्रों में ईश्वर की स्तुति गाती हैं। यह पंक्ति हमें यह सिखाती है कि सच्चा ज्ञान और संसार के आकर्षण, दोनों ही ईश्वर की महिमा के गान में समर्पित हैं, क्योंकि ईश्वर ही सभी के मूल स्रोत हैं।

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