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जिव तिसु भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाणु…

जिव तिसु भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाणु ॥
ओहु वेखै ओना नदरि न आवै बहुता एहु विडाणु ॥

जैसा उसे (ईश्वर को) अच्छा लगता है, वह वैसे ही सृष्टि का संचालन करता है, जैसा उसका आदेश होता है।
वह सब कुछ देखता है, लेकिन किसी की दृष्टि में नहीं आता। यह उसकी महान विचित्रता (अद्भुतता) है।

गहरा विश्लेषण:

1. ईश्वर की इच्छा और आदेश:

“जिव तिसु भावै तिवै चलावै” का अर्थ है कि संसार का संचालन ईश्वर की इच्छा के अनुसार होता है। ईश्वर की मर्जी से ही सब कुछ चलता है। इस पंक्ति में यह बताया गया है कि हम जो कुछ भी देख रहे हैं, वह ईश्वर के आदेश और उसकी मर्जी का ही परिणाम है। संसार में हर गतिविधि, हर घटना ईश्वर की योजना और उसकी इच्छा के अनुसार होती है।

“जिव होवै फुरमाणु” का मतलब है कि जैसा ईश्वर का आदेश होता है, वैसे ही सब कुछ होता है। यह पंक्ति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि सृष्टि में ईश्वर का आदेश ही अंतिम और सर्वोपरि है। वह ही सृष्टि का वास्तविक मालिक और नियंत्रक है, और उसकी आज्ञा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता।

2. ईश्वर सब देखता है:

“ओहु वेखै ओना नदरि न आवै” का अर्थ है कि ईश्वर सब कुछ देखता है, लेकिन उसे कोई देख नहीं सकता। यह पंक्ति ईश्वर की सर्वव्यापकता की ओर इशारा करती है। वह हर जगह मौजूद है, हर घटना और हर विचार को देखता है, लेकिन उसकी उपस्थिति को प्रत्यक्ष रूप से महसूस करना या देख पाना असंभव है। उसकी दृष्टि में संसार का हर कोना है, परंतु वह किसी भी भौतिक दृष्टि से दिखाई नहीं देता।

3. ईश्वर की विचित्रता और महानता:

“बहुता एहु विडाणु” का अर्थ है कि यह एक महान विचित्रता (अद्भुतता) है। ईश्वर की इस अदृश्यता और उसकी सर्वव्यापकता को समझना हमारी बुद्धि के परे है। यह उसकी महानता का प्रतीक है कि वह सब कुछ करता है, सब कुछ देखता है, लेकिन हमें दिखाई नहीं देता। यह उसकी लीला और चमत्कार का हिस्सा है कि वह अपने कार्यों से अप्रत्यक्ष रहते हुए भी संसार को चला रहा है।

सारांश:

“जिव तिसु भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाणु ॥
ओहु वेखै ओना नदरि न आवै बहुता एहु विडाणु ॥”
का संदेश यह है कि संसार का संचालन ईश्वर की मर्जी और आदेश से होता है। वह हर चीज़ को देखता है और जानता है, लेकिन उसे कोई देख नहीं सकता। यह उसकी महानता और अद्भुतता है कि वह हर जगह मौजूद होते हुए भी अदृश्य रहता है। ईश्वर की इस लीला को समझ पाना हमारी बुद्धि से परे है।

मुकदमा…

फरीदा साहिब दी करि चाकरी दिल दी लाहि भरांदि ॥
दरवेसां नो लोड़ीऐ रुखां दी जीरांदि ॥

“श्यामलाल तुम्हारा ही नाम है?” उस सिपाही ने पुलिसिया रौब से पूछा।

“जी हाँ, मैं ही हूँ श्यामलाल, कहिये।”

“चलो तुम्हे कोर्ट चलना है, तुम्हारे बेटे ने तुम्हारे खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया है, आज तुम्हारी कोर्ट में पेशी है।” सिपाही ने कहा।

सुनते ही उस बूढे आदमी की आँखे भर आईं, “हे भगवान अब यही दिन देखना बाकी रह गया था।” कहते हुए बूढा उठकर सिपाही के साथ हो लिया।

श्यामलाल को पुलिस जीप में बैठते हुए देख मोहल्ले के कुछ लोग भी पुलिस जीप के पीछे हो लिए।

कोर्ट में श्यामलाल को कटघरे में खड़ा किया गया, फरियादी पक्ष के वकील ने जज को बताया, “योर ऑनर ! मेरे क्लाइंट मिस्टर नरेश ने अपने पिता श्यामलाल पर ये इल्जाम लगाया है कि उसने उसकी परवरिश सही ढंग से नहीं की , इसलिए आज समाज में उसकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, और उसे समाज में नीचा देखना पड़ रहा है।”

“नरेश ! आप बताइये क्या माजरा है ?” जज ने नरेश से पूछा।

“जज साहब, मेरी माँ , जब मैं दस साल का था तभी गुज़र गई । मेरा बाप मजदूरी करने जाता था, उसने मुझे पढ़ाया लिखाया । मेरी नौकरी लगी और मेरी शादी भी की, पर इन सबके बावजूद इसने मेरी परवरिश सही से नहीं की और संस्कार नहीं दिए । इसलिए समाज में आज न केवल मेरा अपमान हो रहा है, बल्कि मेरा भविष्य भी अंधकार में है।” नरेश ने कहा।

“पहेलियाँ मत बुझाओ , सीधी बात कहो।” जज ने उसे डाँटा।

“जज साहब, इन दिनों मेरी बीवी मेरे पिता को वृद्धाश्रम में भेजने के लिए पीछे पड़ी हुई है और मैं उसका विरोध नहीं कर पा रहा हूँ । अगर मेरे पिता ने मेरी सही परवरिश की होती और संस्कार दिए होते , तो मैं उसका विरोध करता और अपने पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ने को राजी नहीं होता । चूंकि मेरे पिता ने मुझे संस्कार नहीं दिये , तो मैं नहीं जानता सही परवरिश और संस्कार क्या होते हैं ? इस कारण मैं अपने बेटे को भी वो संस्कार नहीं दे पा रहा हूँ , इसलिए मेरा भविष्य अंधकार में है । कल को मेरा बेटा भी संस्कारों और परवरिश के अभाव में मुझे और मेरी पत्नी को वृद्धाश्रम में भेज सकता है, और मेरे पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ने से मेरी समाज में भी बेइज्जती होगी । इसलिए मैं चाहता हूं मेरे पिता को इसके लिए सजा दी जाए।” नरेश ने अपनी समस्या बताई।

जज सोच में पड़ गया, कुछ देर सोचने के बाद जज ने कहा ,”नरेश कानून में ऐसे काम के लिए कोई सजा मुकर्रर नहीं है । तुम बताओ अपने पिता के लिए क्या सजा होनी चाहिए ? ”

“जज साहब मैं चाहता हूँ मेरे पिता को पाबंद किया जाए कि अगले दस वर्ष तक मेरी अच्छे से परवरिश करें और मुझे संस्कार दे ताकि मैं भी अपने बेटे की सही परवरिश करना सीख सकूँ।”

“ठीक है, ये कोर्ट श्यामलाल को दस साल के लिए पाबंद करता है कि वो अपने बेटे नरेश की अच्छी परवरिश करे और उसे संस्कार दे।”

“जज साहब एक दरख्वास्त और है मेरी।” नरेश ने कहा।

“हाँ बोलो।”जज नरेश का मन्तव्य और तरीके से खुश था।

“जज साहब कुछ लोग डरा कर, धमका कर और फुसलाकर मेरे पिता को मेरी परवरिश करने से रोक सकते हैं, उन्हें भी पाबंद किया जावे की ऐसा कोई कृत्य न करे।”नरेश ने कहा।

” ठीक है ….कोर्ट ये आदेश भी देती है कि तुम्हारी परवरिश करने में तुम्हारे पिता के लिए कोई भी बाधा उतपन्न करेगा तो पुलिस उसे पकड़ कर कोर्ट में पेश करेगी।”कहकर जज ने कोर्ट बर्खास्त कर दिया।

श्यामलाल ने नरेश को गले से लगा लिया, दोनों की आँखे छलक आईं थी, नरेश की बीवी अपने बेटे को लेकर चुपचाप घर के लिए निकल गई । वो समझ चुकी थी नरेश ने ये सब करके अपने वर्तमान के साथ भविष्य भी सुधार लिया था।

एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु…

एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु ॥
इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीबाणु ॥

 

एक माँ (माया या प्रकृति) है, जो विधि (सृष्टि की प्रक्रिया) द्वारा सृजित है और जिसने तीन शिष्य (तत्व या देवता) उत्पन्न किए हैं।
एक सृष्टि का संचालन करता है, दूसरा भंडार (धन-संपत्ति) का प्रबंध करता है, और तीसरा न्याय करता है।

गहरा विश्लेषण:

1. एक माँ (माया या प्रकृति):

“एका माई” का मतलब है एक माँ, जो सृष्टि का मूल कारण है। इस माँ को माया या प्रकृति कहा जा सकता है। यह माँ सृष्टि की आधारभूत शक्ति है, जिससे संसार का निर्माण होता है। यह सृष्टि की सारी प्रक्रियाओं को संचालित करने वाली शक्ति है।

2. विधि द्वारा सृजित:

“जुगति विआई” का अर्थ है कि यह माँ विधि (सृष्टि की प्रक्रिया) द्वारा उत्पन्न की गई है। सृष्टि का संचालन एक निश्चित नियम और प्रणाली के अनुसार होता है, जिसे सृष्टि का विधान कहा जा सकता है। इस पंक्ति में कहा गया है कि यह माँ (माया या प्रकृति) सृष्टि के नियमों और विधियों के अनुसार कार्य करती है।

3. तीन शिष्य (तत्व या देवता):

“तिनि चेले परवाणु” का मतलब है कि इस माँ ने तीन शिष्य (तत्व या देवता) उत्पन्न किए हैं, जिन्हें संसार में अलग-अलग कार्य सौंपे गए हैं। ये शिष्य प्रतीकात्मक रूप से ब्रह्मा, विष्णु, और शिव हैं, जो सृष्टि के निर्माण, पालन, और संहार के प्रतीक हैं।

4. संसार का संचालन:

“इकु संसारी” का अर्थ है कि पहला शिष्य (तत्व) सृष्टि का संचालन करता है। यह ब्रह्मा का प्रतीक है, जो सृष्टि का सृजनकर्ता है। संसार में जो कुछ भी निर्मित हो रहा है, उसका कार्य इस शिष्य का है।

5. भंडार का प्रबंध:

“इकु भंडारी” का मतलब है कि दूसरा शिष्य संसार के भंडार (धन, संपत्ति, संसाधनों) का प्रबंध करता है। यह विष्णु का प्रतीक है, जो सृष्टि का पालन और संरक्षण करता है। सृष्टि के सभी संसाधनों का संतुलन बनाए रखना उसका कार्य है।

6. न्याय का प्रबंध:

“इकु लाए दीबाणु” का अर्थ है कि तीसरा शिष्य न्याय करता है। यह शिव का प्रतीक है, जो सृष्टि के विनाश और न्याय का प्रतिनिधित्व करता है। यह तत्व संसार में संतुलन बनाए रखने के लिए न्याय करता है और पुराने का अंत करके नए की शुरुआत करता है।

सारांश:

“एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु ॥
इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीबाणु ॥”
का संदेश यह है कि सृष्टि एक माँ (माया या प्रकृति) के द्वारा संचालित होती है, जिसने तीन शिष्य (तत्व या देवता) उत्पन्न किए हैं। इनमें से एक सृष्टि का निर्माण करता है, दूसरा संसार के भंडारों का प्रबंध करता है, और तीसरा न्याय और विनाश का कार्य करता है। यह जीवन के निर्माण, संरक्षण और समाप्ति की प्रक्रियाओं का प्रतीकात्मक वर्णन है, जो सृष्टि के संतुलन और संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

मिथ्या अभिमान

फरीदा कोठे मंडप माड़ीआ उसारेदे भी गए ॥
कूड़ा सउदा करि गए गोरी आइ पए ॥

 

समुद्रतट पर बसे नगर में एक धनवान वैश्य रहता था। उसके पुत्रों ने एक कौआ पाल रखा था। वे उसे अपना जूठन खिलाते रहते और कौआ भी मस्त रहता। एक बार कुछ हंस आकर वहां उतरे। वैश्य के पुत्र हंसों की प्रशंसा कर रहे थे, जो कौए से सही नहीं गई। वह उन हंसों के पास पहुंचा और उनमें से एक हंस से बोला – लोग नाहक ही तुम्हारी तारीफ करते हैं। तुम मुझे उड़ान में हराओ तो जानूं! हंस ने उसे समझाया भैया, हम दूर-दूर उडऩे वाले हैं।

हमारा निवास मानसरोवर यहां से बहुत दूर है। हमारे साथ प्रतियोगिता करने से तुम्हें क्या लाभ होगा? कौए ने अभिमान के साथ कहा कि मैं उडऩे की सौ गतियां जानता हूं। मुझे पता है कि तुम हारने के डर से हमारे साथ नहीं उड़ रहे हो। तब तक कुछ और पक्षी भी वहां आ गए। वे भी कौए की हां में हां मिलाने लगे। आखिर वह हंस कौए के साथ प्रतियोगिता के लिए राजी हो गया। इसके बाद हंस और कौआ समुद्र की ओर उड़ चले। समुद्र के ऊपर वह कौआ नाना प्रकार की कलाबाजियां दिखाते हुए पूरी शक्ति से उड़ा और हंस से कुछ आगे निकल गया।

हंस अपनी स्वाभाविक मंद गति से उड़ रहा था। यह देख दूसरे कौए प्रसन्नता प्रकट करने लगे। पर थोड़ी ही देर में कौआ थकने लगा। वह विश्राम के लिए इधर-उधर वृक्षयुक्त द्वीपों की खोज करने लगा, परंतु उसे अनंत जलराशि के अतिरिक्त कुछ नहीं दिख रहा था। तब तक हंस उड़ते-उड़ते कौए के समीप आ चुका था। कौए की गति मंद पड़ चुकी थी। वह बेहद थका हुआ और समुद्र में गिरने की दशा में पहुंच गया था।

हंस ने देखा कि कौआ बार-बार समुद्र जल के करीब पहुंच रहा है, लिहाजा उसने पास आकर पूछा – काक! तुम्हारी चोंच और पंख बार-बार पानी में डूब रहे हैं। यह तुम्हारी कौन-सी गति है? हंस की व्यंग्यभरी बात सुनकर कौआ दीनता से बोला – यह मेरी मूर्खता थी, जो मैंने तुमसे होड़ करने की ठानी। कृपा कर मेरे प्राण बचा लो। हंस को कौए पर दया आ गई और उसने अपने पंजों से उसे उठाकर अपनी पीठ पर रखा और लौटकर वापस उसे उसके मूल स्थान पर छोड़ दिया।

सार यह है कि कभी किसी को अपनी शक्तियों पर मिथ्या अभिमान नहीं करना चाहिए।

आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु …

आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥

 

उस (ईश्वर) को बार-बार नमन है।
वह आदि (सृष्टि से पहले मौजूद), अनील (निर्मल), अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं), और अनाहत (जिसे कोई चोट या घाव नहीं पहुँच सकता) है।
वह युगों-युगों से एक ही रूप में है।

गहरा विश्लेषण:

1. ईश्वर को नमन:

“आदेसु तिसै आदेसु” का अर्थ है “उस ईश्वर को बार-बार नमन है।” यह वंदना ईश्वर की महानता और उसकी सर्वशक्तिमान स्थिति की ओर इशारा करती है। हम ईश्वर को बार-बार प्रणाम करते हैं क्योंकि वह ही इस सृष्टि का सृजनकर्ता और पालनकर्ता है।

2. आदि (सृष्टि से पहले मौजूद):

ईश्वर को “आदि” कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह सृष्टि के आरंभ से पहले भी मौजूद था। वह समय और सृष्टि की सीमाओं से परे है। इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर अनंत और शाश्वत है।

3. अनील (निर्मल):

“अनील” का अर्थ है निर्मल, यानी ईश्वर शुद्ध और पवित्र है। वह सभी प्रकार की अशुद्धियों और दोषों से परे है। उसकी पवित्रता और शुद्धता अनंत है और किसी भी सांसारिक चीज़ से नहीं मापी जा सकती।

4. अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं):

“अनादि” का अर्थ है जिसका कोई आरंभ नहीं है। ईश्वर सदा से है और सदा रहेगा। इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर न समय के बंधन में बंधा है और न ही उसका कोई अंत है। वह अनंत काल तक अस्तित्व में है।

5. अनाहत (जिसे कोई चोट नहीं पहुँच सकती):

“अनाहत” का अर्थ है जिसे कोई चोट या घाव नहीं पहुँच सकता। इसका तात्पर्य यह है कि ईश्वर किसी भी भौतिक या सांसारिक क्षति से अछूता है। वह अद्वितीय और अभेद्य है।

6. युगों-युगों से एक ही रूप:

“जुगु जुगु एको वेसु” का अर्थ है कि युगों-युगों से ईश्वर का रूप एक ही है। समय चाहे कितना भी बदल जाए, ईश्वर का अस्तित्व और उसकी सत्ता अपरिवर्तित रहती है। वह हर युग में एक समान रहता है और उसकी महिमा अनंत है।

सारांश:

“आदेसु तिसै आदेसु ॥
आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥”
का संदेश है कि हम उस ईश्वर को बार-बार नमन करते हैं, जो सृष्टि के आरंभ से पहले मौजूद है, जो निर्मल, अनादि और अभेद्य है। वह युगों-युगों से एक ही रूप में है और सदा रहेगा। ईश्वर की महानता और उसकी शाश्वत सत्ता इस पंक्ति में वर्णित है, जो हमें यह सिखाती है कि हमें हमेशा उसकी महानता को स्वीकार कर उसे प्रणाम करना चाहिए।

अच्छा चोर…

फरीदा गलीए चिकड़ु दूरि घरु नालि पिआरे नेहु ॥
चला त भिजै क्मबली रहां त तुटै नेहु ॥

 

एक नगर में एक सेठ और एक गरीब का घर पास पास में थे। सेठ को कभी मलाल न होता था कि एक गरीब उसका पड़ोसी है। गरीब की बेटी जिसका नाम रुक्मणि था, सयानी हो चुकी थी। एक रोज़ गरीब ने सेठ से कुछ धन उधार माँगा था ताकि सयानी हुई बेटी के हाथ पीले किये जा सकें। परन्तु सेठ ने उसे इनकार कर दिया।

उसी रात सेठ के घर में एक चोर घुस आया। अभी तक सेठ और सेठानी सोये नहीं थे, तो चोर वहीं दुबक कर बैठ गया।

सेठ सेठानी आपस में बातें कर रहे थे, “देखते ही देखते रुक्मणि विवाह योग्य हो गई है।” सेठानी ने कहा।

“हां लड़कियां कुरड़ी(कूड़े का ढेर) की तरह बढ़ती हैं, पता ही नहीं चलता कब सयानी हो जाती हैं।” सेठ ने कहा।

“अब रुक्मणि के पिता को उसके हाथ पीले कर देने चाहिए, पता नहीं उसके माता पिता क्यों नहीं ये बात सोच रहे।” सेठानी ने कहा।

“वो सोच तो रहें हैं, पर उनके पास धन की कमी है। आज रुक्मणि के पिता ने मुझसे कुछ धन उधार मांगा था।” सेठ ने बताया।

“तो क्या आपने उनको धन दिया?” सेठानी ने पूछा।

“नहीं मैंने उसे देने से इनकार कर दिया, ये सोचकर कि वो गरीब आदमी है लौटाएगा कैसे…पर मुझे लगता है रुक्मणि के पिता को कुछ धन दे देना चाहिए। लड़की का कन्यादान ही समझ लेता। इससे कुछ पुण्य मिल जाता, पर मैं अब उसे नहीं दे सकता। जिसे मैं धन के लिए एक बार मना कर देता हूँ ,उसे दुबारा धन नहीं देता।” कहते हुए सेठ ने आह भरी। कुछ देर बाद सेठ सेठानी बातें करते करते सो गए।

चोर ने सेठ के घर से धन की पोटली चुरा ली और सेठ के घर से निकल आया। सेठ के घर से निकल कर उसे याद आया कि उसकी पत्नी ने कुछ बर्तन चुरा कर लाने का बोला था। वो तो वह भूल गया था, पर अब दुबारा सेठ के घर में घुसना उसे सुरक्षित नहीं लगा, तो उसने सोचा गरीब के घर से कुछ बर्तन चुरा ले जाता हूँ। यह सोचकर वह गरीब के घर में बरतन चुराने के उद्देश्य से घुस गया।

गरीब के घर में भी जाग थी। जिसकी सयानी बेटी घर में कंवारी बैठी रहे उन माता पिता को नींद भी कैसे आये।

चोर दुबक कर बैठ गया।

“…तो सेठ ने धन देने से इनकार कर ही दिया।” गरीब की पत्नी ने कहा।

“हाँ! इनकार कर दिया, पर वो अपनी जगह सही भी है। वो व्यापारी आदमी है। उसे धन का लेन देन करना होता है। हम उसे समय पर धन न लौटा पाये तो उसके व्यापार की पूँजी अटक जाएगी। अब उसे भी अपना सोचना होगा।” गरीब ने ये कहते हुए ठंडी आह भरी।

“परन्तु आप जानते हो न रुक्मणि की उम्र 16 वर्ष हो चुकी है और उन सन्यासी बाबा ने कहा था कि अगर 17 वर्ष के होने तक इसका विवाह न किया तो रुक्मणि की मृत्यु हो जाएगी। रुक्मणि को 17 वर्ष की होने में केवल 4 मास शेष बचे हैं। नहीं तो हमारी इकलौती बेटी हमें बुढ़ापे में बेसहारा छोड़कर भगवान को प्यारी हो जाएगी।” गरीब की पत्नी ने सुबकते हुए कहा।

“हाय रे मेरी किस्मत! मुझे गरीब के घर पैदा किया और साथ में रुक्मणि को मिला अभिशाप… मैं क्या करूँ… कहाँ से धन लाऊँ उसका कन्यादान करने के लिए…इससे बेहतर ईश्वर रुक्मणि की जगह मेरे प्राण ले ले।” गरीब ने आह भरी।

चोर सब सुन रहा था। चोर ने सोचा मैं तो अपनी मौज मस्ती के लिए चोरी करता हूँ। असली धन की आवश्यकता तो इस गरीब को है वरना इसकी बेटी मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी। वो सन्तान को खोने का दर्द वो समझता था। दो वर्ष पूर्व उसके छोटे पुत्र की सर्पदंश से मृत्यु हो चुकी थी। मुझसे अच्छा तो वो सेठ ही है, जिसने कम से कम इसे धन देने का सोचा तो सही।

उसने रसोई में से कुछ बर्तन चुरा कर अपनी साथ में लाई झोली में डाल लिए। चूल्हे में से एक कोयला निकाला और आँगन में ये लिख दिया, “सेठ की तरफ से रुक्मणि के विवाह के लिए दिया गया धन,…. एक चोर।” उसके पास धन की पोटली रखकर और चुराए हुए बर्तन लेकर वहाँ से रफूचक्कर हो गया, क्योंकि उसे भी पत्नी से उलाहना नहीं लेना था।

सुबह दोनों घरों में हड़कंप था। सेठ के यहाँ धन चोरी से और गरीब के यहाँ धन मिलने से, और बर्तन चोरी होने से। एक बार तो गरीब ने सोचा क्यों न धन छुपा लूँ। रुक्मणि का विवाह कर दूँगा… फिर उसने सोचा कि लोग पूछेंगे तो क्या कहूंगा? धन कहाँ से आया…और लोग शक करेंगे सेठ के घर मैंने चोरी की है। मुझसे अच्छा तो वो चोर ही अच्छा निकला, जो मेरी व्यथा सुनकर चुराया हुआ धन रुक्मणि के विवाह के लिए छोड़कर चला गया। जब एक चोर इतनी दयालुता दिखा सकता है तो मैं क्या ईमानदारी नहीं निभा सकता?

गरीब सेठ के धन की पोटली उसके घर ले गया और सारा किस्सा कह सुनाया। सेठ को अपने घर लाकर चोर की लिखी हुई बात भी पढ़वाई।

सेठ ने सोचा ‘एक चोर इतना अच्छा हो सकता है। चुराया हुआ धन इस गरीब की बेटी के विवाह के लिए छोड़ जाता है और कहता है कि सेठ की तरफ से है। तो क्या मैं इस गरीब की बेटी के लिए कुछ धन नहीं दे सकता?’ ,

उसने गरीब को उस पोटली में से आधा धन दे दिया और कहा “ये लो ..ये धन रुक्मणि के विवाह के लिए है और इसे लौटाने की भी जरूरत भी है।”

यह सुनकर गरीब बोला, “सेठ जी आप बहुत अच्छे हैं।”

“अच्छा न मैं हूँ, न तुम हो। अच्छा तो वो चोर था जिसने रुक्मणि के विवाह की व्यवस्था कर दी। मेरे पास धन होते हुए भी मैं तुम्हें न दे सका…और वो चुराया हुआ धन भी दे गया, काश ऐसे अच्छे चोर और भी हों।” सेठजी ने ये कहते हुए गरीब को गले से लगा लिया।

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