Author name: EkAdmin

माया मोहे अर्थ देखि करि काहै कू गरवाना।

गुर गमि प्रमाणु तै पाइओ सतु संतोखु ग्राहजि लयौ ॥
हरि परसिओ कलु समुलवै जन दरसनु लहणे भयौ ॥

तो हर कोई उसे जानता था। जगत विख्यात आदमी था। उसने आकर एअरपोर्ट के इनक्वायरी दफ्तर में पूछा, कि यहां सस्ते से सस्ता होटल कौन सा है? उस आदमी ने गौर से देखा कि आदमी तो वही मालूम पड़ता हैं। सुबह ही तो अखबार में फोटो देखी है, हेनरी फोर्ड की। उसने कहा, माफ करिए। क्या आप हेनरी फोर्ड हैं! सुबह आपका अखबार में फोटो देखा। उसने कहा कि जी! उस आदमी ने कहा, कि हेनरी फोर्ड हो कर आप सस्ता होटल खोज रहे हैं! तो उसने कहा, क्योंकि मैं हेनरी फोर्ड हूं, सस्ते में रहूं कि महंगे में, कोई फर्क नहीं पड़ता। हेनरी फोर्ड हेनरी फोर्ड है। सारी दुनिया जानती है।

उस आदमी ने का कि आपके लड़के आते हैं। वे हमेशा ऊंचा होटल खोजते हैं। उसने कहा, उनको भी भरोसा नहीं है। मैं आश्वस्त हूं। उनको कभी भी भरोसा नहीं। कमाया मैंने है। वे तो मुफ्तखोर हैं। आश्वस्त हो भी कैसे सकते हैं? कमाई बाप की है। कमाई जिसकी है, उसका बल है। तो वे दिखलाना चाहते हैं। बड़े से बड़ा होटल! अमीर आदमी सादगी से रहने लगता है।

मैंने सुना है कि ऐसा हुआ, कि हेनरी फोर्ड और फायर स्टोन कंपनी का प्रथम मालिक फायर स्टोन, दोनों; और एक कवि हेनरी वैलेस तीनों एक पुरानी हेनरी फोर्ड की पुरानी कार में एक यात्रा पर गए थे। बीच में एक गांव पर पेट्रोल भरवाने के लिए रुके। तो हेनरी फोर्ड खुद ही गाड़ी चला रहा था। पीछे फायर स्टोन बैठा था वालेस बैठा था, जो कवि था। तीनों की बड़ी दाढ़ी और तीनों बड़े संभ्रात व्यक्ति।

हेनरी फोर्ड ने ऐसे ही बात की बात में, जो आदमी पेट्रोल भरने आया उससे कहा, कि तुम सोच भी नहीं सकते कि तुम किसकी गाड़ी में पेट्रोल भर रहे हो? मैं हेनरी फोर्ड हूं। हेनरी फोर्ड यानी सारी दुनिया की मोटरों का मालिक।

उस आदमी ने ऐसे ही गौर से देखा और कहा हूं। उसको भरोसा नहीं आया, कि हेनरी फोर्ड यहां क्या मरने आएंगे, इस छोटे गांव में? और अगर हेनरी फोर्ड ही है, तो बताने की क्या जरूरत? वह अपना पेट्रोल भरता रहा। हेनरी हुई, कि उसने कुछ भी नहीं कहा। उसने कहा, शायद तुम्हें पता न हो कि मेरे पीछे जो बैठे हैं वे फायर स्टोन हैं–फायर स्टोन टायरों के मालिक। उस आदमी ने पीछे भी गौर से देखा और जोर से कहा हूं! और जैसे ही हेनरी फोर्ड ने कहा कि तुम्हें शायद कल्पना भी नहीं हो सकती कि तीसरा आदमी कौन है।

इस आदमी ने नीचे पड़ा लोहे का डंडा उठाया और कहा कि तुम मुझसे यह मत कहना, कि ये ही परमात्मा है जिन्होंने दुनिया बनाई। सिर खोल दूंगा। सभी मौजूद हैं! एक परमात्मा ही भर मौजूद नहीं है समझो।

हेनरी फोर्ड वरना सादा आदमी था, कि उसके कपड़े देख कर कोई पहचान नहीं सकता था कि हेनरी फोर्ड हैं; न उसकी कार देखकर। क्योंकि वह पहला माडल–टी माडल; जो उसने बनाया था, उसी में यात्रा करता रहा जिंदगी भर। अच्छे माडल बने, अच्छी कारें आई लेकिन हेनरी फोर्ड अपने टी माडल में चलता रहा।

और साधु जैसा लगता था। इसलिए तो भरोसा नहीं आया कि हेनरी फोर्ड इस गांव में क्या करेंगे? और फिर यह वेशभूषा। सांताक्लाज हो सकते हैं लेकिन हेनरी फोर्ड?

सीधा आदमी था। धनी आदमी सादगी से भर जाता है। कुछ आश्चर्य नहीं, कि महावीर, बुद्ध राजपुत्र हो कर भिखारी हो गए। सिर्फ राजपुत्र ही भिखारी हो सकते हैं। भिखारी तो राजपुत्र होना चाहता है। जो तुम नहीं हो, वह तुम होना चाहते हो। जो तुम हो, वह होने की आकांक्षा चली जाती है। आदमी इसीलिए तो इतना गर्वाया फिरता है; कि जो-जो उसमें नहीं है, वह उसी कह खबर देता है। और उसके भीतर घाव छिपे हैं गर्व के।

जिस चीज में आदमी गर्व करे, तुम समझ लेना कि वही उसकी हीनता की ग्रंथि है। उसको तुम जरा छुओ तुम पाओगे, भीतर से घाव निकल आया, मवाद बहने लगी। वह क्रोधित हो जाएगा। पंडित के ज्ञान पर शक मत करना; अन्यथा वह झगड़ने को तैयार हो जाएगा, विवाद पर उतारू हो जाएगा। गरीब आदमी के धनी होने पर संदेह मत उठाना, मान लेना। शिष्टाचार वही है। चुपचाप कह देना, कि निश्चित। आप जैसा धनी और कौन?

जो तुम्हारे पास है, तुम उसकी घोषणा नहीं करते।

माया मोहे अर्थ देखि करि काहै कू गरवाना।

भयभीत आदमी बहादुरी की बातें करता है। भयभीत आदमी हमेशा दावेदारी करता है कि मैं बड़ा वीर पुरुष हू

कच पकाई ओथै पाइ ॥ नानक गइआ जापै जाइ ॥

कच पकाई ओथै पाइ ॥ नानक गइआ जापै जाइ ॥

 

जो कच्चे (अधूरे) और पक्के (पूर्ण) कर्म हैं, वे वहीं (ईश्वर के दरबार में) जाकर परखे जाते हैं।
नानक कहते हैं, जब व्यक्ति वहाँ पहुँचता है, तब उसे अपनी सच्चाई का अहसास होता है।

गहरा विश्लेषण:

  1. कच्चे और पक्के कर्मों का मूल्यांकन: “कच पकाई ओथै पाइ” का अर्थ है कि हमारे अच्छे (पक्के) और बुरे (कच्चे) कर्मों का वास्तविक मूल्यांकन ईश्वर के दरबार में ही होता है। इस संसार में किए गए कर्म, चाहे वे अधूरे या स्वार्थपूर्ण हों, या फिर वे सच्चे और ईमानदार हों, सबका मूल्यांकन केवल ईश्वर की अदालत में हो सकता है। यहाँ कच्चे कर्म से आशय है वे कर्म जो स्वार्थ, लोभ, और मोह के कारण किए जाते हैं, जबकि पक्के कर्म वे हैं जो सत्य, धर्म और प्रेम के आधार पर किए गए हों।
  2. सच्चाई का अहसास: “नानक गइआ जापै जाइ” का मतलब है कि जब व्यक्ति मृत्यु के बाद ईश्वर के दरबार में पहुँचता है, तब उसे अपने किए गए कर्मों की वास्तविकता समझ में आती है। जीवन में हम अपने कर्मों के बारे में जैसा सोचते हैं, ईश्वर के दरबार में उसकी सच्चाई प्रकट होती है। यही वह समय होता है जब हमें यह समझ में आता है कि हमने जीवन में सही किया या गलत।

संदेश:

यह शबद हमें यह सिखाता है कि हमारे कर्मों का असली मूल्यांकन केवल ईश्वर के दरबार में होता है। इस संसार में हम जो भी कर्म करते हैं, चाहे वह अच्छे हों या बुरे, ईश्वर की नज़र में उनकी सच्चाई प्रकट होती है। इसलिए हमें हमेशा पक्के, सच्चे, और धर्मपूर्ण कर्म करने चाहिए ताकि हमें अंत में पछताना न पड़े।

सारांश:

“कच पकाई ओथै पाइ” से लेकर “नानक गइआ जापै जाइ” तक का संदेश यह है कि जीवन में किए गए हमारे कर्म, चाहे अधूरे या पूरे हों, ईश्वर के दरबार में जाकर उनकी सच्चाई प्रकट होती है। मृत्यु के बाद, व्यक्ति को अपने कर्मों का सही मूल्यांकन पता चलता है। इसलिए जीवन में सच्चे और धर्मपूर्ण कार्यों पर ध्यान देना आवश्यक है

बासी रोटी….

सतिगुरू कल सतिगुर तिलकु सति लागै सो पै तरै ॥
गुरु जगत फिरणसीह अंगरउ राजु जोगु लहणा करै ॥

 

एक लड़का था | माँ ने उसका विवाह कर दिया | परन्तु वह कुछ कमाता नहीं था | माँ जब भी उसको रोटी परोसती थी, तब वह कहती कि बेटा, ठण्डी रोटी खा लो | लड़के की समझ में नहीं आया कि माँ ऐसा क्यों कहती है | फिर भी वह चुप रहा |

एक दिन माँ किसी काम से बाहर गयी तो जाते समय अपनी बहू (उस लड़के की स्त्री) – को कह गयी कि जब लड़का आये तो उसको रोटी परोस देना | रोटी परोसकर कह देना कि ठण्डी रोटी खा लो |

उसने अपने पति से वैसा ही कह दिया तो वह चिढ़ गया कि माँ तो कहती ही है, वह भी कहना सीख गयी !

वह अपनी स्त्री से बोला कि बता, रोटी ठण्डी कैसे हुई ? रोटी भी गरम है, दाल-साग भी गरम है, फिर तू ठण्डी रोटी कैसे कहती है ?

वह बोली की यह तो आपकी माँ जाने | आपकी माँ ने मेरे को ऐसा कहने के लिये कहा था, इसलिये मैंने कह दिया |

वह बोला कि मैं रोटी नहीं खाऊँगा | माँ तो कहती ही थी, तू भी सीख गयी !

माँ घर आई तो उसने बहू से पूछा कि क्या लड़के ने भोजन कर लिया ? वह बोली कि उन्होंने तो भोजन किया ही नहीं, उलटा नाराज हो गये !

माँ ने लड़के से पूछा तो वह बोली कि माँ तू तो रोजाना कहती थी कि ठण्डी रोटी खा ले और मैं सह लेता था, अब यह भी कहना सीख गयी | रोटी तो गरम होती है, तू बता कि रोटी ठण्डी कैसे है ?

माँ ने पूछा कि ठण्डी रोटी किसको कहते हैं ?

वह बोला – सुबह की बनायी हुई रोटी शाम को ठण्डी होती है | बासी रोटी ठण्डी और ताज़ी रोटी गरम होती है |

माँ ने कहा – बेटा, अब तू विचार करके देख तेरे बाप की जो कमाई है, वह ठण्डी, बासी रोटी है | गरम, ताज़ी रोटी तो तब होगी, जब तू खुद कमाकर लायेगा |

लड़का समझ गया और माँ से बोला कि अब मैं खुद कमाऊँगा और गरम रोटी खाऊँगा |

करमी करमी होइ वीचारु ॥ सचा आपि सचा दरबारु

करमी करमी होइ वीचारु ॥ सचा आपि सचा दरबारु ॥
तिथै सोहनि पंच परवाणु ॥ नदरी करमि पवै नीसाणु ॥

 

कर्मों के आधार पर ही न्याय होता है।
सच्चा (ईश्वर) स्वयं सच्चे दरबार में उपस्थित रहता है।
वहाँ (सच्चे दरबार में) स्वीकार किए गए श्रेष्ठ व्यक्ति ही शोभा पाते हैं।
कृपा से ही ईश्वर की दृष्टि में पहचान मिलती है।

गहरा विश्लेषण:

  1. कर्मों के आधार पर न्याय: “करमी करमी होइ वीचारु” का अर्थ है कि हमारे कर्मों के आधार पर ही न्याय किया जाता है। इस जीवन में जो भी कर्म हम करते हैं, वही हमारे अगले जीवन या मोक्ष की दिशा तय करते हैं। यहाँ यह समझाया गया है कि ईश्वर के दरबार में केवल हमारे कर्मों के आधार पर ही विचार किया जाता है, कोई बाहरी आडंबर या दिखावा नहीं चलता।
  2. सच्चा ईश्वर और सच्चा दरबार: “सचा आपि सचा दरबारु” बताता है कि ईश्वर स्वयं सच्चा है और उसका दरबार भी सच्चा है। यह बताता है कि ईश्वर का न्याय कभी गलत नहीं हो सकता, वह न केवल सत्य का पालन करता है बल्कि उसका न्याय भी सत्य पर आधारित होता है।
  3. श्रेष्ठ व्यक्तियों की स्वीकृति: “तिथै सोहनि पंच परवाणु” का अर्थ है कि ईश्वर के दरबार में केवल वे ही लोग शोभा पाते हैं जो श्रेष्ठ कर्मों वाले (पंच) होते हैं और जिन्हें ईश्वर की स्वीकृति प्राप्त होती है। ये श्रेष्ठ व्यक्ति (पंच) वे हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को पवित्र किया है और सत्य मार्ग पर चले हैं।
  4. कृपा से प्राप्त पहचान: “नदरी करमि पवै नीसाणु” का मतलब है कि ईश्वर की कृपा से ही कोई व्यक्ति उसकी दृष्टि में स्थान और पहचान पाता है। केवल अपने कर्मों के बल पर व्यक्ति मोक्ष या पहचान प्राप्त नहीं कर सकता, इसमें ईश्वर की कृपा और उसकी नज़र में आना भी आवश्यक है।

संदेश:

यह शबद हमें यह सिखाता है कि इस संसार में केवल हमारे कर्म ही मायने रखते हैं। ईश्वर का दरबार सच्चा है, और वहाँ केवल उन्हीं को स्थान मिलता है जिन्होंने धर्म और सत्य का पालन किया है। ईश्वर की कृपा के बिना मोक्ष या उसकी निकटता प्राप्त करना संभव नहीं है, चाहे व्यक्ति कितने भी अच्छे कर्म क्यों न करे। ईश्वर की कृपा और न्याय में उच्च और निम्न का भेद नहीं होता, वहाँ केवल सत्य और कर्म की परीक्षा होती है।

सारांश:

“करमी करमी होइ वीचारु” से लेकर “नदरी करमि पवै नीसाणु” तक का संदेश यह है कि जीवन में केवल हमारे कर्म ही न्याय का आधार होते हैं। ईश्वर का दरबार सच्चा है, और वहाँ केवल श्रेष्ठ व्यक्ति (पंच) ही सम्मानित होते हैं। लेकिन, इन सबके साथ-साथ, ईश्वर की कृपा और उसकी नज़र में आना भी आवश्यक है, तभी कोई व्यक्ति मोक्ष या पहचान प्राप्त कर सकता है।

सच्ची जिंदगी

गावै गुण धोमु अटल मंडलवै भगति भाइ रसु जाणिओ ॥
कबि कल सुजसु गावउ गुर नानक राजु जोगु जिनि माणिओ ॥

 

पत्नी और पति में झगड़ा हो गया। पति और बच्चे खाना खाकर सो गए तो पत्नी घर से बाहर निकाल गई, यह सोचकर कि अब वह अपने पति के साथ नहीं रह सकती। मोहल्ले की गलियों में इधर-उधर भटक रही थी कि तभी उसे एक घर से आवाज सुनाई दी, जहाँ एक स्त्री रोटी के लिए ईश्वर से अपने बच्चे के लिए प्रार्थनाएं कर रही थी।

वह थोड़ा और आगे बढ़ी तो एक और घर से आवाज आई, जहाँ एक स्त्री ईश्वर से अपने बेटे को हर परेशानी से बचाने की दुआ कर रही थी। एक और घर से आवाज आ रही थी जहाँ एक पति अपनी पत्नी से कह रहा था कि वह मकान मालिक से कुछ और दिन की मोहलत मांग लें और उससे हाथ जोड़कर अनुरोध करें कि रोज-रोज आकर उन्हें तंग न करें।

थोड़ा और आगे बढ़ी तो एक बुज़ुर्ग दादी अपने पोते से कह रही थी, “बेटा, कितने दिन हो गए तुम मेरे लिए दवाई नहीं लाए।” पोता रोटी खाते हुए कह रहा था, “दादी माँ, अब मेडिकल वाला भी दवा नहीं देता और मेरे पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि मैं आपके लिए दवाई ले आऊं।”

थोड़ा और आगे बढ़ी तो एक घर से स्त्री की आवाज आ रही थी जो अपने भूखे बच्चों को यह कह रही थी कि आज तुम्हारे बाबा तुम्हें खाने के लिए कुछ ना कुछ जरूर लाएंगे, तब तक तुम सो जाओ। जब तुम्हारे बाबा आएंगे तो मैं तुम्हें जगा दूंगी। वह औरत कुछ देर वहीं खड़ी रही और सोचते हुए अपने घर की ओर वापस लौट गई कि जो लोग हमारे सामने खुश और सुखी दिखाई देते हैं, उनके पास भी कोई ना कोई कहानी होती है।

फिर भी, यह सब अपने दुख और दर्द को छुपाकर जीते हैं। वह औरत अपने घर वापस लौट आई और ईश्वर का धन्यवाद करने लगी कि उसके पास अपना मकान, संतान, और एक अच्छा पति है। हाँ, कभी-कभी पति से नोक-झोंक हो जाती है, लेकिन फिर भी वह उसका बहुत ख्याल रखता है। वह औरत सोच रही थी कि उसकी जिंदगी में कितने दुख हैं, मगर जब उसने लोगों की बातें सुनीं तो उसे यह एहसास हुआ कि लोगों के दुख तो उससे भी ज्यादा हैं।

जरूरी नहीं कि आपके सामने खुश और सुखी नजर आने वाले सभी लोगों का जीवन परफेक्ट हो। उनके जीवन में भी कोई न कोई परेशानी या तकलीफ होती है, लेकिन सभी अपनी परेशानी और तकलीफ को छुपाकर मुस्कुराते हैं। दूसरों की हंसी के पीछे भी दुख और मातम के आंसू छिपे होते हैं। कठिनाइयों और परीक्षणों के बावजूद जीना जीवन की वास्तविकता है, यही सच्ची जिंदगी है।

राती रुती थिती वार ॥ पवण पाणी अगनी पाताल…

राती रुती थिती वार ॥ पवण पाणी अगनी पाताल ॥
तिसु विचि धरती थापि रखी धरम साल ॥
तिसु विचि जीअ जुगति के रंग ॥ तिन के नाम अनेक अनंत ॥

 

 

रातें, ऋतुएं, तिथियाँ और दिन (सप्ताह) — सब उसकी रचना हैं।
हवा, पानी, अग्नि और पाताल (धरती के नीचे की दुनिया) — ये सब भी उसकी रचना हैं।
उसने इस धरती को धर्म का स्थान बनाकर स्थिर रखा है।
उसमें अनगिनत जीव अनेक तरीकों और रंगों में रहते हैं।
उनके नाम अनगिनत और असीम हैं।

गहरा विश्लेषण:

  1. समय और प्रकृति: “राती रुती थिती वार” का अर्थ है कि दिन, रात, मौसम, तिथियाँ और वार (सप्ताह के दिन) — ये सभी ईश्वर की बनाई हुई व्यवस्थाएँ हैं। ये समय और काल के संकेतक हैं, और यह दर्शाते हैं कि सृष्टि का हर पहलू ईश्वर की योजना और रचना के अनुसार चलता है।
  2. प्राकृतिक तत्वों की रचना: “पवण पाणी अगनी पाताल” — हवा, पानी, अग्नि, और धरती के नीचे की दुनिया, ये सभी शक्तिशाली तत्व सृष्टि के आधार हैं। ये बताता है कि ईश्वर ने इस संसार के हर तत्व को अपनी योजना के अनुसार रचा है, और इन तत्वों के बिना जीवन संभव नहीं है।
  3. धरती को धर्म का स्थान बनाना: “तिसु विचि धरती थापि रखी धरम साल” — ईश्वर ने इस धरती को “धर्म का स्थान” बना कर स्थापित किया है, जिसका अर्थ यह है कि यह धरती एक ऐसा स्थान है जहाँ जीवन के लिए नैतिकता, धर्म, और सत्य का पालन आवश्यक है। धरती पर मनुष्यों का उद्देश्य केवल भौतिक सुख नहीं है, बल्कि यहाँ नैतिकता और धर्म का पालन करना जीवन का असली लक्ष्य है।
  4. जीवों की विविधता: “तिसु विचि जीअ जुगति के रंग” — धरती पर अनगिनत प्रकार के जीव रहते हैं, जो विभिन्न रूपों, रंगों और तरीकों से जीवन जीते हैं। यह विविधता भी ईश्वर की अद्भुत रचना का प्रतीक है, जहाँ हर जीव अपने ढंग से जीवन जी रहा है।
  5. असीमित नाम: “तिन के नाम अनेक अनंत” का अर्थ है कि इन जीवों के नाम अनगिनत हैं। उनकी विशेषताएँ, उनकी जीवनशैली और उनके कार्य इतने विविध हैं कि उनके नामों की कोई सीमा नहीं है। यह सृष्टि की विशालता और ईश्वर की असीम रचना शक्ति को दर्शाता है।

संदेश:

यह शबद हमें सिखाता है कि सृष्टि का हर पहलू—समय, तत्व, धरती, जीव—सब कुछ ईश्वर की महान रचना का हिस्सा है। धरती एक ऐसा स्थान है जहाँ धर्म और नैतिकता का पालन आवश्यक है, और यहाँ रहने वाले जीव अनगिनत रूपों और नामों में आते हैं। ईश्वर की रचना की विविधता और विशालता अनंत है, और हमें इस रचना में धर्म और सत्य का पालन करते हुए जीना चाहिए।

सारांश:

“राती रुती थिती वार” से लेकर “तिन के नाम अनेक अनंत” तक का संदेश यह है कि सृष्टि का हर तत्व, हर जीव, और समय की हर स्थिति ईश्वर की महान रचना का हिस्सा है। धरती एक पवित्र स्थान है जहाँ धर्म का पालन अनिवार्य है, और यहाँ रहने वाले जीवों की विविधता ईश्वर की असीम रचना क्षमता को दर्शाती है।

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