Author name: EkAdmin

खुश रहो

तेरी सरनि पूरन सुख सागर करि किरपा देवहु दान
सिमरि सिमरि नानक प्रभ जीवै बिनसि जाइ अभिमान

एक बार दो दोस्त घूमते हुए एक महल के पास पहुँच गए तो, पहले दोस्त ने उस शानदार महल को देखकर कहा की जब इनमें रहने वालों की किस्मत लिखी जा रही थी तब हम कहाँ थे?

दूसरा दोस्त पहले वाले का हाथ पकड़ कर अस्पताल ले गया और मरीजो को दिखाते हुए कहा कि जब इनकी किस्मत लिखी जा रही थी तब हम कहाँ थे?

भगवान ने हमें जो भी दिया उसमें हमे हमेशा खुश रहना है।

किसी संत ने क्या खूब कहा है कि तुम अपने पुराने जूतों को देखकर क्यों परेशान होते हो दुनिया में तो कई लोग ऐसे भी हैं जिनके तो पैर ही नहीं है।

उस मालिक का हर हाल में शुक्र करना सीखना है।
मेरे मालिक ने सब कुछ दिया है।

आज भी तेरा शुक्राना।
कल भी तेरा शुक्राना।
हर पल तेरा शुक्राना।

वाहेगुरु वाहेगुरु बोल मना



ऐवे ना तू डोल मना
ऐवे ना तू डोल मना
वाहेगुरु वाहेगुरु बोल मना

सबदा भला मना मना मेरेयाह
नानक दिया दितियाह

नानक दिया दितिया खा मना मेरेया
सतगुरु दिया दितिया खा मना मेरेयाह

जो लेखा विच लिखया तेरे
मिल जाणा तैनू देर सवेरे

जो लेखा विच लिखया तेरेह
मिल जाणा तेनू देर सवेरे

जाया कर तू गुरुद्वारेह
उठ सवेरे नित मुंह नेरे

जो लेखा विच लिखया तेरे
मिल जाणा तैनू देर सवेरे

जाया कर तू गुरुद्वारे
उठ सवेरे नित मुंह नेरे

कहदे लोग खुदा मना मेरेयाह
नानक दिया दितियाह

नानक दिया दितिया खा मना मेरेया
सतगुरु दिया दितिया खा मना मेरेयाह

मिलन वालेया दी लिस्ट लम्बेरी
टेम सिर आऊ वारी तेरी

मिलन वालेया दी लिस्ट लम्बेरी
टेम सिर आऊ वारी तेरी

ओदे लई ता सब इको नेह
क्यो करदे तू मेरी मेरी

टेम सिर आऊ वारी तेरी
ओदे लई ताह सब इको ने

क्यो करदे तू मेरी मेरी
ऐवे ना घबरा मना मेरेयाह

नानक दिया दितियाह
नानक दिया दितिया खा मना मेरेया

सतगुरु दिया दितिया खा मना मेरेयाह
दिपे सिद्धू दुनिया शक्की

अन्दरो अन्दरी जावे मच्ची
दिपे सिद्धू दुनिया शक्की

अन्दरो अन्दरी जावे मच्ची
गुरुघरां विच लंगर चलदे

बाबा नानक तोरे चक्की
दिपे सिद्धू दुनिया शकी

अन्दरो अन्दरी जावे मच्ची
गुरुघरां विच लंगर चलदे

बाबा नानक तोरे चक्की
तू वी फूरना पा मना मेरेयाह

नानक दिया दितियाह
नानक दिया दितिया खा मना मेरेया

सतगुरु दिया दितिया खा मना मेरेयाह

कबीर मेरा मुझ में कुछ नहीं



कबीर मेरा मुझ में कुछ नहीं
जो कुछ है सो तेरा
जो कुछ है सो तेरा
जो कुछ है सो तेरा
जो कुछ है सो तेरा

मेरा मुझ में कुछ नहीं कबीर
मेरा मुझ में कुछ नहीं

तेरा तुझको सौंपते
क्या लागे मेरा

तेरा तुझको सौंपते
क्या लागे मेरा
क्या लागे मेरा
क्या लागे मेरा
मेरा मुझ में कुछ नहीं कबीर
मेरा मुझ में कुछ नहीं
मेरा मुझ में कुछ नहीं कबीर
मेरा मुझ में कुछ नहीं

मैं नहीं प्रभु सब कुछ तेरा
मैं नहीं प्रभु सब कुछ तेरा
ईघे निर्गुण ऊँगे सरगुण
ईगे निर्गुण
ईगे निर्गुण ऊँगे सरगुण
केल करत बिच स्वामी मेरा

मेरा मुझ में कुछ नहीं कबीर
मेरा मुझ में कुछ नहीं
जो कुछ है सो तेरा
जो कुछ है सो तेरा
जो कुछ है सो तेरा
जो कुछ है सो तेरा
मेरा मुझ में कुछ नहीं कबीर
मेरा मुझ में कुछ नहीं

कबीर तू तू करता तू हुआ
मुझ में रहा न हूँ
जब आपा पर का मिट गया
जत देखौ तत तू

कबीर न हम किया न करेंगे
न हम किया न करेंगे
न कर सके सरीर
क्या जानो कुछ हर किया
भयो कबीर कबीर

मेरा मुझ में कुछ नहीं कबीर
मेरा मुझ में कुछ नहीं
जो कुछ है सो तेरा
जो कुछ है सो तेरा
जो कुछ है सो तेरा
जो कुछ है सो तेरा
मेरा मुझ में कुछ नहीं कबीर
मेरा मुझ में कुछ नहीं
मेरा मुझ में कुछ नहीं कबीर
मेरा मुझ में कुछ नहीं

हर जीओ हर जीओ निमाणिआ तू माण

हर जीओ हर जीओ निमाणिआ तू माण
हर जीओ हर जीओ निमाणिआ तू माण
हर जीओ हर जीओ निमाणिआ तू माण

निचीजिआ चीज करे मेरा गोविंद तेरी कुदरत कौ कुरबाण
तेरी कुदरत कौ कुरबाण

हर जीओ हर जीओ निमाणिआ तू माण ..

गई बहोड़ बंदी छोड़ निरंकार दुखदारी
गई बहोड़ बंदी छोड़ निरंकार दुखदारी

कर्म न जाणा धरम न जाणा लोभी मायाधारी
नाम परिओ भगत गोविंद का इह राखहु पैज तुमारी
इह राखहु पैज तुमारी

हर जीओ हर जीओ निमाणिआ तू माण ..

जैसा बालक भाए सुभाए लख अपराध कमावै
जैसा बालक भाए सुभाए लख अपराध कमावै

कर उपदेस झिड़के बहु भाती बहुड़ पिता गल लावै

पिछले औगुण बखस लए प्रभ आगै मारग पावै
प्रभ आगै मारग पावै

हर जीओ हर जीओ निमाणिआ तू माण ..

हरि अंतरजामी सभ बिध जाणै ता किस पहि आख सुणाईऐ
हरि अंतरजामी सभ बिध जाणै ता किस पहि आख सुणाईऐ

कहणै कथन न भीजै गोबिंद हरि भावै पैज रखाईऐ

अवर ओट मै सगली देखी इक तेरी ओट रहाईऐ
इक तेरी ओट रहाईऐ

हर जीओ हर जीओ निमाणिआ तू माण

इ दइआलु किरपालु प्रभु ठाकुरु आपे सुणै बेनंती ..x2

पूरा सतगुरु मेलि मिलावै सभ चूकै मन की चिंती

हरि हरि नामु अवखदु मुखि पाइआ जन नानक सुखि वसंती
जन नानक सुखि वसंती

हरि जीउ हरि जीउ निमाणिआ तू माणु

होइ दइआलु किरपालु प्रभु ठाकुरु आपे सुणै बेनंती
होइ दइआलु किरपालु प्रभु ठाकुरु आपे सुणै बेनंती

पूरा सतगुरु मेलि मिलावै सभ चूकै मन की चिंती

हरि हरि नामु अवखदु मुखि पाइआ जन नानक सुखि वसंती
जन नानक सुखि वसंती

हरि जीउ हरि जीउ निमाणिआ तू माणु

राखे रखन हार आप उबारिआन


राखे रखन हार आप उबारिआन

गुर की पैरी पाए काज सवारिआन

होआ आप देइ-आल मनहो न विसारिआन

साध जना कै संग भवजल तारिआन

साकत निंदक दुष्ट खिन मा-एह बिदारिआन

तिस साहिब की टैक नानक मनै मा-एह

जिस सिमरत सुख हो-इ सगले दूख जा-इ

कौन है ग़रीब

एक आदमी ने गुरू नानक जी से पूछा: मैं इतना गरीब क्यों हूँ?

गुरू नानक जी ने कहा: तुम गरीब हो क्योंकि तुमने देना नहीं सीखा।

आदमी ने कहा: परन्तु मेरे पास तो देने के लिए कुछ भी नहीं है।

गुरू नानक जी ने कहा: तुम्हारा चेहरा, एक मुस्कान दे सकता है। तुम्हारा मुँह, किसी की प्रशंसा कर सकता है या दूसरों को सुकून पहुंचाने के लिए दो मीठे बोल बोल सकता है।

तुम्हारे हाथ, किसी ज़रूरतमंद की सहायता कर सकते हैं, और तुम कहते हो तुम्हारे पास देने के लिए कुछ भी नहीं!

आत्मा की गरीबी ही वास्तविक गरीबी है।

पाने का हक उसी को है, जो देना जानता है।

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