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ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई

ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
चौ गिर्द हमारे राम का चौ गिर्द हमारे राम का
दुःख लगे न भाई
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
चौ गिर्द हमारे राम का चौ गिर्द हमारे राम का
दुःख लगे न भाई
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
सतगुरु पूरा भेतेया सतगुरु पूरा भेतेया जिन बनत बनायीं जिन बनत बनायीं
राम नाम औखद दिया
राम नाम औखद दिया
एका लिव लायी
एका लिव लायी
एका लिव लायी
एका लिव लायी
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
रख लिए तीन रखन हार
रख लिए तीन रखन हार
सभ बिआध मिटाई
सभ बिआध मिटाई
कहो नानक किरपा भई कहो नानक किरपा भई
प्रभ भए सहायी
प्रभ भए सहायी
प्रभ भए सहायी
प्रभ भए सहायी
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
चौ गिर्द हमारे राम का चौ गिर्द हमारे राम का
दुःख लगे न भाई दुःख लगे न भाई
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
ताति वाओ न लगी पारभ्रमह सरणाई
पारभ्रमह सरणाई पारभ्रमह सरणाई

तेग बहादुर सिमरिये तेग बहादुर सिमरिये

तेग बहादुर सिमरिये धाए कर नौ निध आवे धाए
तेग बहादुर सिमरिये धाए कर नौ निध आवे धाए
सभ थाई होए सहाए सभ थाई होए सहाए
गुरु तेग बहादुर सिमरिये गुरु तेग बहादुर सिमरिये
प्रीतम भगौती सिमर के
गुरु नानक लायी धाइये गुरु नानक लायी धाइये
फिर अंगद गुरु ते अमरदास रामदास होई सहाये , रामदास होई सहाये
गुरु तेग बहादुर सिमरिये गुरु तेग बहादुर सिमरिये
कर नौ निध आवे धाए कर नौ निध आवे धाए
सभ थाई होए सहाए सभ थाई होए सहाए
गुरु तेग बहादुर सिमरिये गुरु तेग बहादुर सिमरिये
अर्जन हर गोबिंद सिमरो श्री हर राये
श्री हरकृष्ण धियाये जिस डिठे सभ दुःख धियाए
श्री हरकृष्ण धियाये जिस डिठे सभ दुःख धियाए
गुरु तेग बहादुर सिमरिये गुरु तेग बहादुर सिमरिये
कर नौ निध आवे धाए कर नौ निध आवे धाए
सभ थाई होए सहाए सभ थाई होए सहाए
गुरु तेग बहादुर सिमरिये गुरु तेग बहादुर सिमरिये
तेग बहादुर सिमरिये कर नौ निध आवे धाए
धन धन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी सभ थाई होई सहाये सभ थाई होई सहाये
गुरु तेग बहादुर सिमरिये गुरु तेग बहादुर सिमरिये
कर नौ निध आवे धाए कर नौ निध आवे धाए
सभ थाई होए सहाए सभ थाई होए सहाए
गुरु तेग बहादुर सिमरिये गुरु तेग बहादुर सिमरिये
गुरु तेग बहादुर सिमरिये गुरु तेग बहादुर सिमरिये

बगदाद का खलीपा गुरू नानक साहब जी के शरण में

मक्का के काजियों, मौलवियों, मजीरों और हाजियों को सच का मार्ग दिखाकर गुरू साहिब मदीना से होते हुए मुस्लमानों के केन्द्रीय शहर बगदाद में जा पहुंचे और शहर के बाहर एक तरफ बैठ कर इलाही मस्ती में आकर मधुर स्वर में नीचे लिखा शब्द गाना शुरू किया-

पाताला पाताल लख अगासा आगास ।
ओड़क ओड़क भाल थके वेद कहन इक बात।

जिसका भाव था कि- ईश्वर की रचना में अनगिनत ही आकाश हैं। अनगिनत ही पाताल हैं। इस असीमित रचना के अंत को अनगिनत विद्वान और सिद्ध योगी खोजते खोजते हार गए हैं। संसार भर की किताबें मिलकर एक ही बात कहते हैं कि वह बेअन्त हैं, वह बेअन्त हैं। जब इस बात की खबर वहां के खलीफा को पहुंची कि शहर के बाहर एक फकीर जो यह एक ताल राग गा रहा है इस्लाम की शराह के विरूद्ध है और दूसरा वह खुदा की खुदाई में बेगिबत तबक और आकाश पाताल बता रहा है। हमारे पैगम्बर ने तो केवल सात आकाश और सात ही पाताल, चौदह तबक ही कहे हैं।

यह बात सुनते ही उसने हुक्म दिया कि ऐसे को संगसार कर दो। जिसका भाव यह है कि शहर का हर आदमी बड़े जोर से एक एक पत्थर मारता था। इस प्रकार जब सारा शहर हाथ में एक एक पत्थर लेकर गुरू जी को मारने को गुरू जी के चारों तरफ होकर ऊंचे हाथ उठाकर मारने लगे तो गुरू जी ने
ऊंची आवाज से ‘सत् करतार’ कहा। बस, गुरू जी के सतकरतार कहते ही उन हजारों लोगों के हाथों में पकड़े हुये जहां के तहां खड़े रह गये। यहां तक कि सब के सब बुत बने खड़े रह गये जैसे कि उनके होश हवास
उड़ जाते हैं। इस बात का जब खलीफे को पता लगा तो वह बहुत भयभीत होकर नंगे पांव चलकर गुरू जी के चरणों में हाज़िर हुआ और अपने गुनाहों की माफी मांगने
लगा। तब गुरू जी ने अपने नियम अनुसार-

जो शरण आवे उिस कंठ लावै इह बुध स्वामी सधा ।’ उस खलीफे के गुनाहों को बख्श कर आगे के लिये शुभ मार्ग पर आया जैसे कि गुरू का वाक है-

पिछले अवगुन बक्श प्रभु आगे मार्ग पावै

उस खलीफाने जब गुरू जी के आगे इस भावना से दो प्रश्न किये-

हे खुदा के प्रत्यक्ष नूर साई जी! एक तो आप राग गाते हो, यह तो हमारे पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहिब ने मकरू (अयोग) करार दिया है।
दूसरा जो आप कहते हो कि खुदा की खुदाई ला महिदूदता है। लाखों ही आकाश पाताल हैं, यह भी हमारे पैगम्बर ने केवल सात आकाश और सात पाताल, चौदह तबक कहे हैं ।

गुरू नानक जी ने पहले प्रश्न किये और कहा कि खलीफा साहिब यह राग बुरी वस्तु नहीं बल्कि इससे गंदे और मन को चचल करने वाले गीत, गज़लें गाई जाती हैं, यह बुरी हैं। राग तो रूह की खुराक हैं। मन को इकागर करने के लिये सबसे बढ़कर पदार्थ है। इसके साथ मिलकर गाया हुआ वैराग्य, ज्ञान और भगवान की सिफतों का गीत मन को अडोल, शान्त और शुद्ध करता है।

दूसरे प्रश्न केबारे में गुरू जी ने खलीफे को कहा कि तुम अपने किसी बहुत विश्वासपात्र को मेरे साथ भेज दो और आप यहां ही खड़े रहो जिससे मैं उसकी असल तौर पर लाखों करोड़ों बल्कि अरबों खरबों आकाश पाताल दिखा लाऊं। तब इस खलीफे ने अपने लड़के को गुरू नानक जी के साथ भेज दिया और गुरू जी उस लड़के को लेकर देखते ही देखते गायब हो गये जिसका कथन भाईगुरदास जी ने ऐसे किया है-

नाल लीता बेटा पीर दा अखी मीट गया हवाई।
लख अकाश पाताल लख लख फुरक विच सभ।
विखलाई । भर कच कौल प्रसाद दा धुरो पातालों
लई कड़ाही । जाहरी कला न छपै छपाई।

इस आश्चर्य कौतुक को देखकर वह बगदाद का मुख्य खलीफा गुरु जी का सच्चा श्रद्धालु बन गया और सारे बगदाद शहर और अरब देश में गुरू जी की महिमा फैल गई। दूर दूर से अरबों लोग गुरू जी के दर्शनों को आने लगे। आज तक वहां गुरू जी के हजारों अरबी सिक्ख देखने में आते हैं। वहां पर गुरू जी का एक बड़ा सुन्दर स्थान भी बनाया गया, जो अब तक मौजूद है। यहां अरब देश के बहुत से लोग गुरू नानक जी के श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं ।

 

बहुत जनम बिछड़े थे माधो यह जनम तुम्हारे लेखे

बहुत जनम बिछड़े थे माधो यह जनम तुम्हारे लेखे
कहे रविदास आस लग जियो , कहे रविदास आस लग जियो
चिर भयो दरशन देखे
बहुत जनम बिछड़े थे माधो यह जनम तुम्हारे लेखे , बहुत जनम , बहुत जनम
हम सर दीन दियाल न तुम सर अब पतीयार किया कीजे
हम सर दीन दियाल न तुम सर अब पतीयार किया कीजे
बचनी तोर मोर मन माने जन को पुराण दीजे
बहुत जनम बिछड़े थे माधो यह जनम तुम्हारे लेखे
बहुत जनम बिछड़े थे माधो यह जनम तुम्हारे लेखे
कहे रविदास आस लग जियो चिर भयो दरशन देखे
बहुत जनम बिछड़े थे माधो यह जनम तुम्हारे लेखे , बहुत जनम बहुत जनम
हम सर दीन दियाल न तुम सर अब पतीयार किया कीजे
बहुत जनम बिछड़े थे माधो यह जनम तुम्हारे लेखे
बहुत जनम बहुत जनम

जैसा सतगुरु सुनिदा तैसो ही मैं डीठ

जैसा सतगुरु सुनिदा तैसो ही मैं डीठ
जैसा सतगुरु सुनिदा तैसो ही मैं डीठ
जैसा सतगुरु सुनिदा
जैसा सतगुरु सुनिदा
विछड़ेया मेले प्रभ हर दरगह का बसीठ
विछड़ेया मेले प्रभ हर द रगह का बसीठ हर दरगह का बसीठ
जैसा सतगुरु सुनिदा
जैसा सतगुरु सुनिदा
हर नामो मंत्र द्रिडऐडा हर नामो मंत्र द्रिडऐडा कटे हउमै रोग कटे हउमै रोग
नानक सतगुरु तीन मिलाया नानक सतगुरु तीन मिलाया जीना टुरे पाया संजोग जीना टुरे पाया संजोग
जैसा सतगुरु सुनिदा जैसा सतगुरु सुनिदा
तैसो ही मैं डीठ तैसो ही मैं डीठ
जैसा सतगुरु सुनिदा जैसा सतगुरु सुनिदा जैसा सतगुरु जैसा सतगुरु सुनिदा

मुझे अपना अहंकार दे दीजिए

प्रभ दीन दइआल सुनहु बेनंती किरपा अपनी धारु
नामु निधानु उचरउ नित रसना नानक सद बलिहारु

पुराने समय में एक राजा बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति का था। उसने अपने जन्मदिन पर सोचा कि मेरे पास इतनी धन-संपत्ति है। मैं किसी का भी जीवन बदल सकता हूं। इसीलिए आज किसी एक व्यक्ति की सारी इच्छाएं पूरी करूंगा।

राज्य की प्रजा राजा को शुभकामनाएं देने के लिए राजमहल पहुंची। प्रजा के साथ एक संत भी राजा को बधाई देने के लिए आए थे। राजा संत से मिलकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने संत से कहा कि गुरुदेव मेरे पास अपार धन-संपदा है, आज मैं आपकी सभी इच्छाएं पूरी करूंगा। आप जो चाहें मुझसे मांग सकते हैं। मैं आपकी हर बात पूरी करूंगा।

संत ने कहा कि मैं तो वैरागी हूं, मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं है। अगर आप कुछ देना ही चाहते हैं तो अपनी इच्छा से मुझे कुछ भी दान दे सकते हैं।

संत की बात सोचकर राजा सोचने लगा कि वह संत को क्या दे, राजा ने कहा कि मैं आपको एक गांव दे देता हूं। संत बोले कि नहीं महाराज, गांव तो वहां रहनी वाली प्रजा का है। आप तो सिर्फ उस गांव के रक्षक हैं।

राजा ने अपना महल दान में देने की बात कही। संत बोलें कि ये भी आपके राज्य का ही है। यहां बैठकर आप प्रजा के लिए काम करते हैं। ये आपकी प्रजा की संपत्ति है।

बहुत सोचने के बाद राजा बोला कि आप मुझे अपना सेवक बना लें। मैं खुद को सपर्पित करता हूं। संत ने कहा कि नहीं महाराज आप पर तो आपकी पत्नी और बच्चों का अधिकार है। मैं आपको अपनी सेवा में नहीं रख सकता हूं।

ये सुनकर राजा परेशान हो गया, उसने कहा कि गुरुदेव अब आप ही बताएं, मैं क्या दूं? संत ने कहा कि राजन् आप मुझे अपना अहंकार दे दीजिए। अहंकार का त्याग करें, क्योंकि यही एक ऐसी बुराई है जो इंसान आसानी से छोड़ नहीं पाता है। अहंकार की वजह से व्यक्ति के जीवन में कई परेशानियां आती हैं। रावण, कंस और दुर्योधन भी अहंकार की वजह से ही मृत्यु को प्राप्त हुए और उनके वंश का नाश हो गया। ये बातें सुनकर राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया। वह अपनी धन-संपत्ति पर घमंड कर रहा था। राजा ने संत से क्षमा मांगी और इस बुराई को छोड़ने का वचन दिया।

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