मक्का के काजियों, मौलवियों, मजीरों और हाजियों को सच का मार्ग दिखाकर गुरू साहिब मदीना से होते हुए मुस्लमानों के केन्द्रीय शहर बगदाद में जा पहुंचे और शहर के बाहर एक तरफ बैठ कर इलाही मस्ती में आकर मधुर स्वर में नीचे लिखा शब्द गाना शुरू किया-
पाताला पाताल लख अगासा आगास ।
ओड़क ओड़क भाल थके वेद कहन इक बात।
जिसका भाव था कि- ईश्वर की रचना में अनगिनत ही आकाश हैं। अनगिनत ही पाताल हैं। इस असीमित रचना के अंत को अनगिनत विद्वान और सिद्ध योगी खोजते खोजते हार गए हैं। संसार भर की किताबें मिलकर एक ही बात कहते हैं कि वह बेअन्त हैं, वह बेअन्त हैं। जब इस बात की खबर वहां के खलीफा को पहुंची कि शहर के बाहर एक फकीर जो यह एक ताल राग गा रहा है इस्लाम की शराह के विरूद्ध है और दूसरा वह खुदा की खुदाई में बेगिबत तबक और आकाश पाताल बता रहा है। हमारे पैगम्बर ने तो केवल सात आकाश और सात ही पाताल, चौदह तबक ही कहे हैं।
यह बात सुनते ही उसने हुक्म दिया कि ऐसे को संगसार कर दो। जिसका भाव यह है कि शहर का हर आदमी बड़े जोर से एक एक पत्थर मारता था। इस प्रकार जब सारा शहर हाथ में एक एक पत्थर लेकर गुरू जी को मारने को गुरू जी के चारों तरफ होकर ऊंचे हाथ उठाकर मारने लगे तो गुरू जी ने
ऊंची आवाज से ‘सत् करतार’ कहा। बस, गुरू जी के सतकरतार कहते ही उन हजारों लोगों के हाथों में पकड़े हुये जहां के तहां खड़े रह गये। यहां तक कि सब के सब बुत बने खड़े रह गये जैसे कि उनके होश हवास
उड़ जाते हैं। इस बात का जब खलीफे को पता लगा तो वह बहुत भयभीत होकर नंगे पांव चलकर गुरू जी के चरणों में हाज़िर हुआ और अपने गुनाहों की माफी मांगने
लगा। तब गुरू जी ने अपने नियम अनुसार-
जो शरण आवे उिस कंठ लावै इह बुध स्वामी सधा ।’ उस खलीफे के गुनाहों को बख्श कर आगे के लिये शुभ मार्ग पर आया जैसे कि गुरू का वाक है-
पिछले अवगुन बक्श प्रभु आगे मार्ग पावै
उस खलीफाने जब गुरू जी के आगे इस भावना से दो प्रश्न किये-
हे खुदा के प्रत्यक्ष नूर साई जी! एक तो आप राग गाते हो, यह तो हमारे पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहिब ने मकरू (अयोग) करार दिया है।
दूसरा जो आप कहते हो कि खुदा की खुदाई ला महिदूदता है। लाखों ही आकाश पाताल हैं, यह भी हमारे पैगम्बर ने केवल सात आकाश और सात पाताल, चौदह तबक कहे हैं ।
गुरू नानक जी ने पहले प्रश्न किये और कहा कि खलीफा साहिब यह राग बुरी वस्तु नहीं बल्कि इससे गंदे और मन को चचल करने वाले गीत, गज़लें गाई जाती हैं, यह बुरी हैं। राग तो रूह की खुराक हैं। मन को इकागर करने के लिये सबसे बढ़कर पदार्थ है। इसके साथ मिलकर गाया हुआ वैराग्य, ज्ञान और भगवान की सिफतों का गीत मन को अडोल, शान्त और शुद्ध करता है।
दूसरे प्रश्न केबारे में गुरू जी ने खलीफे को कहा कि तुम अपने किसी बहुत विश्वासपात्र को मेरे साथ भेज दो और आप यहां ही खड़े रहो जिससे मैं उसकी असल तौर पर लाखों करोड़ों बल्कि अरबों खरबों आकाश पाताल दिखा लाऊं। तब इस खलीफे ने अपने लड़के को गुरू नानक जी के साथ भेज दिया और गुरू जी उस लड़के को लेकर देखते ही देखते गायब हो गये जिसका कथन भाईगुरदास जी ने ऐसे किया है-
नाल लीता बेटा पीर दा अखी मीट गया हवाई।
लख अकाश पाताल लख लख फुरक विच सभ।
विखलाई । भर कच कौल प्रसाद दा धुरो पातालों
लई कड़ाही । जाहरी कला न छपै छपाई।
इस आश्चर्य कौतुक को देखकर वह बगदाद का मुख्य खलीफा गुरु जी का सच्चा श्रद्धालु बन गया और सारे बगदाद शहर और अरब देश में गुरू जी की महिमा फैल गई। दूर दूर से अरबों लोग गुरू जी के दर्शनों को आने लगे। आज तक वहां गुरू जी के हजारों अरबी सिक्ख देखने में आते हैं। वहां पर गुरू जी का एक बड़ा सुन्दर स्थान भी बनाया गया, जो अब तक मौजूद है। यहां अरब देश के बहुत से लोग गुरू नानक जी के श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं ।