Author name: EkAdmin

जिसके सिर ऊपर तू स्वामी


जिसके सिर ऊपर तू स्वामी
सो दुःख कैसा पावे
जिसके सिर ऊपर तू स्वामी
सो दुःख कैसा पावे

तेरी शरण च जो कोई आवे
सब दे कष्ट तू आप मिटावे
तेरी शरण च जो कोई आवे
सब दे कष्ट तू आप मिटावे
किरपा सब ते आप बनावे
सदा सुखी वासे हे प्राणि
सत दा नाम जो दिया
जिसके सिर ऊपर तू स्वामी
सो दुःख कैसा पावे
जिसके ऊपर तू स्वामी
सो दुःख कैसा पावे

राजे नू कद मांगन लादे
कद तू किसनु राज थमा दे
तू ही जाने मैया तेरी
कद तू आम टन खास बने
कद तू आम टन खास बने
दुबडी बेरही वी पार लगावे
जे तू सतगुरु चावे
जिसके सिर ऊपर तू स्वामी
सो दुःख कैसा पावे
जिसके सिर ऊपर तू स्वामी
सो दुःख कैसा पावे

वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु
वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु

आओना अपने भागन दा जाना अपना भागन दा
नियत क्यों मारी करनी जड़ खाना अपने भागन दा
तेरी लीला नियारी ए तू असली दुनिया सारी ए
तेरे करके चली जांदी सादी दुनियादारी ए
तू दुःख भंजन तू सुख दाता
तू ही पिता ए तू ही माता
जो वी मिल्या सब सिर्र माथे
किथो दाता किथे लियाता
जो जी तेरा ध्यान जपे जो
दिल टन तेरा नाम जपे जो
जपे जो बाणि हरपाल तेरी
तेनु सुबह ते शाम जपे जो
किसे चीज़ दी वी थोरह नहीं उस नू
शुकर जो तेरा दिया
जिसके सिर ऊपर तू स्वामी
सो दुःख कैसा पावे
जिसके सिर ऊपर तू स्वामी
सो दुःख कैसा पावे

भिक्षाम् देहि

आदि गुरए नमह ॥
जुगादि गुरए नमह ॥
सतिगुरए नमह ॥
स्री गुरदेवए नमह ॥

समर्थ गुरु रामदास जी का एक शिष्य था, जो भिक्षा लेने के लिए गांव में गया और घर-घर भिक्षा की मांग करने लगा।

समर्थ गुरु की जय ! भिक्षाम् देहि
समर्थ गुरु की जय ! भिक्षाम् देहि
, भीतर से जोर से दरवाजा खुला ओर एक बड़ी-बड़ी दाढ़ी वाला तान्त्रिक बाहर निकला और चिल्लाते हुए बोला, मेरे दरवाजे पर आकर किसी और का गुणगान करता है। कौन है ये समर्थ??

शिष्य ने गर्व से कहा- मेरे गुरु समर्थ रामदास जी। जो सर्व समर्थ हैं।

तांत्रिक ने सुना तो क्रोध में आकर बोला कि इतना दुःसाहस कि मेरे दरवाजे पर आकर किसी और का गुणगान करता है तो देखता हूँ कितना सामर्थ है तेरे गुरु में? मेरा शाप है कि तू कल का उगता सूरज नहीं देख पाएगा अर्थात् तेरी मृत्यु हो जाएगी।

शिष्य ने सुना तो देखता ही रह गया और आस-पास के भी गांव वाले कहने लगे कि इस तांत्रिक का दिया हुआ शाप कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। बेचार युवा अवस्था में ही अपनी जान गंवा बैठा।शिष्य उदास चेहरा लिए वापस आश्रम की ओर चल दिया और सोचता जा रहा था कि आज मेरा अंतिम दिन है लगता है मेरा समय खत्म हो गया है।

आश्रम में जैसे ही पहुँचा। समर्थ गुरु रामदास जी हँसते हुए बोले – ले आया भिक्षा?
बेचारा शिष्य क्या बोले।
गुरुदेव हँसते हुए बोले कि भिक्षा ले आया।
शिष्य- जी गुरुदेव! भिक्षा में अपनी मौत ले आया और सारी घटना सुना दी। इसके बाद एक कोने में चुप-चाप बैठ गया।
गुरुदेव बोले अच्छा चल भोजन कर ले।
शिष्य- गुरुदेव! आप भोजन करने की बात कर रहे है और यहाँ मेरा प्राण सूख रहा है। भोजन तो दूर एक दाना भी मुँह में न जा पाएगा।
गुरुदेव बोले– अभी तो पूरी रात बाकी है। अभी से चिंता क्यों कर रहा है। चल ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा। यह कहकर गुरुदेव भोजन करने चले गए।
फिर सोने की बारी आई तब गुरुदेव शिष्य को बुलाकर बोले- हमारे चरण दबा दे।
शिष्य- मायूस होकर बोला! जी गुरुदेव जो कुछ क्षण बचा है जीवन के उस क्षण में आपकी सेवा कर ही प्राण त्याग करूँ यही अच्छा होगा। फिर गुरुदेव के चरण दबाने की सेवा शुरू की।
गुरुदेव बोले- चाहे जो भी हो, चरण छोड़ कर मत जाना कहीं।
शिष्य- जी गुरुदेव, कहीं नही जाऊँगा।
गुरुदेव- अपने शब्दों को तीन बार दोहराओ कि चरण मत छोड़ना, चाहे जो हो जाए।
यह कह कर गुरुदेव सो गए।
शिष्य पूरी भावना से चरण दबाने लगा।
रात्रि का पहला पहर बीतने को था अब तांत्रिक ने अपने शाप को पूरा करने के लिए एक देवी को भेजा जो धन से भरी थी सोने-चांदी, हीरे-मोती से भरी।
शिष्य चरण दबा रहा था। तभी दरवाजे पर वो देवी प्रकट हुई और कहने लगी-कि इधर आओ और ये सोने-चांदी से भरा ये ले लो। शिष्य भी बोला- जी मुझे लेने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन क्षमा करें! मैं वहाँ पर आकर नहीं ले सकता हूं। अगर आपको देना ही है तो यहाँ पर आकर दे दीजिए।
देवी सुनी तो कहने लगी कि नहीं, नहीं, तुम्हे यहाँ आना होगा। देखो कितना सारा है। शिष्य बोला– नहीं। अगर देना है तो यहीं आ जाइए।
तांत्रिक ने अपना पहला पासा असफल देख दूसरा पासा फेंका। रात्रि का दूसरा पहर बीतने को था तब तांत्रिक ने उसी औरत को शिष्य की माँ की रूप बनाकर भेजा। शिष्य गुरु के चरण दबा रहा था तभी दरवाजे पर आवाज आई – बेटा! तुम कैसे हो?
शिष्य ने अपनी माँ को देखा तो सोचने लगा अच्छा हुआ जो माँ के दर्शन हो गए मरते वक्त माँ से भी मिल लेता हूं।
वह औरत जो माँ के रूप धारण की थी बोली- आओ बेटा गले से लगा लो! बहुत दिन हो गए तुमसे मिले।
शिष्य बोला- क्षमा करना मां! लेकिन मैं वहाँ नहीं आ सकता क्योंकि अभी गुरुचरण की सेवा कर रहा हूँ। मुझे भी आपसे गले लगना है इसलिए आप यहीं आ जाओ। जब उस औरत ने देखी कि चाल काम नहीं आ रही है तो चली गई।
रात्रि का तीसरा पहर बीता और इस बार तांत्रिक ने यमदूत रूप वाला राक्षस भेजा।
राक्षस पहुँच कर शिष्य से बोला कि चल तुझे लेने आया हूँ। तेरी मृत्यु आ गई है। उठ और चल…
शिष्य भी झल्लाकर बोला- काल हो या महाकाल मैं नहीं आने वाला ! अगर मेरी मृत्यु आई है तो यही आकर ले जाओ मुझे। लेकिन गुरु के चरण नहीं छोडूंगा! बस।
फिर राक्षस भी चला गया।
सुबह हुई चिड़ियां अपने घोसले से निकलकर चहचहाने लगी। सूरज भी उदय हो गया।
गुरुदेव रामदास जी नींद से उठे और बोले कि- सुबह हो गई?
शिष्य बोला– जी! गुरुदेव सुबह हो गई
गुरुदेव- अरे! तुम्हारी तो मृत्यु होने वाली थी न, तुमने ही तो कहा था कि तांत्रिक का शाप कभी व्यर्थ नही जाता। लेकिन तुम तो जीवित हो।
शिष्य भी सोचते हुए बोला- जी गुरुदेव, लग तो रहा हूँ कि जीवित ही हूँ। फिर रात्रि की सारी घटना याद की। फिर समझ में आई कि गुरुदेव ने क्यों कहा था कि चाहे जो भी हो जाए चरण मत छोड़ना। शिष्य गुरुदेव के चरण पकड़कर खूब रोने लगा। बार-बार यही कह रहा था- जिसके सर पर आप जैसे गुरु का हाथ हो, उसे काल भी कुछ नहीं कर सकता है।

सीख
गुरु की आज्ञा पर जो शिष्य चलता है उससे तो स्वयं मौत भी आने से एक बार नहीं अनेक बार सोचती है। तभी तो कहा गया है-
करता करे न कर सके, गुरु कर सो जान।
तीन-लोक नौ, खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय।

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गुरु की आज्ञा सिर पर ले।च ले स्वयं प्रभु राम गुरु की आज्ञा पर चले। पूर्णसद्गुरु में ही सामर्थ्य है कि वो प्रकृति के नियम को बदल सकते हैं, जो ईश्वर भी नहीं बदल सकते, क्योंकि ईश्वर भी प्रकृति के नियम से बंधे होते हैं लेकिन पूर्णसद्गुरु नहीं।

जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे


जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
नानक दस मुख ते जो बोले नानक दस मुख ते जो बोले ईहा उहा सच होवय ईहा उहा सच होवय
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे

चतुर दिसा कीनो बल अपना, सिर ऊपर कर धरयो
किरपा कतख अवलोकन कीनो, दस का दुःख बिदारयो
किरपा कतख अवलोकन कीनो, दस का दुःख बिदारयो
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे

किरपा कतख अवलोकन कीनो, दस का दुःख बिदारयो
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
नानक दस मुख ते जो बोले नानक दस मुख ते जो बोले ईहा उहा सच होवय ईहा उहा सच होवय
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
कंठ ले अवगुण सब मेटे, दयाल पुरख बकशिंद
कंठ ले अवगुण सब मेटे, दयाल पुरख बकशिंद
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
हर जन रखे गुरु गोबिंद , रखे गुरु गोबिंद
कंठ लाये अवगुण सभ मेटे दयाल पुरुख बक्शंत
कंठ लाये अवगुण सभ मेटे दयाल पुरुख बक्शंत
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
नानक दस मुख ते जो बोले नानक दस मुख ते जो बोले ईहा उहा सच होवय ईहा उहा सच होवय
जो मांगे ठाकुर अपने ते सोई सोई देवे
सोई सोई देवे, सोई सोई देवे

देह शिवा बार मोहे हे शुभ कर मन ते कभहु न डरो


देह शिवा बार मोहे हे शुभ कर मन ते कभहु न डरो
न डरो अर सो जब जाए लड़ो निश्चय कर अपनी जीत करो
देह शिवा बार मोहे हे शुभ कर मन ते कभहु न डरो
न डरो अर सो जब जाए लड़ो निश्चय कर अपनी जीत करो
देह शिवा बार मोहे हे शुभ कर मन ते कभहु न डरो
बोले सोनेहाल सत श्रीअकाल
बोले सोनेहाल सत श्रीअकाल
हर सिख हो अपने ही मन को हर सिख हो अपने ही मन को
यह लालच हो गुण तोच लो
देह शिवा बार मोहे हे शुभ कर मन ते कभहु न डरो
बोले सोनेहाल सत श्रीअकाल

गुरु अर्जन देव

पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ॥
नानक पूरा पाइआ पूरे के गुन गाउ ॥

गुरुवाणी की कई रचनाएं करने वाले गुरु अर्जन देव ने गुरु ग्रंथ साहिब के संपादन में अहम योगदान दिया है. करतारपुर सहित कई नगरों की स्थापना करने वाले गुरु अर्जन देव को क्रूर यातना का भी सामना करना पड़ा था.

गुरु अर्जन देव का जन्म 15 अप्रैल 1563 ईस्वी को गुरु रामदास और बीबी भानी के घर गोइंदवाल में हुआ था. इनके पिता गुरु रामदास जी सिख धर्म के चौथे गुरु थे. अर्जन देव अपने पिता के तीसरे और सबसे छोटे बेटे थे. ये बचपन से ही बुद्धिमान थे, इन्होंने बाबा बुड्ढा से गुरुमुखी का ज्ञान प्राप्त किया था. इसके साथ-साथ इन्होंने फारसी और संस्कृत भाषा की शिक्षा भी ग्रहण की थी.

अर्जन देव का धर्म के प्रति समर्पण, निर्मल हृदय और कर्तव्य निष्ठा को देखकर 1581 ईस्वी में उन्हें उनके पिता ने पांचवें गुरु के रुप में गद्दी दी थी.

गुरु अर्जन देव ने कई कठिनाईयों और विरोधों के बावजूद भी 25 वर्षों तक गद्दी संभालते हुए, सिख धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए काफी कुछ किया था.

गुरु अर्जन देव के पिता गुरु रामदास जी ने रामदासपुरा नामक नगर की स्थापना की थी. जिसे अब अमृतसर के नाम से जाना जाता है. इनके पिता ने अमृतसर और संतोखसर नामक दो सरोवरों का निर्माण कार्य शुरु किया था, जिसे गुरु अर्जन देव ने ही पूरा करवाया था. अर्जन देव जी ने अमृतसर सरोवर के बीच एक धर्मसाल का निर्माण करवाया था, जिसका नाम हरिमंदिर रखा गया. इसी हरिमंदिर को स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है.

अर्जन देव जी ने हरमंदिर साहिब नामक गुरुद्वारे की नींव 1588 ईस्वी में लाहौर के प्रसिद्ध सूफी संत मीयां मीर जी से रखवाई थी. ऐसा माना जाता है कि सैकड़ों वर्ष पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा खुद गुरु अर्जन देव जी ने तैयार किया था.

1604 ईस्वी में हरिमंदिर साहिब में आदि ग्रंथ साहिब का प्रकाश किया गया और बाबा बुड्ढा जी को इसका पहला ग्रंथी नियुक्त किया गया.

गुरु अर्जुन देव का जब कार्यकाल शुरू हुआ था, तब तक सिख धर्म के लिए काफी काम हो चुका था. गुरुओं ने काफी मात्रा में बाणी की रचना कर ली थी. इन्हीं बाणियों को सहेजने के लिए गुरु अर्जन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से आदि ग्रंथ साहिब, जिसे गुरु ग्रंथ साहिब भी कहा जाता है, का संपादन किया. गुरु अर्जन देव खुद बोल कर गुरदास जी से इसे लिखवाया था. संपादन का यह कार्य अमृतसर के रामसर सरोवर के किनारे बैठकर एकांत में किया गया था. संकलन और संपादन का यह कार्य 1603 में शुरू होकर 1604 ईस्वी में पूरा हुआ था.

आदि ग्रंथ साहिब में सिख गुरुओं के अलावा अन्य सूफी संतों के ज्ञान का भी समावेश किया गया था.

गुरु अर्जुन देव जी ने 30 बड़े रागों में लगभग 2,218 शब्दों की रचना की है.

गुरु अर्जुन देव ने इसमें बिना कोई भेदभाव किए तमाम विद्वानों और भगतों की बाणी शामिल करते हुए श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी का संपादन का काम किया.

रागों के आधार पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित बाणियों का वर्गीकरण किया था.

गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में दरबार साहिब में पहली बार गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश किया था. 1430 अंग (पन्ने) वाले इस ग्रंथ के पहले प्रकाश पर बाबा बुड्ढा ने बाणी पढ़ने की शुरुआत की थी.

पहली पातशाही से छठी पातशाही तक अपना जीवन सिख धर्म की सेवा को समर्पित करने वाले बाबा बुड्ढा जी इस ग्रंथ के पहले ग्रंथी बने.

गुरु अर्जन देव जी ने सिखों में दसवंध (अपनी कमाई का दसवां हिस्सा) निकालने की परंपरा शुरू की ताकि लंगर और दूसरे सभी धार्मिक व सामाजिक काम चलाए जा सकें. इसके लिए विभिन्न केंद्रों पर प्रतिनिधि नियुक्त किए गए, जिन्हें मसंद कहा जाता था.

गुरु अर्जन देव जी ने नए नगरों की स्थापना करने के साथ-साथ लोगों की समस्याओं को देखते हुए जलापूर्ति के लिए विभिन्न निर्माण करवाए थे.

1590 में गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर से 20 किमी दूर तरनतारन नामक सरोवर बनावाया था, जिस कारण इस नगर का नाम तरनतारन पड़ गया.

1593 में इन्होंने जालंधर के निकट करतारपुर नगर की स्थापना की और गंगसर सरोवर का निर्माण करवाया.

1595 में पुत्र हरगोबिंद के जन्म की खुशी में व्यास नदी के किनारे हरगोविंदपुर बसाया.

1599 में लाहौर यात्रा के दौरान गुरु अर्जन देव जी ने डब्बी बाजार में एक बाउली का निर्माण करवाया था, जिससे स्थानीय क्षेत्रों में पानी की कमी को पूरा किया जा सके.

अकबर की मौत के जहांगीर मुगल साम्राज्य का शासक बना. उसी दौरान जहांगीर के बेटे खुसरो ने बगावत कर दी थी, जिसके बाद उसके पिता ने उसे गिरफ्तार करने के आदेश दिए, गिरफ्तारी के डर से खुसरो पंजाब की ओर भागा और तरनतारन में गुरु अर्जन देव जी के पास पहुंचा. गुरु जी ने उसका स्वागत और सहयोग किया, यह बात जहांगीर को चुभ गई. इसके साथ ही जहांगीर अर्जन देव की प्रसिद्ध को भी पसंद नहीं करता था. वहीं, इस मौके को कुछ अन्य विरोधियों ने भुनाते हुए, जहांगीर की आग में घी डालने का काम किया, जिसके बाद जहांगीर ने मौका देख गुरु अर्जन देव पर उल्टे-सीधे आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया.

जहांगीर ने अर्जन देव को अपनी मर्जी के कार्य करवाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने झूठ और अन्याय का साथ देने से इनकार कर दिया और शहादत को चुना.

इसके बाद जहांगीर ने उन्हें शहीद करने का हुकम दिया और लाहौर में कई यातनाएं दीं. उन्हें गर्म तवे पर बैठाया गया और उनके ऊपर गर्म रेत डाली गई. इसके अलावा उन्हें और भी कई तरह के कष्ट दिए गए.

30 मई 1606 को अर्जन देव जी शहीद हो गए. इसके बाद उनकी याद में रावी नदी के किनारे पर ही गुरुद्वारा डेरा साहिब बनवाया गया था, जो वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है.

सिख परंपरा के मुताबिक, गुरु अर्जन जी को शहीदों का सिरताज कहा जाता है. वह सिख धर्म के पहले शहीद थे.

सिक्ख इतिहास प्रश्नोत्तरी

1. दस गुरु साहिबानों के नाम तरतीब वार लिखें
गुरु नानक देव जी (1469-1539)
गुरु अंगद देव जी (1504-1552)
गुरु अमर दास जी (1479-1574)
गुरु राम दास जी (1534-1581)
गुरु अरजन देव जी (1563-1606)
गुरु हरगोबिंद जी (1595-1644)
गुरु हरिराय जी (1630-1661)
गुरु हरिकृष्ण जी (1656-1664)
गुरु तेगबहादुर जी (1621-1675)
गुरु गोबिंद सिंह जी (1666-1708)

2. उन दो साहिबजादों के नाम बताईये जिन्हें जिन्दा नीवों में चिनवा दिया गया था
बाबा फ़तेह सिंह जी
बाबा जोरावर सिंह जी

3. उन दो साहिबजादों के नाम बताईये जो चमकोर की लड़ाई में शहीद हुए थे
बाबा अजीत सिंह जी
बाबा जुझार सिंह जी

4. सिक्ख पंथ के पहले पांच प्यारों के नाम बताईये
भाई दया सिंह जी
भाई धरम सिंह जी
भाई हिम्मत सिंह जी
भाई मोहकम सिंह जी
भाई साहिब सिंह जी
5. सिक्ख धर्म के पांच ककारों के नाम बताईये
केस
कंघा
किरपान
कड़ा
कछिहरा
6. खालसे के धरम पिता कौन हैं
गुरु गोबिंद सिंह जी
7. खालसे की धरम माता कौन हैं
माता साहिब कौर जी
8. खालसा पंथ की नींव कहाँ रखी गयी थी
आनंदपुर साहिब
9. जब सिक्ख आपस में मिलते हैं तो क्या कह कर एक दुसरे को संबोधित करते हैं
वाहेगुरु जी का खालसा
वाहेगुरु जी की फ़तेह
10. जैकारा क्या है
बोले सो निहाल
सति श्री अकाल
11. ‘सिक्ख’ शब्द से आप क्या समझते हैं
शिष्य (सीखने वाला)
12. पांच तख्तों के नाम बताईये
श्री अकाल तख़्त साहिब, अंमृतसर, पंजाब
श्री हरिमंदिर साहिब, पटना, बिहार (पटना साहिब)
श्री केसगढ़ साहिब, आनंदपुर, पंजाब (आनंदपुर साहिब)
श्री हजूर साहिब, नांदेड़, महाराष्ट्र
श्री दमदमा साहिब, तलवंडी साबो, बठिंडा, पंजाब
13. गुरमुखी लिपि पड़ाना सबसे पहले किसने शुरू किया था
गुरु अंगद देव जी
14. ‘गुरु का लंगर’ की प्रथा सबसे पहले किस ने शुरू की थी
गुरु अमरदास जी
15. आदि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब (पोथी साहिब) सबसे पहले किसने लिखी थी
गुरु अरजन देव जी
16. श्री हरिमंदिर साहिब अंमृतसर में श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का प्रकाश सबसे पहले कब हुआ था
सन 1604 में
17. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के पहले ग्रंथी कौन थे
बाबा बुड्डा जी
18. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के कितने अंग (पन्ने) हैं
1430
19. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी में कितने गुरुओं की बाणी दर्ज है
कुल 6 गुरुओं की : पहले पांच एवं नोवें गुरु जी की
20. किस गुरु को ‘शहीदों के सरताज’ भी कहा जाता है
गुरु अरजन देव जी
21. किस गुरु को ‘मीरी-पीरी के मालिक’ भी कहा जाता है
गुरु हरिगोबिंद जी
22. किस गुरु का सिर धड से अलग किया गया था
गुरु तेगबहादुर जी
23. किस गुरु को ‘हिन्द-दी-चादर’ भी कहा जाता है
गुरु तेगबहादुर जी
24. सिमरन कैसे होता है
सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक अकालपुरख नूं याद करना
25. सिक्ख धरम में शादी को क्या कहते हैं
आनन्द कारज
26. गुरु नानक देव जी की यात्राओं को क्या कहा जाता है
उदासी
27. गुरु नानक देव जी के साथ रबाब कौन बजाता था
भाई मरदाना जी
28. उस गुरुद्वारे का नाम बताईये जहाँ वली कंधारी का अहंकार टुटा था
पंजा साहिब
29. गुरु नानक देव जी कहाँ एवं कब ज्योति ज्योत समाये थे
1539, करतार पुर
30. गुरु अंगद देव जी का पहला नाम क्या था
भाई लहणा जी
31. गुरु अमरदास जी ने गुरु अंगद देव जी की सेवा कितने समय तक की
12 वर्ष
32. उस नदी का नाम बताईये जहाँ से गुरु अमरदास जी रोज पैदल जा कर गुरु अंगद देव जी के लिए पानी भर के लाया करते थे
ब्यास नदी
33. ‘मसंद’ प्रचारक किसने शुरू किये थे
गुरु अमरदास जी
34. गुरु अरजन देव जी के पुत्र का नाम बताईये
हरगोबिंद जी
35. गुरु रामदास जी का पहला नाम क्या था
भाई जेठा जी
36. वहां कौन सा गुरुदवारा है जहाँ गुरु अरजन देव जी को शहीद किया गया था
डेरा साहिब
37. गुरु हरिगोबिंद जी को कैदी की तरह क्या रखा गया था
ग्वालियर का किला
38. गुरु हरिगोबिंद जी को जब रिहा किया गया तब उनके साथ उनका चोला पकड़ के और कितने राजाओं को रिहा किया गया था
52 राजा
39. गुरु हरगोबिंद जी ने दो तलवारें धारण की थी, उनके नाम बताओ
मीरी पीरी
40. अकाल तख़्त की स्थापना किसने की थी
गुरु हरिगोबिंद जी
41. गुरु हरिगोबिंद जी को जपुजी साहिब के पाठ का शुद्ध उच्चारण किसने सुनाया था
भाई गोपाला जी
42. बाबा बुड्डा जी ने कितने गुरुओं की सेवा की
6
43. ओरंगजेब को गुरबाणी गलत पढ़ कर सुनाने के लिये किसे सजा मिली थी
राम राय, गुरु हरि राय जी के पुत्र
44. गुरु हरि कृष्ण जी की कितनी उम्र थी जब उनको गुरुगद्दी मिली थी
5 साल
45. मिर्जा राजा जय सिंह के बंगले पर अब कौन सा गुरुद्वारा है जहाँ गुरु हरि कृष्ण जी ठहरे थे जब वह दिल्ली आये थे
गुरुद्वारा बंगला साहिब
46. गुरु हरि कृष्ण जी की कितनी उम्र थी जब वह ज्योति ज्योत समाये थे
8 साल
47. जहाँ गुरु हरि कृष्ण जी का अंतिम संस्कार हुआ वहां अब कौन सा गुरुद्वारा है
गुरुद्वारा बाला साहिब
48. गुरु हरि कृष्ण जी के अंतिम शब्द क्या थे जब वह अगले गुरु जी के बारे में बता रहे थे
‘बाबा बकाले’ इसका मतलब है की अगले गुरु बकाला नाम के गावं में मिलेंगे
49. सोढ़ी परिवार के कितने लोग अपने आप को गुरु कहते हुए बकाला में मिले
22
50. बकाला में गुरु तेगबहादुर जी को ढूंड कर दुनिया के सामने लाने वाले व्यक्ति कौन थे
भाई मक्खन शाह लुबाना
51. गुरु तेगबहादुर जी की पत्नी का क्या नाम था
माता गुजरी जी
52. गुरु तेगबहादुर जी के साथ शहीद होने वाले तीन सिक्ख कौन थे
भाई मती दास जी
भाई सती दास जी
भाई दयाला जी

53. गुरु तेगबहादुर जी के साथ शहीद होने वाले तीन सिक्खों को कैसे शहीद किया गया था
भाई मती दास जी (आरी से काट के शहीद किया गया)
भाई सती दास जी (रुई में लपेट कर आग लगा दी गई)
भाई दयाला जी (गर्म पानी में उबाला गया)
54. किसके नेतृत्व में 500 कश्मीरी पंडित गुरु तेगबहादुर जी के पास मदद मांगने के लिये आये थे
पंडित कृपा राम (जो की बाद में गुरु गोबिंद सिंह जी के संस्कृत के गुरु भी बने एवं फिर खालसा सजे एवं अंत में चमकोर की लड़ाई में शहीद हो गए)
55. गोबिंद राय (गुरु गोबिंद सिंह जी की उस वक्त कितनी उम्र थी)
9 साल
56. जहाँ गुरु तेगबहादुर जी को शहीद किया गया वहां कौन सा गुरुद्वारा है
गुरुद्वारा सीस गंज, चांदनी चौंक दिल्ली
57. गुरु तेगबहादुर जी के शरीर का संस्कार किसने किया
भाई लक्खी शाह वणजारा
58. जहाँ गुरु तेगबहादुर जी के शरीर का संस्कार हुआ वहां कौन सा गुरुद्वारा है
गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब, दिल्ली
59. गुरु तेगबहादुर जी के सीस को आनंदपुर साहिब कौन ले के गया था
भाई जैता जी (भाई जीवन सिंह जी)
60. वहां कौन सा गुरुद्वारा है जहाँ श्री गुरु तेगबहादुर जी के सीस का संस्कार हुआ था
गुरुद्वारा सीस गंज साहिब, आनंदपुर
61. पीर बुद्धू शाह जी के कितने पुत्र थे और भंगानी के युद्ध में कितने शहीद हुए थे
4 पुत्र, भंगानी के युद्ध में 2 शहीद हुए
62. भंगानी के युद्ध में पीर बुद्धू शाह जी की सेवाओं के बदले में गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें क्या उपहार दिये थे
कंघा (कुछ टूटे हुए बालों सहित), किरपान एवं दस्तार
63. आनंदपुर की लड़ाई में शराब पिला कर मस्त किये हुए हाथी के साथ कौन से सिक्ख ने युद्ध किया था
भाई बच्चितर सिंह
64. आनंदपुर की लड़ाई के दौरान गंभीर रूप से घायल सिपाहियों को कौन पानी पिलाता था (इस बात की परवाह किये बिना की वो सिक्ख हैं या मुस्लिम)
भाई कन्हैया जी
65. माता गुजरी जी और दो छोटे साहिबजादों की खबर सिरहंद के नवाब को किसने दी थी
गंगू ब्राह्मण
66. चमकोर की लड़ाई के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी नंगे पैर कौन से जंगलों में रहे
माछीवाड़ा
67. उन दो पठानों के नाम बताईये जिन्होंने गुरु गोबिंद सिंह जी को मुगलों से बचाया था
नबी खान और गनी खान
68. मुक्तसर की लड़ाई में शहीद होने वाले चालीस मुक्तों का नेतृत्व किसने किया था
भाई महा सिंह
69. अंमृतसर शहर के पांच सरोवरों के नाम बताईये
अंमृतसर
कौलसर
संतोखसर
बिबेकसर
रामसर
70. गुरु गोबिंद सिंह जी ने माधो दास को अमृत पान के बाद क्या नाम दिया
बंदा सिंह
71. बंदा सिंह ने पंजाब छोड़ने से पहले सिक्खों को क्या दिया
निशान साहिब एवं नगाड़ा
72. गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ का पहला जत्थेदार किसे बनाया था
बंदा सिंह
73. मिसल के समूह को क्या कहते थे
दल खालसा
74. पहले दल खालसा की स्थापना किसने की थी
नवाब कपूर सिंह
75. उस सिक्ख सिपाही का नाम बताईये जिसे सुल्तान उल कौम का ख़िताब मिला
जस्सा सिंह आहलूवालिया
76. दिल्ली की उस जगह का क्या नाम है जहाँ सरदार बघेल सिंह अपने 30,000 साथियों के साथ ठहरे थे
तीस हजारी
77. शेरे-ए-पंजाब का ख़िताब किसे प्राप्त है
महाराजा रणजीत सिंह
78. सरदार हरी सिंह नलवा ने कौन से प्रसिद्ध गुरुद्वारा की स्थापना की
गुरुद्वारा पंजा साहिब
79. मोदीखाना साखी कौन से गुरु जी से सम्बंधित है
गुरु नानक देव जी
80. सुखमनी साहिब के रचेता कौन है
गुरु अरजन देव जी
81. होला मोहल्ला का त्यौहार कौन से गुरु जी ने शुरू किया था
गुरु गोबिंद सिंह जी
82. गुरु गोबिंद सिंह जी के कौन से सिक्ख ने भंगानी की लड़ाई में अपना साथ दिया और अपने दो पुत्र भी शहीद करवाए
पीर बुद्धू शाह
83. सिक्खों के कैलेन्डर का क्या नाम है
नानकशाही कैलेन्डर
84. नानकशाही कैलेन्डर सूर्य या चन्द्र किसकी गति के हिसाब से चलता है
सूर्य
85. नानकशाही कैलेन्डर का पहला वर्ष कौन सा है
1469 (जब गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था)
86. भाई लालो जी के घर गुरु नानक देव जी ने किस का भिजवाया हुआ लंगर वापिस कर दिया था
मालिक भागो
87. गुरु नानक देव जी और सिद्धों के बीच मुलाकात (सिद्ध गोस्ट) कहाँ पर हुआ था
कैलाश पर्वत (सुमेर पर्वत)
88. माता खीवी जी कौन थी
माता खीवी जी गुरु अंगद देव जी की पत्नी थी और वह सिक्ख इतिहास में केवल एक स्त्री हैं जिनका नाम गुरु ग्रन्थ साहिब जी में दर्ज है
89. अकाल तख़्त का क्या मतलब होता है
सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, अकाल पुरख का सिंहासन
90. गुरु तेग बहादुर जी को गुरु नानक देव जी की याद में एक बड़ा टीला क्या स्थापित मिला
डुबरी, आसाम
91. किस मुग़ल बादशाह ने गुरु तेगबहादुर जी का सिर धड से अलग करने का हुक्म दिया था
औरंगजेब
92. गुरु गोबिंद सिंह जी को अपनी रक्षा के लिये पंज प्यारों ने किस किले को छोड़ने का आदेश दिया था
चमकोर का किला
93. सुखमनी साहिब में कितनी अष्टपदीयां हैं
24
94. ‘सिंह’ शब्द से आप क्या समझते हैं
शेर
95. कौर शब्द से आप क्या समझते हैं
राजकुमारी
96. गुरु नानक देव जी संगल दीप विच किसनू मिले सी
राजा शिव नाथ
97. गुरु अमरदास जी ने कौन सा शहर बसाया था, जहाँ वह गुरु बनने के बाद रुक गये थे
गोइंदवाल
98. गुरु अरजन देव जी की पत्नी का क्या नाम था
माता गंगा जी
99. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी में गुरबाणी कितने रागों में लिखी गयी है
31
100. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी में मूल मंत्र कितनी बार आया है
33

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