Author name: EkAdmin

जपयो जिन अर्जन देव गुरु

जपयो जिन अर्जन देव गुरु , अर्जन देव गुरु
जपयो जिन अर्जन देव गुरु , अर्जन देव गुरु
फिर संकट जोन गरब न पायो
फिर संकट जोन गरब न पायो
जपयो जिन अर्जन देव गुरु , अर्जन देव गुरु

जब लो नहीं भाग लिलार उदे
तब लॉ भ्रम ते फिरते भौ तायो
तब लॉ भ्रम ते फिरते भौ तायो

फिर संकट जोन गरब न पायो
फिर संकट जोन गरब न पायो
जपयो जिन अर्जन देव गुरु , अर्जन देव गुरु
फिर संकट जोन गरब न पायो
फिर संकट जोन गरब न पायो
जपयो जिन अर्जन देव गुरु , अर्जन देव गुरु

कल घोर समुद्र में बुडत थे
कल घोर समुद्र में बुडत थे
कबहू मितहे नहीं रे पछतायो
कबहू मितहे नहीं रे पछतायो

फिर संकट जोन गरब न पायो
फिर संकट जोन गरब न पायो
जपयो जिन अर्जन देव गुरु , अर्जन देव गुरु
फिर संकट जोन गरब न पायो
फिर संकट जोन गरब न पायो
जपयो जिन अर्जन देव गुरु , अर्जन देव गुरु

तत बिचार यह मथुरा
तत बिचार यह मथुरा
जग तारन को अवतार बनायाो
जग तारन को अवतार बनायाो

फिर संकट जोन गरब न पायो
फिर संकट जोन गरब न पायो
जपयो जिन अर्जन देव गुरु , अर्जन देव गुरु
फिर संकट जोन गरब न पायो
फिर संकट जोन गरब न पायो
जपयो जिन अर्जन देव गुरु , अर्जन देव गुरु

जपयो जिन अर्जन देव गुरु

जपयो जिन अर्जन देव गुरु

जपयो जिन अर्जन देव गुरु

सत्‍य की खोज

निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि
जिनि कीआ तिसु चीति रखु नानक निबही नालि

 

यूनानी संत अगस्टिन एक सुबह काला सागर के तट पर अकेले ही घूमने निकले। सूर्योदय हो रहा था। रात भर जगने से उनकी आंखें थकी हुई थीं। सत्य की खोज में उन्हें पता ही नहीं चलता था कि दिन और रात कब बीत जाते थे। शास्त्र, शब्द और विचार के बोझ के तले ही वे दब गए थे। सागर के किनारे उन्होंने एक बालक को खड़ा देखा, जिसके हाथ में छोटी सी प्याली थी। वह किसी सोच में डूबा हुआ था। संत ने बच्चे से पूछा, ‘बेटे, तुम यहां क्या कर रहे हो?’ बच्चे ने संत की ओर देखा और कहा, ‘पहले आप बताएं कि आप यहां क्या कर रहे हैं?’ उन्हें हंसी आ गई, लेकिन इससे पहले कि कुछ कहते बच्चे ने दूसरा सवाल दाग दिया, ‘आपकी प्याली कहां है?’

संत की समझ में कुछ नहीं आया। फिर भी उन्होंने गंभीरता से बच्चे के सवाल का जवाब देते हुए कहा, ‘मैं सत्य की खोज में हूं और उसी कारण चिंतित हूं।’ बच्चा बोला, ‘मैं इस प्याली में सागर को भरकर ले जाना चाहता हूं। लेकिन सागर है कि प्याली में नहीं आ रहा।’ संत ने सुना तो उन्हें अपनी बुद्धि की प्याली भी दिखाई दी और सत्य का सागर भी। वह हंसने लगे और बच्चे से बोले, ‘मित्र, हम तुम बिल्कुल एक जैसे हैं। हम दोनों ही सागर को प्याली में भरना चाहते हैं और किसी न किसी सागर तट पर अपनी-अपनी प्यालियां लिए खड़े हैं।’

संत आगे बढ़े और सोचने लगे कि संसार के सभी लोग किसी न किसी रूप में सागर तट पर अपनी अपनी प्यालियां लिए खड़े हैं। वे दूसरों को देखते हैं, जिनके पास बड़ी प्यालियां हैं। लेकिन प्याली बड़ी हो या छोटी इससे क्या फर्क पड़ता है? सागर तो उसी को मिलता है, जो अपनी प्याली भर कर घर ले जाने के बजाय उसे सागर में ही छोड़ दे।

बड़े चावा नाल तुरी सी मां


बड़े चावा नाल तुरी सी मां
के पुत्तां दे दीदार होंगे।
बड़े चावा नाल तुरी सी मां
के पुत्तां दे दीदार होंगे।

पुत्त पांगे कलेजे ठंड मेरे x2
ते सामने दातार होंगे x2

बड़े चावा नाल तुरी सी मां के पुत्तां दे दीदार होंगे।

चुम चुम निक्केया नु गोदी च खिड़ावांगी
वड़देया नु गुट के कलेजे नाल लवांगी।
कलेजे नाल लवांगी
चुम चुम निक्केया नु गोदी च खिड़ावांगी
वड़देया नु गुट के कलेजे नाल लवांगी।
कलेजे नाल लवांगी x2

रखां हिक्क च बना के चैन दिल दा x2

ओह अखां दे खुमार होंगे
ते सामने दातार होंगे।

बड़े चावा नाल तुरी सी मां के पुत्तां दे दीदार होंगे x2

आगया अखिर मेरे पुत्रा दा देरा ए
वेखो मुख चलेया जुदाई दा हनेरा ए
आगया अखिर मेरे पुत्रा दा देरा ए
वेखो मुख चलेया जुदाई दा हनेरा ए x2
जुदाई दा हनेरा ए

मेरी अखां आ गए जग मग जग दे x2
हुन हो चां चार होंगे
ते सामने दातार होंगे

बड़े चावां नाल तुरी सी मां के पुत्तां दे दीदार होंगे।

भैन ननकी दा वीर, तन मन दा फकीर


भैन ननकी दा वीर, तन मन दा फकीर, 2x
नी एह जोगिया दा जोगी ते पीरा दा पीर, 2x
भैन ननकी दा वीर, तन मन दा फकीर।

साथी दो ने प्यारे, एहदे बाला मरदाना,
रब्ब नाल एहदे रेह के, एहदा करे शुक्राना,
एकोंकार दा पूजारी, एहनु नाम दी खुमारी,
मोदे सबरा दी खारी सच जंदा अग्ग चीर,
भैन ननकी दा वीर, तन मन दा फकीर।

भन्ने भरमा नू बाबा जात-पात नू ना मन्ने,
सगो मोह ते प्यार वाले बीजदा आ गन्ने,
भुख किसे दी ना वेखे, सब लौंदा दादें लेखे,
लोकी रखदे भुलेखे नी एह सब तों अमीर,
भैन ननकी दा वीर, तन मन दा फकीर।

पिता कालू वी ना जाने, भैन ननकी पहचाने,
बाबा काला नी दिखाउंदा, मन्ने मलक दे भाणे,
पंजा पथरा नू लौंदा, खाणी हक्क दी सिखाउंदा,
मिट्टी विचों है कमाउंदा, वीट बुझ्जे कहरा पीर,
भैन ननकी दा वीर, तन मन दा फकीर,
नी एह जोगिया दा जोगी ते पीरा दा पीर,
नी एह जोगिया दा जोगी ते पीरा दा पीर,
भैन ननकी दा वीर, तन मन दा फकीर।

योगक्षेम का निर्वाह

दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ अनाथ ॥
सरणि तुम्हारी आइओ नानक के प्रभ साथ ॥

जनाबाई सेविका थीं। उनका सौभाग्य था कि वह संत नामदेव के घर में परिचारिका का काम करती थीं। पानी भरना, झाड़ू लगाना, बर्तन मांजना, कपड़े धोना और चक्की पीसना उनका नित्यकार्य था।

संत नामदेव जी के घर में हमेशा भगवान का भजन कीर्तन होता था। भक्ति की अविरल सरिता बहती थी। धीरे धीरे जनाबाई भी इस सरिता में स्नान करने की अभ्यस्त हो गईं। मन और प्राणों के द्वार खुल गए। (संत संग का प्रभाव)

भक्ति का प्रवाह अंदर तक होने लगा। अब तो जनाबाई के मुख ही नहीं प्राणों से भी पवित्र भगवन्नाम का निरंतर उच्चारण होने लगा। एक बार एकादशी के दिन संत नामदेव जी के यहां भक्तमंडली जमा हुई थी। पूरी रात भगवान विट्ठल का नाम कीर्तन चलता रहा। दिन भर व्रत के चलते जनाबाई ने अन्न ग्रहण नहीं किया था। भक्त जन कीर्तन करते रहे और एक कोने में बैठकर जनाबाई प्रेमाश्रु बहाती रहीं।

द्वादशी का पक्ष लगा और पारण उपरांत, जनाबाई घर लौट गईं। पूरी रात की थकान थी। अगले दिन उठने में देर हो गई। जब नींद खुली तो हड़बड़ाकर उठ बैठीं। शीघ्र नित्यकर्म से निवृत होकर भक्त शिरोमणि नामदेव के घर पहुंची। झाड़ू किया, बर्तन मांजे और कपड़े धोने के लिए नजदीक चंद्रभागा नदी के किनारे पहुंचीं।

कपड़े धोते धोते ध्यान आया कि जिस कमरे में कीर्तन होता है उसे व्यवस्थित करना तो भूल ही गईं। कपड़े धोने के लिए डुबाए जा चुके थे। उसे छोड़कर जाना भी संभव नहीं था। पूर्व दिन के एकादशी व्रत, भजन, संतो के संग और रात्रि जागरण का आनन्द था कि जनाबाई का हृद्य अपने आराध्य के लिए पूरी व्यवस्था नहीं कर पाने के बोझ से भर आया। भक्त के मन की पीड़ा भगवान तक पहुंच जाती है। वह तत्काल कोई न कोई उपाय करते हैं।

लीला हुई! जनाबाई चिंता में बैठी थीं कि तभी एक वृद्ध महिला वहां आ पहुंची और पूछा कि आखिर किस चिंता में डूबी हो! जनाबाई ने सारी परेशानी बता दी। उन्होंने कहा कि जाओ तुम कीर्तन का कमरा ठीक कर आओ तुम्हारे कपड़े मैं धो दूंगी। जनाबाई को तो जैसे संजीवनी मिल गई। उन्होंने कहा, माता तुम कपड़े धोना मत। बस केवल देखभाल करती रहो, मैं तुरंत कमरा ठीक करके आती हूं। प्रभु की माया! जनाबाई को इतना भी अवकाश नहीं था, कि वह सोचतीं कि आखिर यह वृद्धा है कौन! और उसके मन की व्यथा उसने इतनी आसानी से कैसे जान ली! वो तुरंत भागीं और कमरे की व्यवस्था करके उल्टे पांव लौटीं।

तभी उन्होंने दूर से देखा की वो वृद्धा जा रही थीं और सारे कपड़े धुल कर सूख रहे थे। कपड़े धुल भी गए, सूख भी गए। यह सारा काम इतनी जल्दी कैसे हो गया! जनाबाई तुरंत उस वृद्धा के पीछे दौड़ीं और उन्हें रोकने की कोशिश की।

तभी उन्हें ठोकर लगी और गिर पड़ीं। थोड़ी देर के लिए दृष्टि ओझल हुई और वृद्धा नजरों के आगे से विलुप्त हो गईं। लेकिन गीली मिट्टी पर उनके पैरों के निशान बने हुए थे। जनाबाई तुरंत जाकर वापस लौटीं। भक्त नामदेव जी के यहां सभी भक्त जमा थे। उन्होंने यह घटना सभी को सुनाई। सभी ने आकर पैरों के उस निशान के दर्शन किए। उस मंडली में बड़े बड़े संत और महात्मा थे, वे तुरंत पहचान गए कि ये तो साक्षात महामाया के पांव के निशान हैं।

नामदेव जी ने कहा जनाबाई तुम धन्य हो जिसके लिए स्वयं महामाया ने आकर कपड़े धोए। इस घटना के बाद से जनाबाई की दशा ही विचित्र हो गई। वह भक्ति में इतनी लीन हो गईं, कि उनके रोम रोम से हर समय पवित्र भगवन्नाम निकलने लगा। फिर तो ये रोज की कहानी हो गई। घर के काम काज करते करते जनाबाई विह्वल हो जाया करती। नटखट नागर प्रभु विट्ठल ऐसे की समय की प्रतीक्षा में बैठे रहते थे।

जैसे ही जनाबाई भक्ति और प्रेम में अपनी सुधबुध खोती थीं, भगवान आकर उनकी जगह काम करने लगते थे। कभी चक्की पीस दी, कभी कुछ दूसरा काम कर दिया। जब जनाबाई का भावावेश खत्म होता था, तो उन्हें दिखता कि काम तो हो चुका है।

इन्हीं घटनाओं का वर्णन करते हुए मराठी कवियों ने लिखा है- जनी संग दलिले यानी करुणामय प्रभु जनाबाई के साथ चक्की पीसते थे।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् ने इसीलिए कहा हैः-

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्!

(जो अनन्यभाव से मेरी उपासना करता है, उसके योगक्षेम का निर्वाह मैं स्वयं करता हूं!!)

माये तेरे पोतरे शहीदी पा गए निहा विच आखरी फ़तेह बुला गए


माये तेरे पोतरे शहीदी पा गए निहा विच आखरी फ़तेह बुला गए 3x

जिंदिगी दा हूँ इतबार न करि पोटिया दा हुन इंतज़ार न करी 2x

छड़ गए शरीर निहा विच समां गए निहा विच आखरी फ़तेह बुला गए

माये तेरे पोतरे शहीदी पा गए निहा विच आखरी फ़तेह बुला गए 2x

पोतेया दा जोड़ा निहा चे खलो गया

वद्दौ नालो पहला छोटा ओले 3x

दिग्गी सी दीवाल दोवे थाले आ गए निहा विच आखरी फ़तेह बुला गए 2X

बार बार दिग्गी सी दीवाल ज़ोर दी 2x

ज़ाल्मा दे अग्गे दावे थल्ले आ गए 3x

हस दे सी लाल मौत न रुला गए 2x

निहा विच आखरी फ़तेह बुला गए 2x

दम घुटेया ता बेहोश हो गए 2x

गूंजे जैकारे सी खामोश हो गए 3x

धरती ते सीखा दिया गूंजा पा गए 2x

माये तेरे पोतरे शहीदी पा 2x

माये तेरे पोतरे शहीदी पा गए निहा विच आखरी फ़तेह बुला गए 3x

निहा विच आखरी फ़तेह बुला गए 3x

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