Author name: EkAdmin

तितलियों का पीछा मत करो

इकु बिंनि दुगण जु तउ रहै जा सुमंत्रि मानवहि लहि ॥
जालपा पदारथ इतड़े गुर अमरदासि डिठै मिलहि ॥

 

एक युवा लड़के ने अपने दादा से पूछा,

“दादाजी, मैं एक स्टार बनना चाहता हूँ, मैं फिल्मों में काम करना चाहता हूँ। जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो मैं दुनिया देखना चाहता हूँ, अच्छी कारें चलाना चाहता हूँ, और कांच के बने घर में रहना चाहता हूँ। हाँ, मैं वास्तव में सफल और महान बनना चाहता हूँ। तो मुझे बताओ, मैं अपने सभी लक्ष्यों का पीछा कैसे करूँ, और उन्हें तेज़ी से कैसे पकड़ूँ?”

दादाजी एक पल के लिए रुके, पीछे मुड़े, और फिर एक बहुत बड़ी और बेहद खूबसूरत तितली को एक फूल पर नाचते हुए देखा। तुरंत, उन्होंने कहा,

“हे भगवान! क्या शानदार तितली है! अब, जल्दी करो… जल्दी करो और उसका पीछा करो! सुनिश्चित करो कि तुम उसे पकड़ लो! उसे उड़ने मत दो! हटो!”

युवा लड़का जल्दी से तितली की ओर भागा, लेकिन जैसे ही उसने उसे पकड़ने की कोशिश की, तितली अचानक हवा में उड़ गई। वह उसे पकड़ने की कोशिश करते हुए उसके पीछे भागा, लेकिन वह बहुत तेज़ उड़ रही थी। वह बगीचे में इधर-उधर भागता रहा जब तक कि वह थक नहीं गया, और फिर उसे तितली दिखाई नहीं दी। साँस फूलने से वह अपने दादा के पास लौटा, घरघराहट करते हुए,

“मैं इसे पकड़ नहीं सका, दादाजी! यह उड़ गई!”

दादाजी एक पल के लिए मुस्कुराए, फिर उस छोटे लड़के का हाथ पकड़कर उसे एक कोने में ले गए। उसने तब तक इंतजार किया जब तक वह शांत नहीं हो गया, फिर उसने उसके कान में फुसफुसाया,

“सुनो, बेटा, मैं तुम्हें एक सबक सिखाता हूँ, एक मूल्यवान जीवन सबक।

यदि तुम अपना समय तितलियों का पीछा करने में बिताते हो, तो वे उड़ जाएँगी। लेकिन यदि तुम अपना समय एक सुंदर बगीचा बनाने में बिताते हो, तो तितलियाँ तुम्हारे पास आएँगी।

तुम देखो… वह तितली जीवन में तुम्हारे लक्ष्यों की तरह है। सफलता की हमारी यात्रा में, तत्काल लक्ष्यों, जीवन की क्षणभंगुर तितलियों की खोज में फंसना आसान है।

हालाँकि, असली जादू तब होता है जब हम कुछ ठोस बनाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जैसे कि एक जीवंत उद्यान की खेती करना।

लगातार पीछा करने के बजाय, अपनी ऊर्जा को बनाने और पालने में लगाओ।

कुछ सार्थक बनाएँ, चाहे वह कोई प्रोजेक्ट हो, कोई कौशल हो या कोई रिश्ता हो।

आप जो सुंदरता विकसित करेंगे, वह स्वाभाविक रूप से अवसरों, अनुभव और सफलता को आकर्षित करेगी। इसलिए प्यार, पैसे या सफलता का पीछा मत करो।

खुद का सबसे अच्छा संस्करण बनो और वे चीजें तुम्हारे पास आएँगी।”

केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस …

केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस ॥
केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस ॥
केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस ॥

 

कितनी ही कर्मभूमियाँ (पवित्र भूमि) और मेरु पर्वत हैं, और कितने ही ध्रुव जैसे महान संत हैं जो उपदेश देते हैं।
कितने ही इंद्र, चंद्रमा और सूर्य हैं, और कितने ही मंडल और देश हैं।
कितने ही सिद्ध, बुद्ध, नाथ और कितने ही देवी विभिन्न रूपों में हैं।

गहरा विश्लेषण:

  1. कर्मभूमि और संत उपदेश: “केतीआ करम भूमी मेर” का अर्थ है कि इस संसार में अनगिनत ऐसी जगहें हैं जिन्हें कर्मभूमि माना जाता है, जहाँ व्यक्ति अपने कर्मों द्वारा अपने जीवन का निर्माण करता है। ये स्थान पवित्रता और धर्म के प्रतीक हैं। “धू उपदेस” का अर्थ है ऐसे अनगिनत ध्रुव जैसे महापुरुष और संत जो उपदेश देते हैं और संसार को धर्म का मार्ग दिखाते हैं।
  2. सूर्य, चंद्रमा और इंद्र का अनंत विस्तार: “केते इंद चंद सूर” का मतलब है कि इस सृष्टि में अनगिनत इंद्र, चंद्रमा और सूर्य विद्यमान हैं। इन प्रतीकों से यह बताया गया है कि सृष्टि की विशालता इतनी अधिक है कि उसकी गणना करना असंभव है। “मंडल देस” का अर्थ है अनगिनत ग्रह, तारे, और ब्रह्मांड के मंडल, जहाँ जीवन और सृष्टि के रहस्यों का संचालन होता है।
  3. सिद्ध, बुद्ध और देवी-देवताओं के रूप: “केते सिध बुध नाथ” का अर्थ है कि अनगिनत सिद्ध (योगी), बुद्ध (ज्ञानियों), और नाथ (धार्मिक गुरुओं) का अस्तित्व है। “केते देवी वेस” से तात्पर्य है कि अनगिनत देवी-देवताओं के रूप और वेष हैं, जो विभिन्न शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह सृष्टि की आध्यात्मिक और दैवीय शक्तियों की अनंतता को दर्शाता है।

संदेश:

यह शबद हमें बताता है कि इस सृष्टि में सब कुछ अनगिनत है—पवित्र भूमियाँ, महापुरुष, सूर्य, चंद्रमा, ग्रह, सिद्ध, बुद्ध, और देवी-देवता। सृष्टि की यह अनंतता दर्शाती है कि ईश्वर की रचना का विस्तार और विविधता मानवीय सोच से परे है। ईश्वर की रचना में हर जगह और हर जीव की अपनी महत्ता है, और उनका अस्तित्व ईश्वर की अपार शक्ति का प्रमाण है।

सारांश:

“केतीआ करम भूमी मेर” से लेकर “केते देवी वेस” तक का संदेश यह है कि सृष्टि में अनगिनत पवित्र स्थान, महापुरुष, सूर्य, चंद्रमा, ग्रह, और देवी-देवता हैं। यह शबद ईश्वर की रचना की अद्भुत और अनंत विविधता को दर्शाता है, जिसे समझ पाना मानवीय बुद्धि से परे है।

रोटियां

बारिजु करि दाहिणै सिधि सनमुख मुखु जोवै ॥ रिधि बसै बांवांगि जु तीनि लोकांतर मोहै ॥

लगभग दस साल का अखबार बेचने वाला बालक एक मकान का गेट बजा रहा है..

(शायद उस दिन अखबार नहीं छपा होगा)

मालकिन – बाहर आकर पूछी “क्या है ?

बालक – “आंटी जी क्या मैं आपका गार्डेन साफ कर दूं?

मालकिन – नहीं, हमें नहीं करवाना..

बालक – हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में.. “प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा।

मालकिन – द्रवित होते हुए “अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा?

बालक – पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना..

मालकिन- ओह !! आ जाओ अच्छे से काम करना….

(लगता है बेचारा भूखा है पहले खाना दे देती हूँ.. मालकिन बुदबुदायी)

मालकिन- ऐ लड़के.. पहले खाना खा ले, फिर काम करना…

बालक – नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना…

मालकिन – ठीक है ! कहकर अपने काम में लग गयी..

बालक – एक घंटे बाद “आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं…

मालकिन -अरे वाह ! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए.. यहां बैठ, मैं खाना लाती हूँ..

जैसे ही मालकिन ने उसे खाना दिया.. बालक जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा..

मालकिन – भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले.. जरूरत होगी तो और दे दूंगी..

बालक – नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है.. सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है, पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं खाना है..

मालकिन रो पड़ी.. और अपने हाथों से मासूम को उसकी दुसरी माँ बनकर खाना खिलाया..

फिर… उसकी माँ के लिए रोटियां बनाई.. और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आयी….

और कह आयी-

“बहन आप तो बहुत अमीर हो.. जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है वो हम अपने बच्चों को नहीं दे पाते हैं”.ईश्वर बहुत नसीब वालों क़ो ऐसी औलादे देता है

केते पवण पाणी वैसंतर केते कान महेस…

केते पवण पाणी वैसंतर केते कान महेस ॥
केते बरमे घाड़ति घड़ीअहि रूप रंग के वेस ॥

 

कितने ही पवन (हवा), जल (पानी), और अग्नि (वैसंतर) हैं।
कितने ही कर्ण (महेश) और शिव (महेस) हैं।
कितने ही ब्रह्मा (बरमे) हैं, जो विभिन्न रूपों और रंगों के आकार में बनते और ढलते रहते हैं।

गहरा विश्लेषण:

  1. प्रकृति के तत्वों की विशालता: “केते पवण पाणी वैसंतर” का अर्थ है कि इस संसार में अनगिनत पवन (हवा), पाणी (जल), और वैसंतर (अग्नि) हैं। यह शबद सृष्टि की विशालता और विविधता को दर्शाता है। यह बताता है कि ईश्वर ने इस सृष्टि में कितनी अद्भुत और अनंत चीजें बनाई हैं, जिनका अंत समझ पाना कठिन है।
  2. ईश्वर के अनगिनत रूप: “केते कान महेस” का मतलब है कि अनगिनत शिव (महेश) और कान (शिव के रूप) हैं। यह बताता है कि ईश्वर के रूप और उनके अवतार भी अनगिनत हैं। हर दिशा में हमें उनके अलग-अलग रूप और शक्तियों का अनुभव होता है।
  3. ब्रह्मा के अनगिनत सृजन: “केते बरमे घाड़ति घड़ीअहि रूप रंग के वेस” का अर्थ है कि अनगिनत ब्रह्मा हैं जो अनगिनत रूप, रंग, और वेष में सृष्टि का निर्माण करते हैं। यह सृष्टि की अनंतता और उसके विभिन्न रूपों को दर्शाता है। हर जीव, वस्तु और तत्व ईश्वर की रचना है, जो विभिन्न रंगों और आकारों में प्रकट होती है।

संदेश:

यह शबद हमें बताता है कि इस सृष्टि में अनंत तत्व, रूप, और शक्तियाँ हैं। ईश्वर की रचना की महत्ता और विविधता को समझ पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है। पवन, पानी, अग्नि, शिव, ब्रह्मा—सभी अनगिनत रूपों में विद्यमान हैं और सृष्टि के निर्माण और संचालन में अपनी भूमिका निभाते हैं।

यह शबद हमें सिखाता है कि सृष्टि और उसके रचयिता की विशालता और विविधता को समझना हमारे लिए कठिन है। हमें इस विशाल सृष्टि और उसके रचयिता के प्रति आदर और भक्ति रखनी चाहिए।

सारांश:

“केते पवण पाणी वैसंतर” से लेकर “केते बरमे घाड़ति घड़ीअहि रूप रंग के वेस” तक का संदेश यह है कि इस सृष्टि में अनगिनत पवन, पानी, अग्नि, शिव, और ब्रह्मा हैं। सृष्टि के रूप और रंग अनंत हैं, और ईश्वर की रचना का विस्तार और विविधता अद्भुत है। ईश्वर की इस अनंतता को समझ पाना मानवीय सोच से परे है।

मौका

ससीअरु अरु सूरु नामु उलासहि सैल लोअ जिनि उधरिआ ॥
सोई नामु अछलु भगतह भव तारणु अमरदास गुर कउ फुरिआ ॥

 

एक बार मैं अपने गाँव लौट रहा था। ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर रुकी, जहाँ 15 मिनट का ठहराव था। प्लेटफार्म पर उतरते ही भीड़ का शोर सुनाई दिया। भीड़ से दूर, मेरी नजर एक बेंच पर बैठे व्यक्ति पर गई। कुछ खास था उसमें, लेकिन उससे पहले कि मैं कुछ सोच पाता, ट्रेन का हॉर्न बजा और मुझे जल्दी से अपनी सीट पर लौटना पड़ा।

ट्रेन में बैठते ही मैंने चाय का ऑर्डर दिया। चाय के गर्म घूँट लेते-लेते पुरानी यादें ताज़ा होने लगीं। उन दिनों की याद आई जब मैं भी एक रेलवे स्टेशन पर बैठा अपनी किस्मत पर सोच रहा था। बारिश हो रही थी, ठंड गहरा रही थी और मैं अंदर से पूरी तरह टूटा हुआ था।

रात का समय था, जब एक व्यक्ति पास आकर मुझसे माचिस मांगने लगा। मैंने झट से जवाब दिया, “सिगरेट नहीं पीता मैं।”

वह मुस्कुरा कर बोला, “भाई, माचिस सिगरेट के लिए नहीं मांगी, बस आग जलाने के लिए चाहिए।”

मैंने चिढ़ते हुए कहा, “जब सिगरेट नहीं पीता तो माचिस क्यों रखूं?”

उसने हँसते हुए कहा, “ठीक है, चाय और माचिस खुद ही मंगवा लेता हूँ।”

थोड़ी देर बाद वह चायवाला मेरे पास चाय लेकर आया और कहा, “आपके लिए चाय उस साहब ने मंगवाई है।”

मैं हैरानी और गुस्से में उस व्यक्ति के पास गया और बोला, “आपकी समस्या क्या है? मुझे क्यों परेशान कर रहे हैं?”

वह शांत स्वर में बोला, “भाई, सोचा बारिश हो रही है, ठंड भी है, शायद चाय पीने से तुम्हें थोड़ा आराम मिले।”

मैंने फिर चिढ़कर कहा, “यही तो हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है। कोई किसी को चैन से बैठने भी नहीं देता। मैंने सोचा था यहाँ शांत बैठूंगा, पर आप आ गए।”

वह अभी भी शांति से बोला, “तुम्हें क्या परेशान कर रहा है? कुछ बताओगे?”

उसकी शांति और उसकी आंखों में सुकून देखकर मैं थोड़ा रुक गया। फिर मैंने कहा, “बताने से क्या होगा?”

उसने जवाब दिया, “शायद तुम्हारी परेशानी हल हो जाए। कम से कम तुम हल्का महसूस करोगे।”

उसकी बातों में कुछ ऐसा था कि मैं धीरे-धीरे उसे अपनी कहानी सुनाने लगा। मैंने बताया कि मेरे पिता एक साधारण नौकरी करते थे और माँ दूसरों के घरों में काम करके मुझे पढ़ाती थीं। मेरे पिता चाहते थे कि मैं सरकारी नौकरी करूं, पर मुझे व्यापार का शौक था। पिताजी ने मेरी सोच का सम्मान करते हुए अपनी ज़मीन बेचकर मुझे पैसे दिए, और मैंने व्यवसाय शुरू किया।

शुरुआत में सब कुछ अच्छा चल रहा था। व्यापार बढ़ रहा था, शादी भी हो गई, बच्चे भी थे। लेकिन एक गलत निवेश ने सबकुछ तबाह कर दिया। धीरे-धीरे सब कुछ खत्म हो गया। अब केवल घर बचा था और अगर कल किस्त नहीं भरी तो वह भी नीलाम हो जाएगा।

मेरी कहानी सुनने के बाद वह व्यक्ति गंभीर स्वर में बोला, “तुम अपने आप को एक और मौका क्यों नहीं देते?”

मैंने हंसते हुए कहा, “ऐसी बातें फिल्मों में होती हैं, असल ज़िंदगी में नहीं। वैसे, आपकी हालत भी मुझसे बेहतर नहीं दिख रही। कौन हैं आप?”

उसने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “मैंने सोचा, शायद तुम पहचान लोगे, लेकिन कोई बात नहीं। मैं अनिल हूं।”

“अनिल?” मैंने चौंकते हुए कहा, “क्या वही जो सफल बिजनेसमैन हैं?”

वह बोला, “हाँ, वही! पर एक समय मैं भी तुम्हारी तरह बर्बाद हो चुका था। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। खुद को एक और मौका दिया और धीरे-धीरे फिर से उठ खड़ा हुआ।”

उसकी बातों ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या सच में ऐसा हो सकता है? उसने बेंच से उठते हुए कहा, “हर किसी की ज़िंदगी में मुश्किलें आती हैं, लेकिन उनसे लड़कर निकलना ही असली जीत है।”

वह वहाँ से चला गया, और मैं उसकी बातों में खो गया। अगले दिन मैंने भी खुद को एक और मौका देने का फैसला किया। बैंक में जाकर मैंने अपनी समस्या बताई और कुछ समय की मोहलत मांगी। बैंक ने मेरे रिकॉर्ड और मेरी ईमानदारी को देखकर मुझे थोड़ा वक्त दिया और फाइनेंस की व्यवस्था कर दी। धीरे-धीरे मैंने अपने व्यवसाय को फिर से खड़ा किया, और आज मैं सफल हूँ।

ट्रेन की सीट पर बैठे हुए, मैं उस रात को याद कर रहा था जब अनिल ने मुझे यह सब सिखाया। जैसे ही ट्रेन का हॉर्न बजा, मैं वर्तमान में लौट आया। टिकट चेक करने वाले ने मुझे बताया कि मेरा स्टेशन आने वाला है।

टैक्सी में बैठते हुए, मैं सोच रहा था कि अगर अनिल मुझे उस रात न मिला होता, तो शायद मैं हार मान चुका होता। उसने मुझे सिखाया कि जीवन में एक और मौका देना कितना जरूरी है। हो सकता है, आपकी ज़िंदगी में कोई “अनिल” न आए, लेकिन खुद को कभी हारने मत देना। आप नहीं जानते कि अगली कोशिश में आपकी किस्मत कब बदल जाए।

धरम खंड का एहो धरमु ॥ गिआन खंड का आखहु करमु ॥

धरम खंड का एहो धरमु ॥ गिआन खंड का आखहु करमु ॥

 

धर्म खंड (धर्म के क्षेत्र) का यही धर्म है।
अब ज्ञान खंड (ज्ञान के क्षेत्र) के कर्मों की बात बताओ।

गहरा विश्लेषण:

  1. धर्म खंड: “धरम खंड का एहो धरमु” का मतलब है कि धर्म के क्षेत्र में यही नियम है कि हर व्यक्ति अपने कर्मों के आधार पर न्याय पाता है। इस संसार में धर्म का मुख्य उद्देश्य यही है कि व्यक्ति सच्चे और धर्मपूर्ण कर्म करे। धर्म खंड को कर्मों और धर्म के पालन के रूप में देखा जाता है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के आचरण और उसके कार्यों के आधार पर न्याय किया जाता है।
  2. ज्ञान खंड: “गिआन खंड का आखहु करमु” का अर्थ है कि अब ज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, जहाँ कर्मों से आगे बढ़कर ज्ञान की महत्ता है। यहाँ “करमु” का संदर्भ यह है कि ज्ञान खंड में मनुष्य अपने कर्मों के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करता है। यह वह स्तर है जहाँ व्यक्ति केवल कर्मों से संतुष्ट नहीं होता, बल्कि जीवन और सृष्टि के गहरे रहस्यों को समझने के लिए ज्ञान की खोज करता है।

धर्म और ज्ञान का संबंध:

  • धर्म खंड में व्यक्ति अपने कर्मों पर ध्यान केंद्रित करता है। धर्म का पालन, सही और गलत का निर्णय, और जीवन में नैतिकता का पालन, यह सब इस क्षेत्र का हिस्सा हैं।
  • ज्ञान खंड में व्यक्ति कर्मों के पार जाकर सृष्टि, आत्मा, और परमात्मा के गहरे ज्ञान की ओर बढ़ता है। यहाँ कर्मों का उद्देश्य केवल अच्छे कार्य करना नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व के उच्च उद्देश्य को समझना और सत्य का ज्ञान प्राप्त करना है।

संदेश:

यह शबद हमें यह सिखाता है कि धर्म का पहला स्तर कर्मों पर आधारित है, जहाँ व्यक्ति अपने आचरण के अनुसार न्याय प्राप्त करता है। लेकिन इससे आगे ज्ञान का स्तर आता है, जहाँ व्यक्ति कर्मों से आगे बढ़कर सत्य और ज्ञान की खोज में लग जाता है।

सारांश:

“धरम खंड का एहो धरमु” से लेकर “गिआन खंड का आखहु करमु” तक का संदेश यह है कि धर्म खंड में धर्म का पालन और कर्मों का न्याय महत्वपूर्ण है, जबकि ज्ञान खंड में व्यक्ति ज्ञान की खोज और सृष्टि के रहस्यों को समझने के लिए अपने कर्मों का उपयोग करता है। यह जीवन की एक गहरी यात्रा का प्रतीक है, जहाँ कर्म और ज्ञान दोनों की महत्ता है।

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