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आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु …

आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥

 

उस (ईश्वर) को बार-बार नमन है।
वह आदि (सृष्टि से पहले मौजूद), अनील (निर्मल), अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं), और अनाहत (जिसे कोई चोट या घाव नहीं पहुँच सकता) है।
वह युगों-युगों से एक ही रूप में है।

गहरा विश्लेषण:

1. ईश्वर को नमन:

“आदेसु तिसै आदेसु” का अर्थ है “उस ईश्वर को बार-बार नमन है।” यह वंदना ईश्वर की महानता और उसकी सर्वशक्तिमान स्थिति की ओर इशारा करती है। हम ईश्वर को बार-बार प्रणाम करते हैं क्योंकि वह ही इस सृष्टि का सृजनकर्ता और पालनकर्ता है।

2. आदि (सृष्टि से पहले मौजूद):

ईश्वर को “आदि” कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह सृष्टि के आरंभ से पहले भी मौजूद था। वह समय और सृष्टि की सीमाओं से परे है। इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर अनंत और शाश्वत है।

3. अनील (निर्मल):

“अनील” का अर्थ है निर्मल, यानी ईश्वर शुद्ध और पवित्र है। वह सभी प्रकार की अशुद्धियों और दोषों से परे है। उसकी पवित्रता और शुद्धता अनंत है और किसी भी सांसारिक चीज़ से नहीं मापी जा सकती।

4. अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं):

“अनादि” का अर्थ है जिसका कोई आरंभ नहीं है। ईश्वर सदा से है और सदा रहेगा। इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर न समय के बंधन में बंधा है और न ही उसका कोई अंत है। वह अनंत काल तक अस्तित्व में है।

5. अनाहत (जिसे कोई चोट नहीं पहुँच सकती):

“अनाहत” का अर्थ है जिसे कोई चोट या घाव नहीं पहुँच सकता। इसका तात्पर्य यह है कि ईश्वर किसी भी भौतिक या सांसारिक क्षति से अछूता है। वह अद्वितीय और अभेद्य है।

6. युगों-युगों से एक ही रूप:

“जुगु जुगु एको वेसु” का अर्थ है कि युगों-युगों से ईश्वर का रूप एक ही है। समय चाहे कितना भी बदल जाए, ईश्वर का अस्तित्व और उसकी सत्ता अपरिवर्तित रहती है। वह हर युग में एक समान रहता है और उसकी महिमा अनंत है।

सारांश:

“आदेसु तिसै आदेसु ॥
आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥”
का संदेश है कि हम उस ईश्वर को बार-बार नमन करते हैं, जो सृष्टि के आरंभ से पहले मौजूद है, जो निर्मल, अनादि और अभेद्य है। वह युगों-युगों से एक ही रूप में है और सदा रहेगा। ईश्वर की महानता और उसकी शाश्वत सत्ता इस पंक्ति में वर्णित है, जो हमें यह सिखाती है कि हमें हमेशा उसकी महानता को स्वीकार कर उसे प्रणाम करना चाहिए।

अच्छा चोर…

फरीदा गलीए चिकड़ु दूरि घरु नालि पिआरे नेहु ॥
चला त भिजै क्मबली रहां त तुटै नेहु ॥

 

एक नगर में एक सेठ और एक गरीब का घर पास पास में थे। सेठ को कभी मलाल न होता था कि एक गरीब उसका पड़ोसी है। गरीब की बेटी जिसका नाम रुक्मणि था, सयानी हो चुकी थी। एक रोज़ गरीब ने सेठ से कुछ धन उधार माँगा था ताकि सयानी हुई बेटी के हाथ पीले किये जा सकें। परन्तु सेठ ने उसे इनकार कर दिया।

उसी रात सेठ के घर में एक चोर घुस आया। अभी तक सेठ और सेठानी सोये नहीं थे, तो चोर वहीं दुबक कर बैठ गया।

सेठ सेठानी आपस में बातें कर रहे थे, “देखते ही देखते रुक्मणि विवाह योग्य हो गई है।” सेठानी ने कहा।

“हां लड़कियां कुरड़ी(कूड़े का ढेर) की तरह बढ़ती हैं, पता ही नहीं चलता कब सयानी हो जाती हैं।” सेठ ने कहा।

“अब रुक्मणि के पिता को उसके हाथ पीले कर देने चाहिए, पता नहीं उसके माता पिता क्यों नहीं ये बात सोच रहे।” सेठानी ने कहा।

“वो सोच तो रहें हैं, पर उनके पास धन की कमी है। आज रुक्मणि के पिता ने मुझसे कुछ धन उधार मांगा था।” सेठ ने बताया।

“तो क्या आपने उनको धन दिया?” सेठानी ने पूछा।

“नहीं मैंने उसे देने से इनकार कर दिया, ये सोचकर कि वो गरीब आदमी है लौटाएगा कैसे…पर मुझे लगता है रुक्मणि के पिता को कुछ धन दे देना चाहिए। लड़की का कन्यादान ही समझ लेता। इससे कुछ पुण्य मिल जाता, पर मैं अब उसे नहीं दे सकता। जिसे मैं धन के लिए एक बार मना कर देता हूँ ,उसे दुबारा धन नहीं देता।” कहते हुए सेठ ने आह भरी। कुछ देर बाद सेठ सेठानी बातें करते करते सो गए।

चोर ने सेठ के घर से धन की पोटली चुरा ली और सेठ के घर से निकल आया। सेठ के घर से निकल कर उसे याद आया कि उसकी पत्नी ने कुछ बर्तन चुरा कर लाने का बोला था। वो तो वह भूल गया था, पर अब दुबारा सेठ के घर में घुसना उसे सुरक्षित नहीं लगा, तो उसने सोचा गरीब के घर से कुछ बर्तन चुरा ले जाता हूँ। यह सोचकर वह गरीब के घर में बरतन चुराने के उद्देश्य से घुस गया।

गरीब के घर में भी जाग थी। जिसकी सयानी बेटी घर में कंवारी बैठी रहे उन माता पिता को नींद भी कैसे आये।

चोर दुबक कर बैठ गया।

“…तो सेठ ने धन देने से इनकार कर ही दिया।” गरीब की पत्नी ने कहा।

“हाँ! इनकार कर दिया, पर वो अपनी जगह सही भी है। वो व्यापारी आदमी है। उसे धन का लेन देन करना होता है। हम उसे समय पर धन न लौटा पाये तो उसके व्यापार की पूँजी अटक जाएगी। अब उसे भी अपना सोचना होगा।” गरीब ने ये कहते हुए ठंडी आह भरी।

“परन्तु आप जानते हो न रुक्मणि की उम्र 16 वर्ष हो चुकी है और उन सन्यासी बाबा ने कहा था कि अगर 17 वर्ष के होने तक इसका विवाह न किया तो रुक्मणि की मृत्यु हो जाएगी। रुक्मणि को 17 वर्ष की होने में केवल 4 मास शेष बचे हैं। नहीं तो हमारी इकलौती बेटी हमें बुढ़ापे में बेसहारा छोड़कर भगवान को प्यारी हो जाएगी।” गरीब की पत्नी ने सुबकते हुए कहा।

“हाय रे मेरी किस्मत! मुझे गरीब के घर पैदा किया और साथ में रुक्मणि को मिला अभिशाप… मैं क्या करूँ… कहाँ से धन लाऊँ उसका कन्यादान करने के लिए…इससे बेहतर ईश्वर रुक्मणि की जगह मेरे प्राण ले ले।” गरीब ने आह भरी।

चोर सब सुन रहा था। चोर ने सोचा मैं तो अपनी मौज मस्ती के लिए चोरी करता हूँ। असली धन की आवश्यकता तो इस गरीब को है वरना इसकी बेटी मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी। वो सन्तान को खोने का दर्द वो समझता था। दो वर्ष पूर्व उसके छोटे पुत्र की सर्पदंश से मृत्यु हो चुकी थी। मुझसे अच्छा तो वो सेठ ही है, जिसने कम से कम इसे धन देने का सोचा तो सही।

उसने रसोई में से कुछ बर्तन चुरा कर अपनी साथ में लाई झोली में डाल लिए। चूल्हे में से एक कोयला निकाला और आँगन में ये लिख दिया, “सेठ की तरफ से रुक्मणि के विवाह के लिए दिया गया धन,…. एक चोर।” उसके पास धन की पोटली रखकर और चुराए हुए बर्तन लेकर वहाँ से रफूचक्कर हो गया, क्योंकि उसे भी पत्नी से उलाहना नहीं लेना था।

सुबह दोनों घरों में हड़कंप था। सेठ के यहाँ धन चोरी से और गरीब के यहाँ धन मिलने से, और बर्तन चोरी होने से। एक बार तो गरीब ने सोचा क्यों न धन छुपा लूँ। रुक्मणि का विवाह कर दूँगा… फिर उसने सोचा कि लोग पूछेंगे तो क्या कहूंगा? धन कहाँ से आया…और लोग शक करेंगे सेठ के घर मैंने चोरी की है। मुझसे अच्छा तो वो चोर ही अच्छा निकला, जो मेरी व्यथा सुनकर चुराया हुआ धन रुक्मणि के विवाह के लिए छोड़कर चला गया। जब एक चोर इतनी दयालुता दिखा सकता है तो मैं क्या ईमानदारी नहीं निभा सकता?

गरीब सेठ के धन की पोटली उसके घर ले गया और सारा किस्सा कह सुनाया। सेठ को अपने घर लाकर चोर की लिखी हुई बात भी पढ़वाई।

सेठ ने सोचा ‘एक चोर इतना अच्छा हो सकता है। चुराया हुआ धन इस गरीब की बेटी के विवाह के लिए छोड़ जाता है और कहता है कि सेठ की तरफ से है। तो क्या मैं इस गरीब की बेटी के लिए कुछ धन नहीं दे सकता?’ ,

उसने गरीब को उस पोटली में से आधा धन दे दिया और कहा “ये लो ..ये धन रुक्मणि के विवाह के लिए है और इसे लौटाने की भी जरूरत भी है।”

यह सुनकर गरीब बोला, “सेठ जी आप बहुत अच्छे हैं।”

“अच्छा न मैं हूँ, न तुम हो। अच्छा तो वो चोर था जिसने रुक्मणि के विवाह की व्यवस्था कर दी। मेरे पास धन होते हुए भी मैं तुम्हें न दे सका…और वो चुराया हुआ धन भी दे गया, काश ऐसे अच्छे चोर और भी हों।” सेठजी ने ये कहते हुए गरीब को गले से लगा लिया।

भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि वाजहि नाद…

भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि वाजहि नाद ॥
आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद ॥
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग ॥

 

आध्यात्मिक ज्ञान और करुणा ही असली संपत्ति हैं, और हर हृदय में (ईश्वर की) दिव्य ध्वनि बज रही है।
वह स्वयं सभी का स्वामी है, जिसने सबको बांधा हुआ है।
रिद्धि-सिद्धि (चमत्कारिक शक्तियाँ) ईश्वर की भक्ति के आनंद के सामने तुच्छ हैं।
संसार में संयोग (मिलन) और वियोग (विछोह) के माध्यम से ही संसार का संचालन होता है, और हर किसी का भाग्य उनके कर्मों के अनुसार लिखा जाता है।

गहरा विश्लेषण:
1. ज्ञान और करुणा की महत्ता:
“भुगति गिआनु दइआ भंडारणि” का अर्थ है कि असली भोग (आध्यात्मिक पोषण) ज्ञान और करुणा से आता है। इस पंक्ति में बताया गया है कि सांसारिक भोग (भौतिक सुख) वास्तविक संपत्ति नहीं है, बल्कि सच्चा सुख और संपत्ति ज्ञान और दया में निहित है। ज्ञान हमें सच्चाई की ओर ले जाता है, और दया हमें ईश्वर के करीब लाती है। करुणा के बिना ज्ञान अधूरा है, और ज्ञान के बिना करुणा अधूरी है। ये दोनों मिलकर हमें आध्यात्मिक समृद्धि की ओर ले जाते हैं।

2. ईश्वर की सर्वव्यापकता:
“घटि घटि वाजहि नाद” का अर्थ है कि हर हृदय में ईश्वर की दिव्य ध्वनि गूंज रही है। यह पंक्ति यह बताती है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है और हर व्यक्ति के भीतर उसकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है। ईश्वर की उपस्थिति हर हृदय में एक दिव्य संगीत की तरह गूंजती रहती है, जिसे सुनने के लिए हमें अपने अंदर की आवाज़ पर ध्यान देना होता है।

3. ईश्वर ही स्वामी:
“आपि नाथु नाथी सभ जा की” का अर्थ है कि ईश्वर स्वयं सभी का स्वामी है, और उसने सबको अपने बंधन में बांधा हुआ है। इसका मतलब है कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वह ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही हो रहा है। सभी जीव ईश्वर की मर्जी से बंधे हुए हैं, और वह ही उनका स्वामी है। हमें यह समझना चाहिए कि सभी घटनाओं और परिस्थितियों का संचालन ईश्वर की मर्जी से होता है।

4. रिद्धि-सिद्धि और असली आनंद:
“रिधि सिधि अवरा साद” का अर्थ है कि रिद्धि-सिद्धि (अध्यात्मिक शक्तियां या चमत्कार) ईश्वर की भक्ति के आनंद के सामने तुच्छ हैं। गुरुजी यहां यह सिखाते हैं कि भले ही हमें सांसारिक चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त हो जाएं, लेकिन उनका आनंद और महत्व ईश्वर की भक्ति और उसकी उपासना के आनंद से कम है। असली सुख और संतोष ईश्वर की उपासना में है, न कि सांसारिक शक्तियों में।

5. संसार का संचालन:
“संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि” का अर्थ है कि संसार में संयोग (मिलन) और वियोग (विछोह) दोनों ही संसार के संचालन के दो मुख्य तरीके हैं। जीवन में लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं, और इन घटनाओं के माध्यम से ही संसार का चक्र चलता रहता है। यह संसार का नियम है कि हर किसी को मिलन और बिछोह दोनों का अनुभव करना पड़ता है।

6. भाग्य और कर्म:
“लेखे आवहि भाग” का अर्थ है कि हर किसी का भाग्य उसके कर्मों के अनुसार लिखा जाता है। गुरुजी यहां यह बता रहे हैं कि जीवन में जो कुछ भी होता है, वह हमारे पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर निर्धारित होता है। हमारे अच्छे या बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप हमें इस जन्म में सुख या दुख मिलता है। यह पंक्ति कर्म के सिद्धांत की ओर इशारा करती है, जहां हर व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर न्याय प्राप्त होता है।

“भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि वाजहि नाद ॥
आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद ॥
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग ॥” का संदेश यह है कि असली संपत्ति ज्ञान और करुणा है, और ईश्वर हर व्यक्ति के भीतर मौजूद है। सांसारिक चमत्कारिक शक्तियां ईश्वर की भक्ति के आनंद के सामने महत्वहीन हैं। संसार का संचालन संयोग और वियोग के माध्यम से होता है, और हर व्यक्ति का भाग्य उसके कर्मों के अनुसार लिखा जाता है।

मनोवैज्ञानिक तथ्य

फरीदा जे तू अकलि लतीफु काले लिखु न लेख ॥
आपनड़े गिरीवान महि सिरु नींवां करि देखु ॥

मनोवैज्ञानिक तथ्य

1. बाहरी दिखाई गई चीजों का हमारे मन के साथ कैसा संबंध है: हमारी सोच और भावनाएं अक्सर हमारे बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं।

2. सपने का महत्व: सपने हमारे मन की स्थिति और भावनाओं का प्रतिबिम्ब करते हैं, जो हमारे अवचेतन मन की गहराईयों को प्रकट करते हैं।

3. असंतुलितता का महत्व: मानसिक स्वास्थ्य के लिए संतुलितता महत्वपूर्ण है। असंतुलितता से जुड़ी समस्याएं जैसे कि डिप्रेशन और अंधविश्वास आम होती हैं।

4. समय का महत्व: मानसिक स्वास्थ्य के लिए समय का प्रबंधन महत्वपूर्ण है। समय को सही ढंग से प्रबंधित करना और स्वतंत्रता का अनुभव करना मानसिक संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकता है।

5. स्मृति और सीना: हमारी स्मृति और सीना हमारे मानसिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और इनका संरक्षण और परिवर्तन करने के लिए विभिन्न मानसिक व्यायाम और तकनीकें होती हैं।

6. स्वाधीनता का महत्व: स्वाधीनता और स्वतंत्रता का अनुभव हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। संतुलित और स्वतंत्र मानसिकता स्थायित्व और समर्थता का एहसास कराती है।

7. स्थितिगत ध्यान और मेडिटेशन: ध्यान और मेडिटेशन का अभ्यास मानसिक संतुलन और सामंजस्य को बढ़ावा देता है और स्ट्रेस को कम करने में मदद करता है।

8. सामाजिक संबंधों का महत्व: सामाजिक संबंध हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। सकारात्मक संबंध और सहायक समर्थन हमें आत्म-महसूसी और खुशहाली में मदद करते हैं।

जीवन की परिस्थितियां

कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥

तीरथ बरत नेम कीए ते सभै रसातलि जांहि ॥

 

मेरा बेटा मुझे बृद्ध आश्रम छोड़, आज तक लेने नहीं आया। यह सोच बुढ़ी अम्मा रोने लगती हैं ।

मेरे पति के देहांत के बाद, मेरा बेटा किशोर ही मेरे एक मात्र सहारा था। उनके देहांत के बाद किशोर ने ही घर कि सारी जिम्मेवारी उठाया । हम दोनो अपने एक दूसरे के साथ खुशी खुशी रहते थे। मैंने ने कहा,” किशोर अब तुम्हे शादी कर लेनी चाहिए क्युकी मेरी जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है,आज हु कल रहूगी की नहीं पता नहीं इसलिए मेरे जिंदगी रहते ही शादी कर लो।

मेरी बाद सुन किशोर कहता,”अभी तुम कही नहीं जा रही हो माँ तुम्हें तो अभी मेरे बच्चों को खेलाना है और उसकी शादी भी तो देखना है और तुम माँ अभी ही मरने की बात कर रही हो। हस्ते हुए यह बोल कर किशोर ऑफिस चला जाता है।

फिर मैंने भी उसको शादी केलिए दवाब नहीं डाला, मैंने सोचा जब मन होगा खुद कर लेगा। जब वह ऑफिस से घर आया तो उसके चेहरे पर पहले जैसी मुस्कान नहीं थी। मैंने पूछा,”क्या?? कोई परेशानी है बेटा तो मुझे बताओ।

वो कहता है ऐसी कोई बात नहीं है -माँ, ऑफिस मे थोड़ा काम का प्रेशर है जिस कारण से परेशान हु ।यह बोल कर अपने कमरे में चला जाता है,जब मै उसके कमरे में खाना लेकर जाती हु वो खाने से मना कर देता है और कहता मैंने ऑफिस में खा लिया,आप जाकर खाना खा लीजिये।

वह अब पहले जैसा ना हसी मजाक करता और ना ही पहले जैसा हम से बात करता है। मैने कई बार उस से पूछा कोई बात है तो मुझे बताओ लेकिन वह हर बार काम का प्रेशर बात बोल मेरी बात को टाल देता ।

एक दिन किशोर मुझ से कहता है,” माँ, मुझे अमेरिका कि एक कंपनी से ऑफर आया और सैलरी भी अच्छी खासी दे रहा है। मै कुछ महीने वहा काम करके फिर मै आप के पास लौट आयुंगा।

जब मैंने उस से कहा,”मै अकेली कैसे रहूंगी। उसने कहा,”जब तक मै नहीं आ जाता तब तक आप बृद्ध आश्रम में ही रहना और यह कह कर मुझे बृद्ध आश्रम छोड़ देता है और कहता अगर आप को कोई चीज की कभी जरूर हो तो इस नंबर पर कॉल कर लीजिए।यह बोल कर वह विदेश निकल जाता है।

बृद्ध आश्रम में रहते हुए मुझे तीन महीने से ऊपर का समय हो गया लेकिन मेरे बेटा का आज तक मुझें फोन नहीं आया। मै रोज उसके फोन का इंतज़ार करता शायद आज फोन आ जाए और वह मुझे यहां से आ कर ले जायेगा। ऐसा करते हुए पूरे एक साल बीत गए।अब मै भी आशा खो बैठी थी, मेरा बेटा मुझे आ कर ले जाएगा।

एक दिन मेरी तबियत बहुत खराब हो गई और बृद्ध आश्रम के लोगों ने मुझे अपने बेटे को फोन करने के लिए कहने लगी लेकिन जब मैने फोन करने से मना करने लगी तो उन्होंने मेरी बात को काटते हुए मुझ से उसका नंबर मांगा जो मेरे बेटे ने विदेश जाने से पहले मुझे दिया था।

जब आश्रम के लोगों ने फोन किया तो पता चला की वो उसके दोस्त का नंबर है। उसके की बात सुन हम सभी चौक गए क्युकी उसके दोस्त ने बताया कि उसका दोस्त का कुछ महीने पहले हि देहांत हो गया।उसे लास्ट स्टेज कैंसर था और वो नहीं चाहता था कि उसकी बीमारी के बारे में उसकी माँ को पता चले ताकि वह अपनी आगे कि जिंदगी खुशी से जीए और उसके ना रहने पर भी उसका ध्यान रखने वाला हो इसलिए उस ने अपनी माँ को बृद्ध आश्रम में छोड़ दिया।

यह बात सुन बृद्ध आश्रम के सभी लोगों के आँखो मे आंसू बहने लगे और वो लोग कहने हम कितने गलत थे जो उसके बेटे के बारे मे बुरा सोच रहे थे और उन लोगो ने भी वादा किया की उसकी माँ को हम सभी खुश रखेंगे जिस से उसे कभी भी अपने बेटे की याद ना आए।

जीवन की परिस्थितियां हमेशा स्पष्ट नहीं होतीं, और कभी-कभी लोग अपने प्रियजनों की भलाई के लिए कड़े और असहज निर्णय लेते हैं। हमें दूसरों के फैसलों को जल्दबाज़ी में नहीं आंकना चाहिए, क्योंकि हर कहानी के पीछे एक अनकहा सच हो सकता है

आई पंथी सगल जमाती मनि जीतै जगु जीतु…

आई पंथी सगल जमाती मनि जीतै जगु जीतु ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥

 

सच्चे पंथ (मार्ग) पर चलने वाले सभी लोग एक परिवार के सदस्य हैं। जिसने अपने मन को जीत लिया, उसने संसार पर विजय प्राप्त कर ली।
आदेश है, उस (ईश्वर) को आदेश,
जो आदि (प्रारंभ से), अनील (निर्मल), अनादि (जिसका कोई आदि नहीं है), और अनाहत (जिसे कोई चोट या घाव नहीं पहुंच सकता) है।
वह युगों-युगों से एक ही रूप में है।

गहरा विश्लेषण:

1. सभी जीव समान हैं:

“आई पंथी सगल जमाती” में यह बताया गया है कि सच्चे मार्ग पर चलने वाले सभी लोग एक ही परिवार के सदस्य हैं। इसका मतलब यह है कि सच्चाई और धर्म के रास्ते पर चलने वाले सभी लोग भाई-बहन समान हैं, चाहे उनका धर्म, जाति या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो। गुरु नानक देव जी का यह संदेश संपूर्ण मानवता को एकजुट करने के लिए है, जिसमें सभी लोग बराबर हैं और किसी में कोई भेदभाव नहीं है।

2. मन पर विजय:

“मनि जीतै जगु जीतु” का अर्थ है कि जिसने अपने मन पर विजय प्राप्त कर ली, उसने पूरे संसार को जीत लिया। यह पंक्ति हमें यह सिखाती है कि बाहरी संसार में जीत हासिल करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है अपने भीतर की कमजोरियों, इच्छाओं और मोह-माया पर काबू पाना। मन पर विजय पाने से व्यक्ति को सच्ची शांति और मुक्ति मिलती है, और वह दुनिया के भौतिक आकर्षणों से मुक्त हो जाता है।

3. आदेसु तिसै आदेसु:

यह पंक्ति एक बार-बार दोहराई गई वंदना (प्रणाम) है, जिसमें गुरु नानक देव जी ईश्वर की महानता को स्वीकारते हैं। इसका अर्थ है कि “आदेश है, उस (ईश्वर) को आदेश,” यानी हम ईश्वर को नमन करते हैं, जो अनंत है और जिसने इस सृष्टि की रचना की है। यह पंक्ति इस बात की ओर संकेत करती है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है, और हमें उसकी आज्ञा में रहना चाहिए।

4. ईश्वर के गुण:

  • आदि: ईश्वर आदि (प्रारंभ से पहले) है, जिसका कोई आरंभ नहीं है। वह सृष्टि के निर्माण से पहले भी मौजूद था और सृष्टि के अंत के बाद भी रहेगा।
  • अनील: इसका अर्थ है निर्मल, यानी ईश्वर पवित्र और शुद्ध है। उसमें कोई दोष, पाप या अशुद्धता नहीं है। वह सभी अशुद्धियों और सांसारिक बंधनों से परे है।
  • अनादि: ईश्वर अनादि है, जिसका कोई आरंभ नहीं है। वह समय के बंधन में नहीं बंधा हुआ है। वह सदा से है और सदा रहेगा।
  • अनाहत: अनाहत का अर्थ है जिसे कोई चोट या घाव नहीं पहुंच सकता। यह दर्शाता है कि ईश्वर किसी भी प्रकार के सांसारिक या भौतिक कष्टों से अछूता है। वह अद्वितीय और अभेद्य है।

5. युग-युगांतर से एक ही रूप:

“जुगु जुगु एको वेसु” का अर्थ है कि युगों-युगों से ईश्वर एक ही रूप में है। इसका मतलब है कि ईश्वर का रूप, उसकी सत्ता और उसका अस्तित्व कभी नहीं बदलता। वह समय और स्थान से परे है और सदा एक समान रहता है। यह पंक्ति हमें यह सिखाती है कि ईश्वर शाश्वत है और उसकी सत्ता हर काल और युग में स्थिर है।

सारांश:

“आई पंथी सगल जमाती मनि जीतै जगु जीतु ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥
आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥”
का संदेश यह है कि सच्चे मार्ग पर चलने वाले सभी लोग एक समान हैं, और जिसने अपने मन पर विजय प्राप्त कर ली, उसने संसार पर विजय प्राप्त कर ली। ईश्वर सर्वशक्तिमान, शाश्वत, निर्मल और अनादि है। वह युगों-युगों से एक ही रूप में है, और हमें उसकी महानता को स्वीकार कर उसकी आज्ञा में जीवन जीना चाहिए।

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