Author name: EkAdmin

मत सता लड़की को..

सरब गुण निधानं कीमति न ग्यानं ध्यानं ऊचे ते ऊचौ जानीजै प्रभ तेरो थानं ॥

“पापा मैं कल से कॉलेज नहीं जाऊंगी…अब और बर्दाश्त नहीं होता मुझसे।” कोयल ने लगभग रोते हुए अपने पिता सुंदर से कहा।

“क्या हुआ बेटी बताओ कुछ, यूँ रोना बन्द करो, बताओ भी।” सुंदर ने पूछा।

“पापा रोज आते जाते रस्ते में एक लड़का है, वो मुझे छेड़ता है, फिकरे कसता है, उसके साथ दो चार लड़के और भी रहते हैं, मेरा रस्ते चलना मुहाल कर दिया है इन लड़कों ने।” कोयल ने आँखों में पानी भरते हुए कहा।

“कौन कुत्ते हैं, तू अभी चल मेरे साथ , मैं उसकी खाल उधेड़ दूँगा।” सुंदर ने ताव खाते हुए कहा।

“नहीं , मैं नहीं जाऊंगी, आप ही जाओ, शमशेर नाम है उसका।” कोयल ने बताया।

सुंदर बहुत गुस्से में भरा गया, और लौटा तो उसका मुँह उतरा हुआ था।

“क्या हुआ, कोयल के पापा, उसको अच्छे से धमका आये न।” कोयल की माँ ने पूछा।

“अरे वो तो गुंडे हैं पूरे, छः सात जने थे, वो तो मरने मारने पर उतारू हो गए, और बोले ज्यादा गर्मी दिखायेगा तो कोयल पर तेजाब डाल देंगे।” सुंदर ने घबराये हुए कहा।

“ओह अब क्या होगा। ये तो बहुत बड़ी बात हो गई, मेरा तो दिल घबरा रहा है, मेरी फूल सी बच्ची कितनी तकलीफ में आ जायेगी।” कोयल की माँ बहुत घबरा गई।

“वो लड़का अपने ननिहाल में रहता है यहाँ, मैंने उसके नाना का पता कर लिया है, उससे मिलकर गुहार लगाऊंगा कि अपने नाती को समझाए और वो हमारी कोयल को परेशान करना छोड़ दे। मैं उसके पास जाकर आता हूँ।” कहते हुए सुंदर उठ खड़ा हुआ।

“मैं भी चलती हूँ, मैं भी उससे विनती करूंगी।” कोयल की माँ ने कहा।

“नहीं मैं ही जाता हूँ।” कहकर सुंदर चला गया।

“जी वो आपका नाती मेरी बेटी को राह चलते छेड़ता है, उसे समझाइए यूँ मेरी बेटी को न सताये। उसकी और मेरी इज़्ज़त का सवाल है। मेरी बेटी कहती है कि वो अब कॉलेज नहीं जाएगी।” सुंदर ने गिड़गिड़ाते हुए शमशेर के नाना से कहा।

“सुषमा याद है क्या तुमको।” उस बुजुर्ग ने कहा।

“सुषमा…ओह ..ह्म्म्म।” सुंदर ने बैठे हुए दिल से कहा।

“याद है न तुम और तुम्हारे दो चार लफंगे दोस्त मेरी बेटी सुषमा को स्कूल जाते वक्त छेड़ते थे, मैंने अपनी इज़्ज़त के लिए उसकी स्कूल बीच में छुड़वाकर उसकी शादी कर दी थी। मैंने भी वही दर्द महसूस किया है जो आज तुम कर रहे हो। वक़्त अपना बदला लेता है, कल कोई सुंदर था आज कोई शमशेर है। वैसे बता दूं ये शमशेर सुषमा का ही बेटा है, वो अपनी माँ के साथ किये गए दुर्व्यवहार का बदला ले रहा है, और मुझे इससे सुकून मिल रहा है। चले जाओ यहाँ से इससे पहले कि शमशेर आकर तुम्हारे साथ हाथापाई करे।” उस बुजुर्ग ने सुंदर को अपने शब्दों के साथ जैसे जोर से जमीन पर ला पटका हो।

सुंदर ने एक दो मोहल्ले वालों से मदद के लिए कहा। सबने उसे यही कहा भाई अपने कर्म भूल गया क्या? मोहल्ले की लड़कियों को कितना सताया है तूने? अब खुद पर आई है तो मदद माँग रहा है… कोई मदद नहीं करेगा, कौन गुंडों के मुँह लगे।

सुंदर बिल्कुल टूटा हुआ घर आ गया, “क्या कहा उस आदमी ने ।” कोयल की माँ ने पूछा, कोयल भी वहीं बैठी थी।

“अरे वो बुड्ढा तो बहुत अकड़ू है, बोला मैं क्या करूँ जवान लड़के घरवालों की बात कहां मानते हैं। सुनो क्यों न हम पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दें।” सुंदर ने हिम्मत दिखाते हुए कहा।

“पापा पुलिस में शिकायत दर्ज की तो वो गुस्से में आकर मुझ पर तेजाब वेजाब न फेंक दें। अखबार में बहुत पढ़ने को मिलता है, और पुलिस भी उनको क्या सजा दिलवा पाएगी, साल छह महीने से ज्यादा तो सजा होगी नही उन्हें।” कोयल ने आशंका जताई।

“अब मैं क्या करूँ बेटा, कहाँ जाऊँ किससे मदद मांगू,मोहल्ले में भी कोई साथ देने को तैयार नहीं है।” सुंदर ने बिल्कुल निढाल और लगभग रोते हुए कहा।

“मोहल्ले वाले तो तब मदद करते न पापा, जब आप एक अच्छे इंसान होते। पूरे मोहल्ले की लड़कियों को आपने अपने दो चार लफंगे दोस्तों के साथ मिलकर परेशान किया है। अब कहाँ हैं वो आपके लफंगे दोस्त? कितनी लड़कियों की पढ़ाई आप जैसे शोहदों और दिलफेंक आशिकों की वजह से उनके घरवालों ने छुड़वा दी, क्योंकि उन सबमें भी जैसे आज आपकी हिम्मत नहीं है उस तरह हिम्मत नहीं थी। जानते हो वो जो शमशेर है न उसकी माँ का नाम सुषमा है, वो पढ़ लिखकर एक टीचर बनना चाहती थी। उसकी पढ़ाई आपके कारण छूट गई। उसकी जल्दी शादी करवा दी गई, वो तो उसका पति अच्छा था जिसने उसे पढ़ाया और वो मेरे कॉलेज में अब प्रोफेसर है…. और ये शमशेर मुझे कोई छेड़ता वेडता नहीं है। उसकी माँ ने उसे महिलाओं का सम्मान करना सिखाया है। वो तो मुझे आपकी करतूतों का पता चला तब मैंने शमशेर और उसकी माँ के साथ मिलकर आपको सबक सिखाने के लिए ड्रामा किया है। पापा आप जो दूसरों के साथ करते हैं न वो आपको भी कभी देखना पड़ सकता है….इसलिए किसी को सताना नहीं चाहिए…..आपने वो कहावत तो सुनी होगी न…’मत सता लड़की को पाप होगा, तू भी किसी दिन किसी लड़की का बाप होगा।’

कोयल ने हिकारत भरी नजरों से सुंदर से कहा।

सुंदर सर झुकाए अपने पाँवों से जमीन कुरेद रहा था।

“आप अपने किये गए अपराध का प्रयाश्चित कर सकते हैं, आप लोगों को समर्थन में लीजिये और एक अपना ग्रुप बनाइये जो मौहल्ले की लड़कियों को छेड़ने वालों को सबक सिखा सके, 10 के आगे पांच का कोई मोल नहीं रहता, आप ये करेंगे तो आस पास के मौहल्लों में भी ये बात जाएगी, वो भी शायद ऐसा कोई ग्रुप बना लें, जिसका उद्देश्य हो ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ पापा आपको ये करना ही होगा…कहीं से तो नई शुरुआत होनी ही चाहिए।” कहकर कोयल अपने शर्मिंदा हुये पापा के गले से लग गई।

एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस…

एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस ॥
सुणि गला आकास की कीटा आई रीस ॥

इस मार्ग (ईश्वर के मार्ग) पर चढ़ने के लिए पवित्र सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, और जो इस मार्ग पर चलते हैं, वे इकाई (एकता) को प्राप्त करते हैं।
आकाश की बातें सुनकर तुच्छ जीव (जैसे कीड़े) भी ईर्ष्या से भर उठते हैं।

गहरा विश्लेषण:

1. आध्यात्मिक मार्ग पर चढ़ाई:

“एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस” का अर्थ है कि ईश्वर की ओर जाने वाले मार्ग पर चलना आसान नहीं है। यह मार्ग सीढ़ियों जैसा है, और हर कदम के साथ आध्यात्मिकता में उन्नति होती है। जो लोग इस आध्यात्मिक पथ पर चलते हैं, वे एकता (इकीस) को प्राप्त करते हैं। “इकीस” का अर्थ है एकता और आध्यात्मिक समरसता—यानी, व्यक्ति के भीतर और बाहर एकता और शांति का भाव आ जाता है, और वह ईश्वर के साथ एकरूप हो जाता है।

2. निम्न प्रकृति का ईर्ष्या करना:

“सुणि गला आकास की कीटा आई रीस” का अर्थ है कि जब तुच्छ और अज्ञानता से भरे हुए जीव (कीड़े) उन ऊँचाइयों की बातें सुनते हैं, जो आध्यात्मिक लोग (जो ईश्वर के करीब होते हैं) अनुभव करते हैं, तो वे ईर्ष्या से भर जाते हैं। कीड़े यहाँ तुच्छ और निम्न प्रकृति के जीवों का प्रतीक हैं, जो ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों की उपलब्धियों को देखकर ईर्ष्या करने लगते हैं। यह बताता है कि जो लोग आध्यात्मिक ऊँचाइयों पर पहुँचते हैं, उनके मार्ग और सफलता को हर कोई समझ नहीं सकता और कुछ लोग नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ दे सकते हैं।

3. आध्यात्मिकता की महानता:

यह पंक्तियाँ हमें बताती हैं कि ईश्वर का मार्ग कठिन है और उस पर चलने वाले को कई सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं, जिससे वह धीरे-धीरे आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर के साथ एकत्व को प्राप्त करता है। लेकिन जो लोग इस मार्ग पर नहीं होते, वे इसे समझने के बजाय उस पर ईर्ष्या या द्वेष कर सकते हैं।

सारांश:

“एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस ॥
सुणि गला आकास की कीटा आई रीस ॥”
का संदेश यह है कि ईश्वर के मार्ग पर चलना आध्यात्मिक उन्नति की एक यात्रा है, जिसमें व्यक्ति को अनेक सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। इस यात्रा के अंत में एकता और ईश्वर से मेल होता है। लेकिन जब तुच्छ और निम्न प्रकृति के लोग इस मार्ग की महानता को देखते या सुनते हैं, तो वे ईर्ष्या करने लगते हैं, क्योंकि वे इसे समझ नहीं पाते।

नशे_की_लत / शादी

हरि अंतु नाही पारावारु कउनु है करै बीचारु जगत पिता है स्रब प्रान को अधारु ॥

” बहु रात के 11:00 बज रहे हैं। रोहन अभी तक घर पर नहीं आया और तू चैन से बैठी हुई है। कैसी पत्नी है तू? अपने पति को संभाल कर रखना भी नहीं आता। उसे फोन लगा कर पूछ तो सही कि कहाँ है। और कितनी देर लगेगी उसे आने में”

विमला जी अपनी बहू मधु को डांटते हुए बोली,

” मुझ से क्या पूछ रही है आप माँजी। आपका बेटा कोई छोटा बच्चा तो है नहीं कि यहां वहाँ गुम हो जाएगा। वो बेटे तो आपके है। आप फोन लगा कर पूछ लीजिए कि कहां रह गए?”

मधु ने बेपरवाही के साथ जवाब दिया।

” हां, मैं तो मां हूं ना। मैं तो फोन करके पूछूंगी ही कि वो कहां रह गया। लेकिन पत्नी होने के नाते तेरा भी तो कुछ फर्ज बनता है या नहीं। कि तुझे यहां पूजा करने के लिए लेकर आए हैं?”

विमला जी ने पलट कर जवाब दिया।

पर इस बार मधु ने कोई जवाब नहीं दिया, इसलिए विमला जी भुनभुनाती हुई अपने कमरे में आ गई और मोबाइल लेकर रोहन को फोन लगाने लगी। लेकिन रोहन ने फोन नहीं उठाया।

” ये रोहन भी ना, कभी भी टाइम से घर पर नहीं आता। पता नहीं क्यों मेरी जान जलाते रहता है। सोचा था बहू आने के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा। पर नहीं, यहाँ तो बहू भी उसके जैसी ही आई है। पति से कोई लेना देना ही नहीं उसे। अरे पत्नियाँ तो अपने पति को बांधकर रखती है। और एक इसे देखो तो? अब तक रोहन को सुधार नहीं पाई”

बड़बड़ाती हुई विमला जी वापस बाहर आई तो देखा मधु अपने कमरे में जा चुकी थी। वो भी उसके कमरे की तरफ गई और धीरे से दरवाजा खोलकर देखा तो वो सो चुकी थी। विमला जी वापस बाहर हाॅल में आ गई।

” कैसी औरत है ये? पति अब तक घर नहीं आया और उसे नींद भी आ गई। बेशर्म कहीं की”

विमला जी ने फिर से रोहन को फोन ट्राई किया। लेकिन रोहन ने एक बार भी फोन रिसीव नहीं किया। आखिर वो थक हार कर वही हाॅल में सोफे पर बैठ गई।

रात को 12:30 बजे घर की बेल बजी। विमला जी ने भाग कर दरवाजा खोला तो बाहर रोहन को नशे में हालत में खड़े देखा। वो तो खुद को संभाल भी नहीं पा रहा था। आखिर विमला जी उसे सहारा देकर जैसे तैसे घर में लेकर आई और सोफे पर बिठा दिया।

” कहते हैं बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है। इस बुढ़ापे में तुझे मुझे सहारा देना चाहिए। और यहाँ मैं तुझे सहारा दे रही हूं। अरे कुछ तो शर्म कर। कब तक मुझे यूं ही परेशान करता रहेगा”

विमला जी उसे डांटते हुए बोली। लेकिन उसे होश हो तब तो वो कोई जवाब दे।

आखिर नशे की हालत में ही जब सोफे पर वो लुड़क गया तो विमला जी उसे वहीं छोड़कर अपने कमरे में आ गई।

“जब बीवी को ही कुछ नहीं पड़ी है तो मैं भी क्या करूँ? पहले एक ही खून पीता था और अब दो दो लोग मिलकर पीते हैं। मेरी तो जिंदगी ही खराब हो चुकी है”

बड़बड़ाती हुई वो चादर तानकर सो गई।

सुबह जब नींद खुली तो देखा हाॅल में रोहन अभी भी सोया पड़ा था। जबकि मधु वहीं पास में डाइनिंग टेबल पर बैठी चाय पी रही थी। विमला जी को देखते ही मधु ने पूछा,

” माँ जी आप चाय पियेंगी?”

उसे देखकर विमला जी अपने हाथ जोड़ते हुए बोली,

” तू ही पी तेरी चाय। पति यहाँ नशे में पड़ा हुआ है। लोगों का तो खाना पीना दुश्वार हो जाता है। पर तेरे हलक से कैसे उतर रही है ये चाय?”

विमला जी की बात सुनकर मधु मुस्कुराते हुए बोली,

” क्या बात है मां जी? आज तो बहुत ज्यादा गुस्सा हो रही है आप। भला मैं क्यों अपना खाना पीना बंद करूं? आपका बेटा इतने सालों से बिगड़ा हुआ था। आपने तो खाना पीना बंद नहीं किया। तो मुझसे उम्मीद क्यों कर रही हो?”

मधु की बात सुनकर विमला जी गुस्से से उसे घूरने लगी। उन्हें अपनी तरफ देखता देख कर मधु बोली,

” माँ जी थोड़ी शांति बनाए रखिए। कहीं बीपी ना हाई हो जाए आपका। मैंने नाश्ता तैयार कर दिया है और दोपहर का खाना भी बना कर रख चुकी हूं। अभी शांति आ जाएगी साफ सफाई करने के लिए। तो आप उससे साफ सफाई करवा लेना। और मैं जा रही हूं अपने मायके अपनी मां से मिलने के लिए। शाम तक वापस आ जाऊंगी”

” शाम को भी क्यों वापस आती है? वहीं रह जाना। वैसे भी तेरा इस घर में होना नहीं होना एक ही बराबर है। जो अपने पति को संभाल नहीं सकती वो मेरा घर क्या संभालेगी”

” क्या बात कर रहे हो आप भी माँ जी। वहीं रहने के लिए थोड़ी ना आपके बेटे से शादी की थी। बहु को तो ससुराल में ही होना चाहिए। यही तो संसार का नियम है”

कहकर मधु वहाँ से रवाना हो गई। घर से कुछ दूरी पर पहुंचकर ऑटो पकड़कर अपने मायके रवाना हो गई। ऑटो में बैठे-बैठे उसे वो दिन याद हो आया जब वो इस घर में दुल्हन बनकर आई थी। कितने अरमान थे उसके। पर वो अरमान उस समय धराशाई हो गए जब रोहन शराब के नशे में धुत होकर घर आया था। शादी के ठीक दूसरे दिन उसने ये हरकत की। उसने हैरानी से विमला जी की तरफ देखा तो विमला जी ने बात संभालते हुए कहा था,

“अब बहू थोड़ी बहुत तो हर कोई पीता ही है। पर तुम आ गई हो ना अब तुम संभाल लोगी। इसीलिए तो उसकी शादी की है। सावित्री तो अपने पति की जान यमराज से वापस लेकर आ गई थी। तुम्हें तो सिर्फ उसे सुधारना है”

विमला जी की बात सुनकर मधु हैरान खड़ी रह गई। मतलब अपने बेटे को सुधारने के लिए उन्होने उसकी जिंदगी तो दांव पर लगा दी। पूरी रात मधु के दिमाग में यही बात चलती रही। दूसरे दिन मधु पग फेरे के लिए गई तो मायके वालों ने भी यही जवाब दिया,

” बेटा थोड़ी बहुत तो आजकल हर कोई पीता है। ये तुम पर निर्भर करता है कि तुम उसे कैसे संभालती हो। एक पत्नी चाहे तो क्या नहीं कर सकती। और फिर इसके अलावा कोई कमी तो नहीं है। थोड़ा बहुत एडजस्ट तो सबको करना पड़ता है”

पिता तो उसके थे नहीं। मां ने जरूर इतना कहा,

” बेटा जैसे भी हो अपना घर संभाल ले। अगर तू छोड़कर भी आई तो यहां तेरे भाई भौजाई रखेंगे, इसकी कोई गारंटी है क्या? जिन्होंने ये जानते हुए तेरी शादी एक शराबी से कर दी। वो तुझे यहां रखेंगे इसकी तू उम्मीद मत कर”

मधु को समझ ही नहीं आया कि वो करें क्या? इसलिए चुपचाप वापस ससुराल आ गई। अब जब भी रोहन शराब पीकर आता तो मधु रोती, परेशान होती। पर विमला जी तो चैन की बांसुरी बजा रही होती। आखिर बेटे को बहू के हाथों संभला कर वो बेफिक्र हो चुकी थी।

लेकिन अभी दो महीने पहले रोहन ने शराब के नशे में मधु की जमकर पिटाई कर दी। सिर्फ इस कारण की मधु ने उसे शराब पीने से रोका था। विमला जी ने उसमें भी मधु की ही कमी निकाल दी,

” हे भगवान! एक पति तक नहीं संभाल सकती, पूरा घर क्या संभालेगी? मैंने तो ये सोचकर अपने बेटे की शादी की थी कि घर में बहू आएगी। उसे सुधार देगी। लेकिन ये तो उल्टा उसे परेशान करने का काम करती है। अब तेरे सारे नाजो नखरे तो उठाता है, तेरे खर्चे उठाता है। फिर तू हर समय उसके पीछे पड़ी रहेगी तो हाथ नहीं उठाएगा तो बेचारा क्या ही करेगा? थोड़ा प्यार से संभाला कर”

जब मायके वालों से कहा तो वो लोग भी हमदर्दी जताकर चले गए। भाभी तो ये तक कह कर चली गई कि एक पति नहीं संभाल सकती तो और कुछ क्या सम्भालेगी… दोबारा लौटने की सोचना भी मत। हम अपना देखे या तुम्हारा देखें? तुम्हारी मां को रख रखा है वही बड़ी बात है।

सो मधु ने भी सोच लिया कि जब रहना ऐसे ही घर में है तो या तो जिंदगी भर मार खाते रहो और रोते रहो। या फिर बेशर्म हो जाओ और अपना रास्ता खुद चुनो। मधु ने दूसरा रास्ता चुना। मधु को धीरे धीरे ये बात समझ में आ गई कि रोहन उससे लड़ता झगड़ता तभी था जब वो शराब के नशे में होता था। वरना तो वो मधु से अच्छे से ही बात करता था। इसलिए वो अब रोहन से जब वो नशे में होता तो ज्यादा कुछ कहती भी नहीं थी।

उसने एक दो बार नौकरी के लिए कहा तो विमला जी ने हंगामा कर दिया। इसके बाद रोहन ने नशे की हालत में विमला जी के कहने पर उसके साथ काफी गाली गलौज किया था। इसलिए उनके सामने उसने नौकरी के लिए कहना ही छोड़ दिया।

पर उसे नौकरी तो करनी ही थी। पढ़ी-लिखी तो वो थी ही, आत्मनिर्भर तो उसे बनना ही था। पर आखिर बाहर कैसे जाए? इसलिए अक्सर मायके का नाम लेकर निकल जाती थी। अभी एक सप्ताह पहले इंटरव्यू देकर आई थी। वहां से कॉल आया था तो आज वही जा रही थी।

वहां पहुंची तो उसकी नौकरी पक्की हो गई। उसने सारे जरूरी पेपर्स डिपॉजिट कर दिए। उसे दूसरे दिन से ही ज्वाइन करने को कह दिया गया। जब वापस लौट कर आई तो रोहन भी होश में आ चुका था। विमला जी गुस्से में बैठी उसे ही घूर रही थी। जैसे ही उसने घर में कदम रखा विमला जी बोली,

” आ गई महारानी अपने मायके वालों से मिलकर। यहां सास और पति भूखे बैठे हो, उससे कोई लेना देना नहीं बेशर्म कहीं की ”

विमला जी की बात सुनकर मधु बोली,

” कैसी बात कर रहे हो आप मां जी। खाना बना कर तो गई थी आपके लिए। फिर मेरा क्यों इंतजार कर रहे थे आप?”

” मधु कहां गई थी तुम? अभी तुम्हारी मम्मी का फोन आया था। तुम तो मायके पहुंची ही नहीं”

अचानक रोहन ने कहा।

रोहन की बात सुनकर मधु ने रोहन की तरफ देखा और कहा,

” मुझे नौकरी मिल गई है। कल से ज्वाइन करनी है”

” हां, ये देखो। ये होता है औरत का त्रिया चरित्र। मायके का नाम लेकर पता नहीं कहां घूमती फिर रही है। और हमारे घर की इज्जत को उछाल रही है”

विमला जी बीच में ही बोली।

” माँ मैं बात कर रहा हूं ना। आप क्यों बीच में बोल रहे हो? तुम्हें नौकरी की क्या जरूरत है मधु? तुम्हारी सारी जरूरत तो पूरी कर रहा हूं?”

रोहन ने शांतिपूर्वक मधु से पूछा तब मधु ने कहा,

” मुझे मेरे मायके का कोई संबल नहीं है। मुझे अपना संबल खुद बनना है इसलिए मैं नौकरी ज्वाइन कर रही हूं…

मैं इसलिए नौकरी ज्वाइन कर रही हूं ताकि मैं अपने अंदर इतनी हिम्मत जुटा सकूं कि मैं आपके सामने खड़े होकर ये कह सकूं कि आप शराब छोड़ रहे हो या मुझे?”

उसकी बात सुनकर रोहन सकते में आ गया। जबकि विमला जी अपना माथा पीटते हुए बोली,

” हाय राम! पति को छोड़ने के बात कर रही है। बेशर्म। अपना घर अपने हाथों ही तोड़ रही है। ऐसा नहीं कि पति को सुधारने की कोशिश करें। बल्कि जो है उसे भी बिगाड़ रही है”

” बस कीजिए मां जी, बहुत बोल दिया आपने। मैं कोई नशा मुक्ति केंद्र नहीं हूं। एक इंसान हूं जिसकी अपनी जिंदगी है। और मुझे अपनी जिंदगी के बारे में सोचने का पूरा हक है। पर मैं इस रिश्ते तोड़ने से पहले इस रिश्ते को एक मौका देना चाहती हूं। बताइए रोहन जी आप नशा छोड़ेंगे या फिर पत्नी?”

रोहन काफी देर तक मौन रहा। फिर कुछ सोच समझकर बोला,

” ठीक है, जब तुम इस रिश्ते को एक मौका देना चाहती हो तो मैं ये मौका लूँगा। कब ज्वाइन करना है तुम्हारा नशा मुक्ति केंद्र?”

उसकी बात सुनकर जहाँ मधु के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई, वहीं विमला जी बिल्कुल हैरान खड़ी रह गई। उनकी आंखों में से आंसू निकल आए। आखिर इतनी कोशिश के बाद जो काम विमला जी नहीं कर पाई, वो मधु ने कर दिया।

दूसरे दिन ही रोहन ने नशा मुक्ति केंद्र ज्वाइन कर लिया। और कुछ महीनो मशक्कत के बाद उसमें वाकई परिवर्तन हुआ। उसने शराब पीना छोड़ दिया। और आज विमला जी अपनी उसी बेशर्म बहू की नजर उतारती नहीं थकती।

मल्लू के घर पर तुरई

ढूढेदीए सुहाग कू तउ तनि काई कोर ॥
जिन्हा नाउ सुहागणी तिन्हा झाक न होर ॥

 

मल्लू मेरे गाँव का एक बुज़ुर्ग था ,जो मेरे बचपने में चल बसा था। मल्लू की उम्र कोई बारह बरस की रही होगी जब उसकी शादी आठ साल की उम्र वाली रामली से हो गई थी। चौदह की उम्र में मल्लू रामली का गौना करके ले आया और सत्रह साल का मल्लू एक लड़की का पिता बन गया। ये वो दौर था जब गाँवों में न सड़कें थीं , न बिजली , और पीने का पानी कुएँ से भरकर लाना होता था । उसमें भी वर्ण व्यवस्था के हिसाब से चार घाट हुआ करते थे। आटा सुबह चार बजे पत्थर की चक्की से पीसा जाता था।

मल्लू शूद्र था। तेरह साल की कच्ची उम्र में रामली माँ बन गई। पहली संतान बेटी हुई । उस उम्र में न मल्लू को लड़की के होने से फर्क पड़ा, न रामली को। दोनों बच्ची को बहुत प्रेम से पालने लगे । गाँवों की बड़ी समस्या है कि जब बच्चे माँ बाप बन जाते हैं तो उनके माता पिता अपनी सब ज़िम्मेदारी से मुक्त हो उन्हें न्यारा (अलग घर कर देना) कर देते हैं। मल्लू और रामली कर साथ यही हुआ। दोनों ने एक खेजड़ी की छाँव में झोंपड़ी बना ली और खुशी खुशी रहने लगे।

मल्लू अपने छोटे से तीन बीघा को जोतता और शहर में जाकर मजदूरी करने लगा था । खेती केवल सावनी होती थी , जो कि बरसात पर निर्भर थी मजदूरी नाम मात्र की होती थी , क्योंकि काम कम होता और काम करने वालों की संख्या ज़्यादा होती । अधिकतर उन्हें घरों मकानों के निर्माण कार्य में ही मजदूरी मिलती थी, पर जैसे तैसे वो गुजारा कर लेते थे।

कुछ समय बाद उन्हें एक लड़का और हुआ, मल्लू ने गाँव बस्ती में बताशे और गुड़ बांटा । गाँवों में मुख्य मिठाई यही होती थी। उस वक़्त तक मल्लू और रामली बेटे बेटी का फ़र्क महसूस करने जितने परिपक्व हो चुके थे । नियति बड़ी क्रूर होती है। गाँव में माता (चेचक) फैली और मल्लू का बेटा उसमें काल का ग्रास बन गया। मल्लू और रामली बहुत दुखी हुये। वो फिर से पुत्र चाहते थे, इसी चाह में रामली फिर से माँ बनी और एक लड़की और हो गई। रामली और मल्लू ने इसे नियति का खेल समझते हुए फिर एक बच्चा और पैदा किया वो भी लड़की हुई । उसके बाद रामली कभी माँ नहीं बन पाई।

सामाजिक विडम्बनाओं और गाँवों की गन्दी सोच ने अब उन्हें दुखी करना शुरू किया। लोग सुबह सुबह मल्लू का मुँह देख लेते तो उसकी पीठ के पीछे थूकते थे और उसके खोज बालने लगे (पाँव के निशान वाली मिट्टी को उठाकर चूल्हे में डाल देना)। मल्लू सब समझता था कि उसे नपूता (जिसके बेटा न हो) समझने भी लगे हैं और कहने भी लगे हैं। उससे ज़्यादा ज़्यादती रामली को सहन करनी पड़ती थी।

उसे घर बाहर दोनों जगह ताने मिलने लगे और गाँव के भाई बन्धु या जाति में विशेष प्रयोजनों में उससे कोई काम नहीं करवाया जाता था। उस गाँव के व्यवहार ने मल्लू को शराबी बना दिया। लोग उसे कहते खाओ पियो मौज करो तुझे कौन सा पोतों के लिए धन करना है? मल्लू की भी यही सोच हो गई वो शराब पीकर रामली को तीन तीन बेटी जनने के आरोप लगाता और हाथ भी उठा देता।

गरीबी में आदमी दो ही अवस्थाओं को प्राप्त करता है, बचपन और उसके बाद सीधा बुढ़ापा, पैसे वालों की तरह उन्हें कभी जवानी नहीं आती। गरीबी और दुख में दोनों समय से पहले बुढ़ा रहे थे। पहली बेटी की दस साल की उम्र में शादी कर दी। क़र्ज़ कर लिया था । कम कमाई चार पेट और शराब की आदत से मल्लू की माली हालत बद से बदतर होती चली जा रही थी। कई बार वो रामली को पीट भी लेता था।

रामली कभी उसे प्रत्युत्तर नहीं देती बस अंदर ही अंदर कुढ़ती और रोती रहती। कुछ समय बाद बाकी की दोनों बेटियाँ जवान होने लगीं। एक दिन मल्लू ने रामली को पीटना शुरू किया तो दोनों बेटियों ने शराबी बाप को धक्का मारा, उससे मल्लू और चिढ़ गया। पर उसके बाद रामली पर हाथ न उठाया। वो बुरा नहीं था पर समझदार भी नहीं था। गाँव वाले उसका अपमान करते थे वो भी ज़हर का घूँट पी लेता था।

एक बार घर में सब्ज़ी बनाने को कुछ नहीं था तो रामली ने आटे को गूंथकर और उसे बेसन गट्टे की तरह उबाल कर सब्ज़ी बना दी, जो मल्लू को बिल्कुल अच्छी नहीं लगी और उसने थाली फेंक दी और भूखे पेट ही सो गया। परन्तु रामली को नींद नहीं आई। उसने उठते ही जो पहला काम किया वो था तुरई का एक बीज अपनी खेजड़ी की जड़ों के पास बो दिया।

बेटियाँ और रामली रोज़ तुरई की बेल को धीरे धीरे बड़ा होते देखतीं और खेजड़ी पर चढ़ते देखतीं। वक़्त आया कि बेल खेजड़ी के पेड़ से होते हुये उसकी झोंपड़ी के ऊपर फैल गई और उसमें बहुत सारी तुरई लगने लगी। उसके बाद मल्लू की किस्मत थोड़ी बदली और गाँव में से सड़क निकलने का काम शुरू हुआ। वहाँ रामली और मल्लू को रोज़ दिहाड़ी मिलती थी। मजदूरी मिलने से कुछ पैसा जमा करके उसने अपनी दोनों बेटियों के हाथ पीले कर दिए। अब घर में मल्लू, रामली और सन्नाटे के अलावा कुछ शेष नहीं था। पर रामली हर बार तुरई के बीज बो देती और फिर तुरई लहलहा के झोपड़ी पर चढ़ जाती।

बड़ी बेटी को बेटा हुआ तो उसने वो अपने माता पिता को गोद देना चाहा पर उसके ससुराल वालों ने उसकी एक नहीं सुनी। इससे मल्लू को बहुत ठेस पहुँची। रामली अब अकेलेपन की वजह से बीमार रहने लगी थी। पर अभी भी मल्लू की पूरी सेवा करती थी। वो कभी मल्लू को बुरा भला नहीं कहती थी। सड़क पर काम करते हुए वो किसी से दोस्ती कर बैठा था जो कि बड़ा ही चालाक आदमी था। वो मल्लू के पैसे की ही शराब पीता और उसी की मज़ाक उड़ाता । एक दिन उसने नशे में कहा भाई मल्लू तेरी बीवी ही तो माँ नहीं बन सकती, तू तो बाप बन सकता है । दूसरी ले आ, कर ले बेटा पैदा, बुढ़ापे का सहारा हो जाएगा।

शराबी मल्लू को कुछ समझ न आया और उसके चक्कर में वो पैसे देकर एक औरत घर के आया। दूसरी औरत के आने से रामली टूट गई और खटिया पकड़ ली। एक दिन जब मल्लू काम पर गया था वो पैसे देकर लाई औरत मल्लू के घर से , और कुछ तो क्या मिलना था , उसकी बीवी के पाँव के चाँदी के कड़े और घर के बर्तन उठा कर भाग गई। मल्लू के समझ में आ गया था कि उसे ठग लिया गया।

उसने रामली से बहुत माफ़ी माँगी , पर शायद रामली उसे माफ़ न कर पाई और अपने दर्द के साथ दुनिया को अलविदा कह गई। अब मल्लू इस भरी दुनिया में अकेला रह गया था। वो कभी काम पर जाता कभी पीकर पड़ा रहता। वो रामली की लगाई उस तुरई की बेल को निहारता रहता कभी भी उसे सूखने नहीं देता था। पर उसने कभी भी उस तुरई की बेल से कोई तुरई नहीं तोड़ी उसे वो बेल रामली सी लगती और उस पर लगने वाली तुरई में अपनी बेटियाँ दिखती।

बेल पर तुरई लगतीं और सूख जातीं । गाँव में लोगों के पास ज़्यादा काम धाम न होता था , तो वो मंडलियों में ताश खेलते थे । कुछ ताश खेलते कुछ उन्हें देखने वाले उनके आज बाजू बैठे रहते। गाँव के उन्हें चिलमिया कहते थे, वे खेलने वालों की चिलम भरते रहते और खुद भी पीते रहते थे। ये वो दौर था जब गाँव में बिजली पानी की आमद होने लगी थी । वो जो चिलमिये होते थे वो हारने वाले की मज़ाक़ उड़ाते थे और इधर उधर की पत्तियाँ देखकर बता देते थे।

एक दिन मेरे दादाजी ताश में हार गये और एक चिलमिये ने उनकी मजाक उड़ा दी, तो दादाजी ने उसे कह दिया, “तू हमारे खेल में ऐसे क्यों सूखता है जैसे मल्लू के घर पर तुरई।” बस उस दिन से हमारे गाँव में हर बेकाम और अभाव वाले के लिए वो कहावत प्रसिद्ध हो गई “ऐसे सूखना जैसे मल्लू के घर पर तुरई सूखती है।”

मल्लू ने कभी तुरई नहीं तोड़ी और न तोड़ने देता था । लाठी लेकर सबके पीछे दौड़ता। पर मल्लू मन से बुरा नहीं था । गाँवों में श्राद्ध में अपने पूर्वजों को खाना खिलाने के लिए आज भी तुरई की बेल के पत्तों पर श्रद्धा से श्राद्ध का भोजन कौव्वों को परोसा जाता है। और लगभग गाँव के हर वर्ग के लोग उसके यहाँ श्राद्ध के लिए तुरई के पत्ते लेने आते थे ।

ख़ुद मल्लू उसके पत्ते धोकर और तोड़कर रखता था ।उसे महसूस होता कि ऐसा करके वो रामली को सच्ची श्रद्धांजलि दे रहा हो। उसे लगता सब गाँव वाले रामली का श्राद्ध कर रहे। अब उसे बेटियाँ भाने लगी थीं । कभी कभार उसकी बेटियाँ आतीं, उसके लिए नए कपड़े लाती और मिठाई और पकवान खिला कर जातीं। सबसे छोटी उसे शराब के पैसे भी देकर जाती थी।

गाँव में उस वक़्त विम बार जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी। राख और मिट्टी से ही बर्तन मांजे जाते थे, और उन्हें मांजने के लिए गाँवों में कोई जोना नहीं होता था। सूखी तुरई की जालीदार परत जोने का काम करती थीं। गाँव की बहू बेटियाँ उससे बर्तन मांजने के लिये सूखी तुरई का फल माँग लाती थीं। मल्लू सूखी तुरई इक्कठी करके एक झोले में भरकर रखता था और सबको दे देता था। पर कभी किसी लड़के और पुरुष के मांगने पर उसे भला बुरा कहता।

एक दिल मल्लू मर गया , कुछ दिनों बाद वो तुरई की बेल सूखने लगी और सब तुरई सूख गई, एक तेज अंधड़ उस सूखी बेल को उड़ा ले गया। पर आज भी मेरे गाँव में एक कहावत प्रचलित है, “ऐसे सूखना, जैसे मल्लू के घर पर तुरई सूखती है।”

इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस…

इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस ॥
लखु लखु गेड़ा आखीअहि एकु नामु जगदीस ॥

 

अगर एक जीभ से लाख हों जाएँ, और लाख से बीस लाख,
फिर भी लाखों-लाख बार दोहराने के बावजूद केवल एक ही नाम, जगदीश्वर (ईश्वर), का गुणगान किया जा सकता है।

गहरा विश्लेषण:

1. असीम गुणगान की अपारता:

“इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस” में यह बताया गया है कि भले ही एक इंसान की जीभ से लाखों जीभें बन जाएँ, और उन लाखों से फिर करोड़ों हो जाएँ, फिर भी वे ईश्वर के गुणगान के लिए पर्याप्त नहीं होंगी। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर की महिमा और उसकी अपारता इतनी विशाल है कि उसे वर्णन करने के लिए अनगिनत जीभें भी कम पड़ेंगी।

2. ईश्वर का नाम और उसकी महानता:

“लखु लखु गेड़ा आखीअहि एकु नामु जगदीस” का मतलब है कि चाहे कितनी भी बार ईश्वर के नाम का उच्चारण किया जाए, केवल एक ही नाम है, जो सर्वशक्तिमान जगदीश्वर का है। लाखों बार भी ईश्वर के नाम का जाप या उसका स्मरण किया जाए, फिर भी उसकी महिमा का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। यह दर्शाता है कि ईश्वर का नाम ही सबसे महान है, और उसकी प्रशंसा अनंत है।

3. नाम की महिमा:

इस पंक्ति में नाम की विशेष महत्ता पर ज़ोर दिया गया है। सिख धर्म में “नाम सिमरन” (ईश्वर के नाम का स्मरण) को सबसे बड़ा आध्यात्मिक अभ्यास माना गया है। यह पंक्ति बताती है कि ईश्वर के नाम का उच्चारण ही उसके साथ संबंध स्थापित करने का सबसे सशक्त माध्यम है। लाखों बार भी उसके नाम का जाप करना कम होगा, क्योंकि उसका नाम अनंत गुणों का प्रतीक है।

सारांश:

“इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस ॥
लखु लखु गेड़ा आखीअहि एकु नामु जगदीस ॥”
का संदेश यह है कि भले ही किसी के पास लाखों-लाख जीभें हों और वह अनगिनत बार ईश्वर का नाम ले, फिर भी उसकी महिमा का पूरा वर्णन संभव नहीं है। ईश्वर का नाम और उसकी महिमा अनंत हैं, और केवल एक नाम, “जगदीस” (जगत का स्वामी), ही सबसे महान और शाश्वत है।

दुःख की मात्रा

साढे त्रै मण देहुरी चलै पाणी अंनि ॥ आइओ बंदा दुनी विचि वति आसूणी बंन्हि ॥
मलकल मउत जां आवसी सभ दरवाजे भंनि ॥ तिन्हा पिआरिआ भाईआं अगै दिता बंन्हि ॥
वेखहु बंदा चलिआ चहु जणिआ दै कंन्हि ॥ फरीदा अमल जि कीते दुनी विचि दरगह आए कमि ॥

 

एक बार एक नवयुवक किसी संत के पास पहुंचा और बोला “ महात्मा जी, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ, कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं..

संत बोले, “पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो”.. युवक ने ऐसा ही किया.

इसका स्वाद कैसा लगा ?”, संत ने पुछा।

बहुत ही खराब … एकदम खारा .” युवक थूकते हुए बोला

संत मुस्कुराते हुए बोले , “एक बार फिर अपने हाथnमें एक मुट्ठी नमक ले लो और मेरे पीछे – पीछे आओ .

“दोनों धीरे -धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए .“

चलो, अब इस नमक को पानी में दाल दो… संत ने निर्देश दिया। युवक ने ऐसा ही किया .

अब इस झील का पानी पियो .” संत बोले, युवक पानी पीने लगा …, एक बार फिर संत ने पूछा ,:

बताओ इसका स्वाद कैसा है , क्या अभी भी तुम्हे ये खारा लग रहा है ?”

“नहीं, ये तो मीठा है , बहुत अच्छा है ”, युवक बोला

संत युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले , “जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं ;न इससे कम ना ज्यादा

जीवन में दुःख की मात्रा वही रहती है, बिलकुल वही . लेकिन हम कितने

दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं .

इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो, गिलास मत बने रहो.. झील बन जाओ

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