Author name: EkAdmin

चरित्रहीन

पावक जरिओ न जात रहिओ जन धूरि लगि ॥
नीरु न साकसि बोरि चलहि हरि पंथि पगि ॥
नानक रोग दोख अघ मोह छिदे हरि नाम खगि ॥

 

एक बार महात्मा बुद्ध किसी गांव में गए। वहां एक स्त्री ने उनसे पूछा कि आप तो किसी राजकुमार की तरह दिखते हैं, आपने युवावस्था में गेरुआ वस्त्र क्यों धारण किया है?

बुद्ध ने उत्तर दिया कि मैंने तीन प्रश्नों के हल ढूंढने के लिए संन्यास लिया है।

बुद्ध ने कहा- हमारा शरीर युवा और आकर्षक है, लेकिन यह वृद्ध होगा, फिर बीमार होगा और अंत में यह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।

मुझे वृद्धावस्था, बीमारी और मृत्यु के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है।

बुद्ध की बात सुनकर स्त्री बहुत प्रभावित हो गई और उसने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया।

जैसे ही ये बात गांव के लोगों को मालूम हुई तो सभी ने बुद्ध से कहा कि वे उस स्त्री के यहां न जाए, क्योंकि वह स्त्री चरित्रहीन है।

बुद्ध ने गांव के सरपंच से पूछा कि क्या ये बात सही है? सरपंच ने भी गांव के लोगों की बात में सहमती जताई। तब बुद्ध ने सरपंच का एक हाथ पकड़ कर कहा कि अब ताली बजाकर दिखाओ।

इस पर सरपंच ने कहा कि यह असंभव है, एक हाथ से ताली नहीं बज सकती।

बुद्ध ने कहा कि ठीक इसी प्रकार कोई स्त्री अकेले ही चरित्रहीन नहीं हो सकती है। यदि इस गांव के पुरुष चरित्रहीन नहीं होते तो वह स्त्री भी चरित्रहीन नहीं होती। गांव के सभी पुरुष बुद्ध की ये बात सुनकर शर्मिदा हो गए।

जोरु न सुरती गिआनि वीचारि ॥ जोरु न जुगती छुटै संसारु…

जोरु न सुरती गिआनि वीचारि ॥ जोरु न जुगती छुटै संसारु ॥
जिसु हथि जोरु करि वेखै सोइ ॥ नानक उतमु नीचु न कोइ ॥

 

स्मरण शक्ति (ध्यान), ज्ञान और विचार पर कोई बल नहीं है।
संसार से मुक्ति पाने की विधि (जुगति) पर भी कोई बल नहीं है।
जिसके हाथ में बल है, वही सब कुछ देखता और करता है।
नानक कहते हैं, उसकी दृष्टि में कोई उच्च या नीच नहीं है।

गहरा विश्लेषण:

  1. ध्यान और ज्ञान पर कोई बल नहीं: “जोरु न सुरती गिआनि वीचारि” का अर्थ है कि हमारी स्मरण शक्ति (सुरति), ज्ञान (गिआन), और विचार करने की शक्ति (वीचार) हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। ये सब ईश्वर की कृपा पर निर्भर हैं। हम केवल अपने बल से ध्यान, ज्ञान, और विचार प्राप्त नहीं कर सकते, यह तभी संभव है जब ईश्वर हमें यह अनुग्रह प्रदान करता है।
  2. संसार से मुक्ति पर कोई नियंत्रण नहीं: “जोरु न जुगती छुटै संसारु” का मतलब है कि संसार से मुक्ति पाने की विधि (जुगति) भी हमारे नियंत्रण में नहीं है। मनुष्य अपने बल या प्रयास से संसार के बंधनों से छुटकारा नहीं पा सकता। यह केवल ईश्वर की कृपा से ही संभव है।
  3. सभी शक्तियाँ ईश्वर के हाथ में हैं: “जिसु हथि जोरु करि वेखै सोइ” में यह बताया गया है कि सब कुछ ईश्वर के हाथ में है। वही सारी शक्तियों का स्वामी है और वही देखता और नियंत्रित करता है कि क्या होना चाहिए। मनुष्य के पास कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है, सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर चलता है।
  4. समानता का सिद्धांत: “नानक उतमु नीचु न कोइ” का अर्थ है कि ईश्वर की दृष्टि में कोई भी उच्च या नीच नहीं है। वह सभी को एक समान देखता है, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, या सामाजिक स्तर का हो। ईश्वर की दृष्टि में सब बराबर हैं।

संदेश:

इस शबद का मूल संदेश यह है कि मनुष्य के पास किसी भी प्रकार का वास्तविक बल या नियंत्रण नहीं है। ध्यान, ज्ञान, विचार, और संसार से मुक्ति सभी ईश्वर की कृपा पर आधारित हैं। ईश्वर ही सारे कार्यों का संचालक है, और उसके बिना कुछ भी संभव नहीं है। साथ ही, ईश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं—कोई भी उच्च या नीच नहीं है।

सारांश:

“जोरु न सुरती गिआनि वीचारि” से लेकर “नानक उतमु नीचु न कोइ” तक का पूरा संदेश यह है कि संसार में हर चीज़—चाहे वह ध्यान, ज्ञान, मुक्ति, या विचार हो—सब कुछ ईश्वर की कृपा से होता है। हम केवल अपने प्रयासों से इन चीज़ों को प्राप्त नहीं कर सकते। ईश्वर की दृष्टि में कोई भी व्यक्ति उच्च या नीच नहीं है, वह सबको समान रूप से देखता है।

बहरा सत्संग

रथ न अस्व न गज सिंघासन छिन महि तिआगत नांग सिधारहु ॥
सूर न बीर न मीर न खानम संगि न कोऊ द्रिसटि निहारहु ॥

 

एक संत के पास बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था, उसके कान तो थे पर वे नाडिय़ों से जुड़े नहीं थे, एकदम बहरा, एक शब्द भी नहीं सुन सकता था।

किसी ने संत से कहा:- ‘‘बाबा जी, वह जो वृद्ध बैठे हैं वह कथा सुनते-सुनते हंसते तो हैं पर हैं बहरे।’’

बाबा जी सोचने लगे:- ‘‘बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा और कथा नहीं सुनता होगा तो रस नहीं आता होगा।

रस नहीं आता होगा तो यहां बैठना भी नहीं चाहिए, उठ कर चले जाना चाहिए, यह जाता भी नहीं है।’

बाबा जी ने इशारे से उस वृद्ध को अपने पास बुला लिया।

सेवक से कागज-कलम मंगाया और लिख कर पूछा:- ‘‘तुम सत्संग में क्यों आते हो?’’

उस वृद्ध ने लिख कर जवाब दिया:- ‘‘बाबा जी, सुन तो नहीं सकता हूं लेकिन यह तो समझता हूं कि ईश्वर प्राप्त महापुरुष जब बोलते हैं तो पहले परमात्मा में डुबकी मारते हैं।

संसारी आदमी बोलता है तो उसकी वाणी मन व बुद्धि को छूकर आती है लेकिन ब्रह्मज्ञानी संत जब बोलते हैं तो उनकी वाणी आत्मा को छूकर आती है।

मैं आपकी अमृतवाणी तो नहीं सुन पाता हूं पर उसके आंदोलन मेरे शरीर को स्पर्श करते हैं।

दूसरी बात आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जो पुण्यात्मा लोग आते हैं उनके बीच बैठने का पुण्य भी मुझे प्राप्त होता है ।’’

बाबा जी ने देखा कि यह तो ऊंची समझ के धनी हैं, उन्होंने कहा:- ‘‘मैं यह जानना चाहता हूं कि आप रोज सत्संग में समय पर पहुंच जाते हैं और आगे बैठते हैं, ऐसा क्यों?’’

उस वृद्ध ने लिखकर जबाब दिया:- ‘‘मैं परिवार में सबसे बड़ा हूं, बड़े जैसा करते हैं वैसा ही छोटे भी करते हैं।

मैं सत्संग में आने लगा तो मेरा बड़ा लड़का भी इधर आने लगा।

शुरूआत में कभी-कभी मैं बहाना बनाकर उसे ले आता था।

मैं उसे ले आया तो वह अपनी पत्नी को यहां ले आया, पत्नी बच्चों को ले आई, अब सारा कुटुम्ब सत्संग में आने लगा, कुटुम्ब को संस्कार मिल गए।’’

ब्रह्मचर्चा, आत्मज्ञान का सत्संग ऐसा है कि यह समझ में नहीं आए तो क्या, सुनाई नहीं देता हो तो भी इसमें शामिल होने मात्र से इतना पुण्य होता है कि व्यक्ति के जन्मों-जन्मों के पाप-ताप मिटने लगते हैं, पूरे परिवार का कल्याण होने लगता है।

फिर जो व्यक्ति श्रद्धा एवं एकाग्रतापूर्वक सुनकर इसका मनन करे उसके परम कल्याण में संशय ही क्या….

आखणि जोरु चुपै नह जोरु ॥ जोरु न मंगणि देणि न जोरु…

आखणि जोरु चुपै नह जोरु ॥ जोरु न मंगणि देणि न जोरु ॥
जोरु न जीवणि मरणि नह जोरु ॥ जोरु न राजि मालि मनि सोरु ॥

 

बोलने का कोई बल नहीं है, चुप रहने का भी कोई बल नहीं है।
मांगने और देने में भी कोई बल नहीं है।
जीवन में और मृत्यु में भी कोई बल नहीं है।
राजाओं के राज्य, संपत्ति और मन की शांति पर भी कोई बल नहीं है।

गहरा विश्लेषण:

  1. इंसान की सीमाएँ: “आखणि जोरु चुपै नह जोरु” का मतलब है कि हमारे पास न तो बोलने की शक्ति है, और न ही चुप रहने की। यह पंक्ति बताती है कि इंसान अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने के लिए पूर्णतः सक्षम नहीं है। यह ईश्वर की कृपा या आदेश पर निर्भर करता है कि हम कब क्या कर सकते हैं।
  2. भिक्षा और दान में बल नहीं: “जोरु न मंगणि देणि न जोरु” में बताया गया है कि न तो हमारे पास यह शक्ति है कि हम किसी से कुछ मांग सकें और न ही यह कि हम किसी को कुछ दे सकें। सब कुछ ईश्वर की मर्जी से होता है। यह पंक्ति यह भी समझाती है कि जो कुछ हम देते या प्राप्त करते हैं, वह ईश्वर की कृपा का परिणाम है।
  3. जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण नहीं: “जोरु न जीवणि मरणि नह जोरु” का अर्थ है कि जीवन और मृत्यु भी हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। किसी के पास यह शक्ति नहीं है कि वह कब जन्म लेगा या कब मरेगा। यह केवल ईश्वर के हाथ में है।
  4. राज्य, संपत्ति और मानसिक शांति: “जोरु न राजि मालि मनि सोरु” में बताया गया है कि न तो राजाओं के राज्य पर, न ही संपत्ति या धन पर, और न ही मन की शांति पर हमारा बल या नियंत्रण है। राज्य, धन, और मन की शांति सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर निर्भर हैं।

यह पंक्तियाँ यह बताती हैं कि इंसान के पास कुछ भी करने का वास्तविक बल या अधिकार नहीं है। चाहे वह बोलना हो, चुप रहना हो, मांगना हो, देना हो, जीवन हो, मृत्यु हो, राज्य, संपत्ति या मानसिक शांति—सब कुछ ईश्वर की कृपा पर आधारित है। हमारी सारी शक्तियाँ और क्षमताएँ ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करती हैं, और हम बिना उसकी कृपा के कुछ भी नहीं कर सकते।

“आखणि जोरु चुपै नह जोरु” से लेकर “जोरु न राजि मालि मनि सोरु” तक का पूरा संदेश यह है कि मनुष्य की सारी शक्तियाँ सीमित हैं और सब कुछ ईश्वर की मर्जी के अनुसार होता है। चाहे वह हमारी बोलने, चुप रहने, मांगने, देने, जीवन, मृत्यु, या संपत्ति की स्थिति हो, किसी पर भी हमारा पूर्ण नियंत्रण नहीं है। ईश्वर की कृपा ही हमें सब कुछ देती है।

कर्म-योग

कीरति करन सरन मनमोहन जोहन पाप बिदारन कउ ॥
हरि तारन तरन समरथ सभै बिधि कुलह समूह उधारन सउ ॥

 

एक बार एक सात वर्ष का बालक रमन महर्षि के पास आया! उन्हे प्रणाम कर उसने अपनी जिज्ञासा उनके समक्ष रखी! वह बोला- क्या आप मुझे बता सकते है कि कर्म-योग क्या है? क्योंकि जब कभी भी मै यह प्रश्न अपने माता-पिता से पूछता हूँ, तो वे कहते है कि अभी तुम्हे इस विषय मे सोचने की आवश्यकता नही है! जब तुम बडे हो जाओगे, तो तुम्हे अपना आप समझ आ जाएगी!

बालक की बात सुनकर ऋषि बोले- मै तुम्हे इस प्रश्न का उतर दूँगा! पर अभी तुम यहाँ मेरे पास शांतिपूर्वक बैठ जाओ!’ बालक उनकी आज्ञा का पालन कर उनके पास जाकर बैठ गया!

कुछ समय बाद, वहाँ एक व्यक्ति डोसे लेकर आया! उसने सभी डोसे रमन महर्षि के समक्ष रख दिए! किंतु महर्षि किसी भी वस्तु को अकेले ग्रहण नही करते थे! इसलिए महात्मा रमन ने डोसे का एक छोटा सा टुकडा अपने आगे रखा! फिर साथ बैठे उस बालक के पतल मे एक पूरा डोसा परोस दिया! उसके बाद वहाँ उपस्थित अन्य अनुयायियो मे शेष डोसे बाँटने का आदेश दिया! फिर उन्होने पास बैठे बालक से कहा- अब जब तक मै अँगुली उठाकर इशारा नही करता, तब तक तुम यह डोसा खाते रहोगे! हाँ..ध्यान रहे कि, मेरे इस संकेत से पहले तुम्हारा डोसा खत्म नही होना चाहिए! पर जैसे ही मै अँगुली उठाकर संकेत दूँ, तो पतल पर डोसे का एक भाग भी शेष नही रहना चाहिए! उसी क्षण डोसा खत्म हो जाना चाहिए!’

महर्षि के इन वचनो को सुनते ही बालक ने पूरी एकाग्रता से रमन मह-ऋषि पर दृष्टि टिका दी! उसका मुख बेशक ही डोसे के निवाले चबा रहा था, किंतु उसकी नजरे एकटक महात्मा रमन पर केन्द्रित थी! बालक ने शुरूआत मे बडे-बडे निवाले खाए! पर बाद मे, अधिक डोसा न बचने पर, उसने छोटे-छोटे निवाले खाने शुरू कर दिए! तभी अचानक उसे अपेक्षित संकेत मिला! इशारा मिलते ही बालक ने बचा हुआ डोसा एक ही निवाले मे मुख मे डाल दिया और निर्देशानुसार पत्तल पर कुछ शेष न रहा!

बच्चे की इस प्रतिक्रिया को देखकर महर्षि बोले- अभी-अभी जो तुमने किया, वही वास्तविक मे कर्म-योग है!

महर्षि ने आगे समझाते हुए कहा- देखो! जब तुम डोसा खा रहे थे, तब तुम्हारा ध्यान केवल मुझ पर था! डोसे के निवाले मुख मे डालते हुए भी तुम हर क्षण मुझे ही देख रहे थे! ठीक इसी प्रकार संसार के सभी कार्य-व्यवहार करते हुए भी अपने मन-मस्तिष्क को ईश्वर पर केन्द्रित रखना! मतलब कि ईश्वर मे स्थित होकर अपने सभी कर्तव्यो को पूर्ण करना! यही वास्तविक कर्म-योग है ।

नानक नदरी पाईऐ कूड़ी कूड़ै ठीस ॥

नानक नदरी पाईऐ कूड़ी कूड़ै ठीस ॥

 

नानक कहते हैं, ईश्वर की कृपा से (नज़र से) ही सब कुछ प्राप्त होता है। परंतु झूठ (माया) में फंसे रहने से केवल असत्य (धोखा) ही प्राप्त होता है।

गहरा विश्लेषण:

  1. ईश्वर की कृपा: “नानक नदरी पाईऐ” का अर्थ है कि सब कुछ ईश्वर की नज़र (कृपा) पर निर्भर है। सिख धर्म में “नदर” (कृपा) को बहुत महत्व दिया जाता है। ईश्वर की कृपा और नज़र ही वह माध्यम है जिससे इंसान को सच्ची प्राप्ति होती है, चाहे वह आध्यात्मिक ज्ञान हो या मोक्ष। बिना ईश्वर की कृपा के जीवन में सच्चाई, शांति, और मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती।
  2. माया का प्रभाव: “कूड़ी कूड़ै ठीस” का मतलब है कि जो लोग झूठ और माया (सांसारिक भोग, लालच और झूठी इच्छाओं) में फंसे रहते हैं, उन्हें केवल धोखा ही मिलता है। “कूड़ी” का अर्थ है झूठ, और यह संसार की अस्थायी चीज़ों की ओर संकेत करता है। यह पंक्ति बताती है कि जो लोग माया के प्रभाव में जीते हैं, उन्हें अंततः असत्य और निराशा ही हाथ लगती है।
  3. सत्य और असत्य का फर्क: यह पंक्ति हमें सिखाती है कि ईश्वर की कृपा से ही सच्चाई का अनुभव किया जा सकता है। जो लोग सच्चाई (ईश्वर) की ओर ध्यान नहीं देते और केवल सांसारिक माया में लिप्त रहते हैं, वे अपने जीवन में केवल झूठे परिणाम ही पाते हैं।

सारांश:

“नानक नदरी पाईऐ कूड़ी कूड़ै ठीस” का संदेश यह है कि ईश्वर की कृपा से ही इंसान को सच्चाई, ज्ञान और मोक्ष प्राप्त होता है। लेकिन जो लोग माया (सांसारिक धोखे) में फंसे रहते हैं, उन्हें केवल असत्य और धोखा मिलता है।

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