जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु ॥ अहरणि मति वेदु हथीआरु ॥

जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु ॥ अहरणि मति वेदु हथीआरु ॥

 

जप (स्मरण) को पहरेदार बनाओ, धैर्य को सुनार,
बुद्धि को धौंकनी और ज्ञान (वेद) को औजार।

गहरा विश्लेषण:

  1. जप को पहरेदार बनाना: “जतु पाहारा” का मतलब है कि जप या स्मरण को अपने जीवन का पहरेदार बना लेना चाहिए। एक पहरेदार का काम होता है कि वह अपने कर्तव्यों को निभाते हुए सतर्क रहे और गलत चीजों से बचाए। इसी प्रकार, अपने मन में परमात्मा का जप करते रहना जीवन के मार्ग में आने वाले संकटों से बचने में सहायक होता है। यह हमारे जीवन को सही दिशा में चलाने में मदद करता है और हमारी आत्मा को बुराइयों से बचाता है।
  2. धैर्य को सुनार बनाना: “धीरजु सुनिआरु” का अर्थ है कि हमें अपने धैर्य को सुनार की तरह बनाना चाहिए। जैसे एक सुनार बड़े धैर्य और सावधानी से आभूषण बनाता है, उसी प्रकार हमें धैर्य से जीवन की हर परिस्थिति का सामना करना चाहिए। कठिन समय में धैर्य और सहनशीलता ही हमें सच्ची समझ और स्थिरता प्रदान करती है।
  3. बुद्धि को धौंकनी और ज्ञान को औजार बनाना: “अहरणि मति वेदु हथीआरु” का मतलब है कि अपनी बुद्धि को एक धौंकनी (ब्लोअर) की तरह रखें और वेदों के ज्ञान को औजार की तरह इस्तेमाल करें। धौंकनी से जैसे आग को तेज किया जाता है, वैसे ही ज्ञान और बुद्धि से हमारी आत्मिक अग्नि प्रज्वलित होती है। वेद या ज्ञान का अर्थ है सही ज्ञान और समझ, जो हमारे हर कार्य में मार्गदर्शन का काम करती है।

संदेश:

यह पंक्ति हमें यह सिखाती है कि यदि हम अपने जीवन में जप, धैर्य, बुद्धि और ज्ञान को आधार बनाएं, तो हम आत्मिक उन्नति के मार्ग पर चल सकते हैं। यह जीवन को सजीवता, स्थिरता, और समझ से भर देता है। सही दिशा और संयम से, हर कार्य एक साधना बन सकता है और हमें परमात्मा की ओर ले जा सकता है।

सारांश:

“जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु” से लेकर “अहरणि मति वेदु हथीआरु” तक का संदेश है कि अपने जीवन को ऐसा रूप दें, जहाँ जप (स्मरण), धैर्य, बुद्धि, और ज्ञान हमारे जीवन के आधार बनें। यह हमें सतर्कता, स्थिरता, समझ, और आत्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।

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