करम खंड की बाणी जोरु ॥ तिथै होरु न कोई होरु ॥
तिथै जोध महाबल सूर ॥ तिन महि रामु रहिआ भरपूर ॥
कर्म खंड की बाणी (वाणी) में ताकत है।
वहाँ और कोई नहीं है जो भिन्न या अलग हो।
वहाँ योद्धा, महाबली और महान वीर रहते हैं,
और उनमें राम (परमात्मा) पूरी तरह से व्याप्त हैं।
गहरा विश्लेषण:
- कर्म खंड का अर्थ: “कर्म खंड” गुरबाणी में आत्मिक यात्रा के एक महत्वपूर्ण चरण का प्रतीक है। यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपने कर्मों (कार्यों) की महानता और शक्ति को समझता है और आत्मिक युद्ध की स्थिति में आता है। यहाँ, कर्म का अर्थ है सही कर्म और आत्मिक संघर्ष, जिसके द्वारा आत्मा शुद्ध होती है और परमात्मा के निकट पहुँचती है।
- शक्ति और एकता: “तिथै होरु न कोई होरु” का अर्थ है कि कर्म खंड में किसी प्रकार का विभाजन या भिन्नता नहीं है। यहाँ सभी एकता में हैं और केवल वही लोग होते हैं जो इस आध्यात्मिक संघर्ष में लगे हुए हैं। इस अवस्था में केवल शक्ति, संकल्प, और सत्य का ही स्थान है।
- वीरता और महाबल: “तिथै जोध महाबल सूर” का अर्थ है कि इस खंड में केवल वीर, शक्तिशाली और महान योद्धा रहते हैं। ये आत्मिक योद्धा होते हैं जिन्होंने अपने अंदर के विकारों से लड़ाई लड़ी है और उन पर विजय प्राप्त की है। ये योद्धा अपने अंदर की कमजोरियों को परास्त कर चुके होते हैं और परमात्मा के साथ एक हो चुके होते हैं।
- परमात्मा की पूर्णता: “तिन महि रामु रहिआ भरपूर” का मतलब है कि इन वीरों के अंदर परमात्मा (राम) पूरी तरह से व्याप्त हैं। ये आत्मिक योद्धा पूरी तरह से ईश्वर में समर्पित होते हैं और उनके अंदर परमात्मा का वास होता है। कर्म खंड में व्यक्ति का जीवन ईश्वर के प्रति समर्पित होता है, और उसकी सभी गतिविधियाँ उसी परमात्मा की शक्ति और कृपा से संचालित होती हैं।
संदेश:
यह शबद हमें सिखाता है कि कर्म खंड में आत्मा का संघर्ष केवल बाहरी या शारीरिक नहीं है, बल्कि यह आत्मिक और आंतरिक संघर्ष है। इस अवस्था में, व्यक्ति अपनी आत्मा को शुद्ध करता है और ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है। यहाँ केवल वीरता, शक्ति, और सत्य का ही स्थान है, और परमात्मा इन आत्मिक योद्धाओं के भीतर पूर्ण रूप से व्याप्त होते हैं।
सारांश:
“करम खंड की बाणी जोरु” से लेकर “तिन महि रामु रहिआ भरपूर” तक का संदेश यह है कि कर्म खंड वह अवस्था है जहाँ आत्मा अपने कर्मों और संघर्ष के द्वारा शक्ति और वीरता प्राप्त करती है। इस खंड में केवल वे लोग होते हैं जो आत्मिक योद्धा हैं और जिन्होंने अपने अंदर के विकारों से लड़ाई लड़ी है। इनमें परमात्मा की शक्ति पूरी तरह से व्याप्त होती है, और वे परमात्मा में समर्पित हो जाते हैं।