करमी करमी होइ वीचारु ॥ सचा आपि सचा दरबारु

करमी करमी होइ वीचारु ॥ सचा आपि सचा दरबारु ॥
तिथै सोहनि पंच परवाणु ॥ नदरी करमि पवै नीसाणु ॥

 

कर्मों के आधार पर ही न्याय होता है।
सच्चा (ईश्वर) स्वयं सच्चे दरबार में उपस्थित रहता है।
वहाँ (सच्चे दरबार में) स्वीकार किए गए श्रेष्ठ व्यक्ति ही शोभा पाते हैं।
कृपा से ही ईश्वर की दृष्टि में पहचान मिलती है।

गहरा विश्लेषण:

  1. कर्मों के आधार पर न्याय: “करमी करमी होइ वीचारु” का अर्थ है कि हमारे कर्मों के आधार पर ही न्याय किया जाता है। इस जीवन में जो भी कर्म हम करते हैं, वही हमारे अगले जीवन या मोक्ष की दिशा तय करते हैं। यहाँ यह समझाया गया है कि ईश्वर के दरबार में केवल हमारे कर्मों के आधार पर ही विचार किया जाता है, कोई बाहरी आडंबर या दिखावा नहीं चलता।
  2. सच्चा ईश्वर और सच्चा दरबार: “सचा आपि सचा दरबारु” बताता है कि ईश्वर स्वयं सच्चा है और उसका दरबार भी सच्चा है। यह बताता है कि ईश्वर का न्याय कभी गलत नहीं हो सकता, वह न केवल सत्य का पालन करता है बल्कि उसका न्याय भी सत्य पर आधारित होता है।
  3. श्रेष्ठ व्यक्तियों की स्वीकृति: “तिथै सोहनि पंच परवाणु” का अर्थ है कि ईश्वर के दरबार में केवल वे ही लोग शोभा पाते हैं जो श्रेष्ठ कर्मों वाले (पंच) होते हैं और जिन्हें ईश्वर की स्वीकृति प्राप्त होती है। ये श्रेष्ठ व्यक्ति (पंच) वे हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को पवित्र किया है और सत्य मार्ग पर चले हैं।
  4. कृपा से प्राप्त पहचान: “नदरी करमि पवै नीसाणु” का मतलब है कि ईश्वर की कृपा से ही कोई व्यक्ति उसकी दृष्टि में स्थान और पहचान पाता है। केवल अपने कर्मों के बल पर व्यक्ति मोक्ष या पहचान प्राप्त नहीं कर सकता, इसमें ईश्वर की कृपा और उसकी नज़र में आना भी आवश्यक है।

संदेश:

यह शबद हमें यह सिखाता है कि इस संसार में केवल हमारे कर्म ही मायने रखते हैं। ईश्वर का दरबार सच्चा है, और वहाँ केवल उन्हीं को स्थान मिलता है जिन्होंने धर्म और सत्य का पालन किया है। ईश्वर की कृपा के बिना मोक्ष या उसकी निकटता प्राप्त करना संभव नहीं है, चाहे व्यक्ति कितने भी अच्छे कर्म क्यों न करे। ईश्वर की कृपा और न्याय में उच्च और निम्न का भेद नहीं होता, वहाँ केवल सत्य और कर्म की परीक्षा होती है।

सारांश:

“करमी करमी होइ वीचारु” से लेकर “नदरी करमि पवै नीसाणु” तक का संदेश यह है कि जीवन में केवल हमारे कर्म ही न्याय का आधार होते हैं। ईश्वर का दरबार सच्चा है, और वहाँ केवल श्रेष्ठ व्यक्ति (पंच) ही सम्मानित होते हैं। लेकिन, इन सबके साथ-साथ, ईश्वर की कृपा और उसकी नज़र में आना भी आवश्यक है, तभी कोई व्यक्ति मोक्ष या पहचान प्राप्त कर सकता है।

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