एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु…

एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु ॥
इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीबाणु ॥

 

एक माँ (माया या प्रकृति) है, जो विधि (सृष्टि की प्रक्रिया) द्वारा सृजित है और जिसने तीन शिष्य (तत्व या देवता) उत्पन्न किए हैं।
एक सृष्टि का संचालन करता है, दूसरा भंडार (धन-संपत्ति) का प्रबंध करता है, और तीसरा न्याय करता है।

गहरा विश्लेषण:

1. एक माँ (माया या प्रकृति):

“एका माई” का मतलब है एक माँ, जो सृष्टि का मूल कारण है। इस माँ को माया या प्रकृति कहा जा सकता है। यह माँ सृष्टि की आधारभूत शक्ति है, जिससे संसार का निर्माण होता है। यह सृष्टि की सारी प्रक्रियाओं को संचालित करने वाली शक्ति है।

2. विधि द्वारा सृजित:

“जुगति विआई” का अर्थ है कि यह माँ विधि (सृष्टि की प्रक्रिया) द्वारा उत्पन्न की गई है। सृष्टि का संचालन एक निश्चित नियम और प्रणाली के अनुसार होता है, जिसे सृष्टि का विधान कहा जा सकता है। इस पंक्ति में कहा गया है कि यह माँ (माया या प्रकृति) सृष्टि के नियमों और विधियों के अनुसार कार्य करती है।

3. तीन शिष्य (तत्व या देवता):

“तिनि चेले परवाणु” का मतलब है कि इस माँ ने तीन शिष्य (तत्व या देवता) उत्पन्न किए हैं, जिन्हें संसार में अलग-अलग कार्य सौंपे गए हैं। ये शिष्य प्रतीकात्मक रूप से ब्रह्मा, विष्णु, और शिव हैं, जो सृष्टि के निर्माण, पालन, और संहार के प्रतीक हैं।

4. संसार का संचालन:

“इकु संसारी” का अर्थ है कि पहला शिष्य (तत्व) सृष्टि का संचालन करता है। यह ब्रह्मा का प्रतीक है, जो सृष्टि का सृजनकर्ता है। संसार में जो कुछ भी निर्मित हो रहा है, उसका कार्य इस शिष्य का है।

5. भंडार का प्रबंध:

“इकु भंडारी” का मतलब है कि दूसरा शिष्य संसार के भंडार (धन, संपत्ति, संसाधनों) का प्रबंध करता है। यह विष्णु का प्रतीक है, जो सृष्टि का पालन और संरक्षण करता है। सृष्टि के सभी संसाधनों का संतुलन बनाए रखना उसका कार्य है।

6. न्याय का प्रबंध:

“इकु लाए दीबाणु” का अर्थ है कि तीसरा शिष्य न्याय करता है। यह शिव का प्रतीक है, जो सृष्टि के विनाश और न्याय का प्रतिनिधित्व करता है। यह तत्व संसार में संतुलन बनाए रखने के लिए न्याय करता है और पुराने का अंत करके नए की शुरुआत करता है।

सारांश:

“एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु ॥
इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीबाणु ॥”
का संदेश यह है कि सृष्टि एक माँ (माया या प्रकृति) के द्वारा संचालित होती है, जिसने तीन शिष्य (तत्व या देवता) उत्पन्न किए हैं। इनमें से एक सृष्टि का निर्माण करता है, दूसरा संसार के भंडारों का प्रबंध करता है, और तीसरा न्याय और विनाश का कार्य करता है। यह जीवन के निर्माण, संरक्षण और समाप्ति की प्रक्रियाओं का प्रतीकात्मक वर्णन है, जो सृष्टि के संतुलन और संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

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