भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि वाजहि नाद…

भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि वाजहि नाद ॥
आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद ॥
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग ॥

 

आध्यात्मिक ज्ञान और करुणा ही असली संपत्ति हैं, और हर हृदय में (ईश्वर की) दिव्य ध्वनि बज रही है।
वह स्वयं सभी का स्वामी है, जिसने सबको बांधा हुआ है।
रिद्धि-सिद्धि (चमत्कारिक शक्तियाँ) ईश्वर की भक्ति के आनंद के सामने तुच्छ हैं।
संसार में संयोग (मिलन) और वियोग (विछोह) के माध्यम से ही संसार का संचालन होता है, और हर किसी का भाग्य उनके कर्मों के अनुसार लिखा जाता है।

गहरा विश्लेषण:
1. ज्ञान और करुणा की महत्ता:
“भुगति गिआनु दइआ भंडारणि” का अर्थ है कि असली भोग (आध्यात्मिक पोषण) ज्ञान और करुणा से आता है। इस पंक्ति में बताया गया है कि सांसारिक भोग (भौतिक सुख) वास्तविक संपत्ति नहीं है, बल्कि सच्चा सुख और संपत्ति ज्ञान और दया में निहित है। ज्ञान हमें सच्चाई की ओर ले जाता है, और दया हमें ईश्वर के करीब लाती है। करुणा के बिना ज्ञान अधूरा है, और ज्ञान के बिना करुणा अधूरी है। ये दोनों मिलकर हमें आध्यात्मिक समृद्धि की ओर ले जाते हैं।

2. ईश्वर की सर्वव्यापकता:
“घटि घटि वाजहि नाद” का अर्थ है कि हर हृदय में ईश्वर की दिव्य ध्वनि गूंज रही है। यह पंक्ति यह बताती है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है और हर व्यक्ति के भीतर उसकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है। ईश्वर की उपस्थिति हर हृदय में एक दिव्य संगीत की तरह गूंजती रहती है, जिसे सुनने के लिए हमें अपने अंदर की आवाज़ पर ध्यान देना होता है।

3. ईश्वर ही स्वामी:
“आपि नाथु नाथी सभ जा की” का अर्थ है कि ईश्वर स्वयं सभी का स्वामी है, और उसने सबको अपने बंधन में बांधा हुआ है। इसका मतलब है कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वह ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही हो रहा है। सभी जीव ईश्वर की मर्जी से बंधे हुए हैं, और वह ही उनका स्वामी है। हमें यह समझना चाहिए कि सभी घटनाओं और परिस्थितियों का संचालन ईश्वर की मर्जी से होता है।

4. रिद्धि-सिद्धि और असली आनंद:
“रिधि सिधि अवरा साद” का अर्थ है कि रिद्धि-सिद्धि (अध्यात्मिक शक्तियां या चमत्कार) ईश्वर की भक्ति के आनंद के सामने तुच्छ हैं। गुरुजी यहां यह सिखाते हैं कि भले ही हमें सांसारिक चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त हो जाएं, लेकिन उनका आनंद और महत्व ईश्वर की भक्ति और उसकी उपासना के आनंद से कम है। असली सुख और संतोष ईश्वर की उपासना में है, न कि सांसारिक शक्तियों में।

5. संसार का संचालन:
“संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि” का अर्थ है कि संसार में संयोग (मिलन) और वियोग (विछोह) दोनों ही संसार के संचालन के दो मुख्य तरीके हैं। जीवन में लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं, और इन घटनाओं के माध्यम से ही संसार का चक्र चलता रहता है। यह संसार का नियम है कि हर किसी को मिलन और बिछोह दोनों का अनुभव करना पड़ता है।

6. भाग्य और कर्म:
“लेखे आवहि भाग” का अर्थ है कि हर किसी का भाग्य उसके कर्मों के अनुसार लिखा जाता है। गुरुजी यहां यह बता रहे हैं कि जीवन में जो कुछ भी होता है, वह हमारे पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर निर्धारित होता है। हमारे अच्छे या बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप हमें इस जन्म में सुख या दुख मिलता है। यह पंक्ति कर्म के सिद्धांत की ओर इशारा करती है, जहां हर व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर न्याय प्राप्त होता है।

“भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि वाजहि नाद ॥
आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद ॥
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग ॥” का संदेश यह है कि असली संपत्ति ज्ञान और करुणा है, और ईश्वर हर व्यक्ति के भीतर मौजूद है। सांसारिक चमत्कारिक शक्तियां ईश्वर की भक्ति के आनंद के सामने महत्वहीन हैं। संसार का संचालन संयोग और वियोग के माध्यम से होता है, और हर व्यक्ति का भाग्य उसके कर्मों के अनुसार लिखा जाता है।

Scroll to Top