हुकमी उतमु नीचु हुकमि लिखि दुख सुख पाईअहि ॥

हुकमी उतमु नीचु हुकमि लिखि दुख सुख पाईअहि ॥
इकना हुकमी बखसीस इकि हुकमी सदा भवाईअहि ॥

  • हुकमी उतमु नीचु हुकमि लिखि दुख सुख पाईअहि ॥
    उसके हुक्म से कुछ ऊँचे होते हैं और कुछ नीच; उसके लिखे हुक्म से दुख और सुख प्राप्त होते हैं।
  • इकना हुकमी बखसीस इकि हुकमी सदा भवाईअहि ॥
    कुछ उसके हुक्म से बख्शे जाते हैं और माफ किए जाते हैं; कुछ उसके हुक्म से हमेशा भटकते रहते हैं।

यह पंक्तियाँ सिख धर्म के ‘हुकम’ (ईश्वर की इच्छा या आदेश) के सिद्धांत को प्रकट करती हैं। इस सिद्धांत के अनुसार, सब कुछ ईश्वर की इच्छा के अनुसार होता है। आइए, इसे आपके द्वारा बताए गए विभिन्न संदर्भों में समझते हैं:

  1. करियर और आर्थिक स्थिरता:
    • करियर और आर्थिक स्थिति में उतार-चढ़ाव को ईश्वर की इच्छा के रूप में स्वीकार करना।
    • यह समझना कि हमें प्रयास करना चाहिए, लेकिन अंतिम परिणाम ईश्वर के हाथ में है।
  2. स्वास्थ्य और भलाई:
    • स्वास्थ्य समस्याओं और भलाई को जीवन के दिव्य योजना का हिस्सा मानना।
    • स्वास्थ्य का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन बीमारियों और स्वास्थ्य लाभ को ईश्वर की इच्छा के रूप में स्वीकार करना।
  3. पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ:
    • पारिवारिक कर्तव्यों को निभाते समय यह समझना कि प्रत्येक भूमिका और जिम्मेदारी दिव्य रूप से निर्धारित है।
    • पारिवारिक चुनौतियों और पुरस्कारों को दिव्य आदेश के रूप में स्वीकार करना।
  4. आध्यात्मिक नेतृत्व:
    • आध्यात्मिक नेताओं को उनकी स्थिति में दिव्य इच्छा के कारण देखना।
    • दूसरों को उनके जीवन में दिव्य इच्छा को समझने और स्वीकारने में मार्गदर्शन करना।
  5. परिवार और रिश्तों की गतिशीलता:
    • रिश्ते ईश्वर की इच्छा के अनुसार बदलते हैं।
    • परिवार की गतिशीलता में बदलाव को एक उच्च योजना का हिस्सा मानकर स्वीकारना।
  6. व्यक्तिगत पहचान और विकास:
    • व्यक्तिगत विकास और आत्म-खोज को ईश्वर की इच्छा के अनुसार unfolding मानना।
    • स्वयं को स्वीकार करना और आत्म-सुधार के लिए प्रयास करना।
  7. स्वास्थ्य और सुरक्षा:
    • स्वास्थ्य और सुरक्षा को ईश्वर की इच्छा के रूप में मानना।
    • सुरक्षा के लिए प्रयास करना, लेकिन अंततः इसे ईश्वर की इच्छा पर छोड़ना।
  8. विभिन्न भूमिकाओं का संतुलन:
    • जीवन में विभिन्न भूमिकाओं का संतुलन ईश्वर की इच्छा के अनुसार होता है।
    • सभी भूमिकाओं को निभाते हुए संतुलन बनाए रखना।
  9. मासूमियत और सीखना:
    • मासूमियत और सीखने की प्रक्रिया को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानना।
    • जीवन के अनुभवों से सीखना और आगे बढ़ना।
  10. पारिवारिक और पर्यावरणीय प्रभाव:
  • पारिवारिक और पर्यावरणीय प्रभावों को ईश्वर की इच्छा का हिस्सा मानना।
  • इन प्रभावों से निपटना और उन्हें जीवन का हिस्सा मानकर आगे बढ़ना।
  1. दोस्ती और सामाजिक स्वीकृति:
  • दोस्ती और सामाजिक स्वीकृति को ईश्वर की योजना के अनुसार देखना।
  • सच्चे दोस्तों को पहचानना और सामाजिक स्वीकृति को दिव्य इच्छा के रूप में मानना।
  1. बौद्धिक संदेह:
  • बौद्धिक संदेह को ईश्वर की इच्छा के अनुसार स्वीकार करना।
  • संदेहों का समाधान खोजने का प्रयास करना और उन्हें दिव्य योजना का हिस्सा मानना।
  1. भावनात्मक उथल-पुथल:
  • भावनात्मक उतार-चढ़ाव को ईश्वर की इच्छा के रूप में मानना।
  • इनसे निपटना और उन्हें जीवन का हिस्सा मानकर आगे बढ़ना।
  1. सांस्कृतिक आदान-प्रदान:
  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान को ईश्वर की इच्छा के अनुसार देखना।
  • विभिन्न संस्कृतियों का सम्मान करना और उनसे सीखना।
  1. रिश्तों का प्रभाव:
  • रिश्तों के प्रभाव को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानना।
  • सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों को स्वीकार करना।
  1. सत्य की खोज:
  • सत्य की खोज को ईश्वर की इच्छा के अनुसार मानना।
  • सत्य को पाने का प्रयास करना और इसे जीवन का उद्देश्य बनाना।
  1. धार्मिक संस्थानों से निराशा:
  • धार्मिक संस्थानों से निराशा को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानना।
  • निराशाओं से सीखना और आध्यात्मिकता में विश्वास बनाए रखना।
  1. व्यक्तिगत पीड़ा:
  • व्यक्तिगत पीड़ा को ईश्वर की इच्छा के अनुसार स्वीकार करना।
  • पीड़ा से निपटना और इसे आत्म-विकास का हिस्सा मानना।
  1. अनुभवजन्य अन्याय:
  • अनुभवजन्य अन्याय को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानना।
  • अन्याय से निपटना और इसे जीवन का हिस्सा मानकर आगे बढ़ना।
  1. दार्शनिक अन्वेषण:
  • दार्शनिक अन्वेषण को ईश्वर की इच्छा के अनुसार मानना।
  • ज्ञान की खोज करना और इसे जीवन का उद्देश्य बनाना।
  1. विज्ञान और तर्क:
  • विज्ञान और तर्क को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानना।
  • विज्ञान और तर्क का सम्मान करना और उन्हें जीवन का हिस्सा मानना।
  1. धार्मिक घोटाले:
  • धार्मिक घोटालों को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानना।
  • घोटालों से सीखना और आध्यात्मिकता में विश्वास बनाए रखना।
  1. अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं होना:
  • अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं होने को ईश्वर की इच्छा के अनुसार मानना।
  • अपेक्षाओं का प्रबंधन करना और उन्हें जीवन का हिस्सा मानना।
  1. सामाजिक दबाव:
  • सामाजिक दबाव को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानना।
  • दबावों से निपटना और उन्हें जीवन का हिस्सा मानकर आगे बढ़ना।
  1. व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास:
  • व्यक्तिगत दृढ़ विश्वास को ईश्वर की इच्छा के अनुसार मानना।
  • अपने विश्वासों पर कायम रहना और उन्हें जीवन का हिस्सा मानना।
  1. जीवन के परिवर्तन:
  • जीवन के परिवर्तनों को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानना।
  • परिवर्तनों को स्वीकार करना और उन्हें जीवन का हिस्सा मानकर आगे बढ़ना।
  1. अस्तित्व संबंधी प्रश्न:
  • अस्तित्व संबंधी प्रश्नों को ईश्वर की इच्छा के अनुसार मानना।
  • प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास करना और उन्हें जीवन का हिस्सा मानना।

इन सभी संदर्भों में, ‘हुकम’ का सिद्धांत यह सिखाता है कि हम सभी को जीवन की घटनाओं को ईश्वर की योजना के रूप में स्वीकार करना चाहिए और अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

Scroll to Top