सच खंडि वसै निरंकारु ॥ करि करि वेखै नदरि निहाल ॥

सच खंडि वसै निरंकारु ॥ करि करि वेखै नदरि निहाल ॥

सचखंड में निरंकार (अकारहीन परमात्मा) का वास है।
वह सब कुछ रचकर अपनी दृष्टि से उसे देखता है और कृपा दृष्टि डालता है।

गहरा विश्लेषण:
सचखंड में निरंकार का वास: “सच खंडि वसै निरंकारु” का अर्थ है कि सचखंड, यानी सत्य का क्षेत्र, वह स्थान है जहाँ परमात्मा का निवास है। यहाँ “निरंकार” से तात्पर्य है उस अकारहीन, अनंत, निराकार परमात्मा से, जो किसी भी रूप, आकार, या सीमा में बंधा नहीं है। यह उच्चतम अवस्था है जहाँ केवल सत्य ही शेष रहता है और उस सत्य में परमात्मा की उपस्थिति सर्वत्र है। यह सचखंड आध्यात्मिक उन्नति का वह स्थान है जहाँ केवल सत्य, शाश्वतता और दिव्यता का अनुभव होता है।

सब कुछ रचकर उसे देखना और कृपा दृष्टि डालना: “करि करि वेखै नदरि निहाल” का अर्थ है कि परमात्मा ने इस सृष्टि को रचकर, अपनी दृष्टि से उसे देखा और उस पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखी। वह अपनी बनाई हुई हर चीज़ पर अपनी दृष्टि रखते हैं और जो भी उनके साथ जुड़ा होता है, उसे वे अपनी कृपा से निहाल कर देते हैं। यह दिखाता है कि परमात्मा केवल सृष्टि के निर्माता ही नहीं बल्कि प्रत्येक जीव पर उनकी दृष्टि और संरक्षण भी है। उनकी यह दृष्टि न केवल देखने की बल्कि आशीर्वाद और प्रेम की है, जिससे वह सृष्टि को आनंदित करते हैं।

परमात्मा का आशीर्वाद और सत्य की अवस्था: यह पंक्ति बताती है कि जो व्यक्ति सचखंड की अवस्था तक पहुँचता है, उसे परमात्मा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह वह अवस्था है जहाँ मनुष्य सत्य के साथ जुड़ता है और परमात्मा के साथ एकता में आता है। परमात्मा की यह कृपा दृष्टि उस आत्मा को आनंदित और संतोष से भर देती है, जो आत्मा के परम सुख और शांति का स्रोत है।

संदेश:
यह शबद हमें यह शिक्षा देता है कि सत्य के उच्चतम स्तर पर पहुँचकर ही परमात्मा की उपस्थिति का साक्षात्कार होता है। वह सबको अपनी कृपा दृष्टि से देखता है और सत्य के साथ जुड़े हुए को आनंदित करता है। यह भी बताता है कि जब हम उस सत्य तक पहुँचते हैं, तभी परमात्मा का साक्षात्कार और उनकी कृपा प्राप्त होती है।

सारांश:
“सच खंडि वसै निरंकारु” से लेकर “करि करि वेखै नदरि निहाल” तक का संदेश है कि सचखंड वह स्थान है जहाँ निरंकार परमात्मा का वास है। वह अपनी सृष्टि को बनाकर और उसे अपनी कृपा दृष्टि से देखकर आनंदित करते हैं। यह परम आनंद की अवस्था है, जहाँ केवल सत्य और परमात्मा की कृपा ही शेष रहती है, और जो भी उनकी दृष्टि में आता है, वह इस आनंद में सम्मिलित हो जाता है।

 

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