विकृति

राम नामु निधानु हरि गुरमति रखु उर धारि ॥ दासन दासा होइ रहु हउमै बिखिआ मारि ॥
जनमु पदारथु जीतिआ कदे न आवै हारि ॥ धनु धनु वडभागी नानका जिन गुरमति हरि रसु सारि ॥

 

एक बार मैं अपने गृहनगर कहलगांव ( भागलपुर) से दिल्ली की यात्रा पर जा रहा था। एक बुजुर्ग साधु थे जो सामने की सीट पर बैठे थे। मुझे याद है कि मैं उनसे कुछ बातचीत करने की कोशिश कर रहा था लेकिन उन्होंने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया। अधिकांश समय वे गहरे ध्यान में लग रहे थे। मुझे लगा कि उन्हें मौन की आवश्यकता थी इसलिए मैं पढ़ता रहा और अपने खुद के बारे में सोचता रहा।

किसी स्टेशन पर, दो बच्चों के साथ एक सज्जन हमारे डब्बे में शामिल हुए। बच्चे बहुत उपद्रवी थे। मुझे उनका उपद्रव अच्छी तरह से याद है क्योंकि वे पूरे डब्बे में कूदते-चीखते। चीखते भी इस प्रकार से थे कि किसी को सहन नहीं हो। इस बात से मुझे गुस्सा तो आ ही रहा था मगर वे साधु बाबा विचलित नहीं हो रहे थे। बच्चे साधु की दाढ़ी भी खीचने लगे तथा उनके कुछ फल भी लेकर खाने लगे। अगले 5-6 घंटे उन्होंने साधु बाबा को ध्यान नहीं ही करने दिया। मैं सोचने लगा कि ये बाबा कुछ प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रहे हैं? तभी उन बच्चों के पिता बाथरूम जाने के लिए उठे तथा मुझे उन बच्चों का ध्यान रखने के लिए कहा। मुझे उन उत्पाती बच्चों का ध्यान रखने की बात अच्छी नहीं लगी। इतने में साधु बाबा का स्टेशन मुगलसराय ( नया नाम दीनदयाल उपाध्याय ) आ गया तथा वे उतरने लगे।

मैंने उत्सुकता से बाबा से पूछा कि उन्होंने इन बच्चों को कैसे सहन कर लिया? इन बच्चों ने तो उन्हें ध्यान नहीं करने दिया?

साधु बाबा ने कहा, “हर स्थिति में प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता नहीं होती है। कभी-कभी आपको बातों को उपरवाले पर छोड़ देना पड़ता है। मैं प्रतिक्रिया दे सकता हूं जब मुझे पता है कि वे बच्चे हैं। मुझे नहीं पता कि उन बच्चों की क्या जरूरत है? उनके दिमाग में क्या चल रहा है? शायद वे मेरा ध्यान चाह रहे थे। हो सकता है कि उनमें नकारात्मक ऊर्जा हो। चूंकि मुझे यकीन नहीं था कि उनकी समस्या क्या है, इसलिए प्रतिक्रिया नहीं देना ही मेरे लिए सही था। ”

लेकिन इतने लंबे समय तक आपने अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित किया, मैं वास्तव में आपकी सहिष्णुता से प्रभावित हूं ”मैंने कहा।

“मैंने कुछ भी बर्दाश्त नहीं किया। मैंने उनकी सारी नकारात्मकता को दूर करने में मदद की। और वह मेरी प्राथमिकता थी।” मुस्कुरा कर उन्होंने मुझे कुछ केले दिए और वे उतर गए।

ट्रेन पुनः चलने लगी और मैं अपनी सीट पर जा बैठा, एक बच्चे ने मेरा स्मार्ट फोन छीन लिया जो उसके हाथ से फिसल गया और गिर गया। मैंने अपना नियंत्रण खोया और बच्चों पर चिल्लाया। उन बच्चों के पिता मेरे करीब आए और माफी मांगने लगे।

“सर मुझे वास्तव में काफी दुःख है। इन बच्चों की माँ का देहांत कुछ महीने पहले हुआ है। माँ के देहांत के बाद से ही ये बच्चे उपद्रवी हो गए हैं। पहले ये ऐसे नहीं थे। कृपया मुझे माफ़ कर दें।”

अब मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

अक्सर, एक गंभीर स्थिति में जहां कोई मुझे गलत तरीके से दोषी ठहराता है या मुझे धोखा देता है या मुझे पीठ में छुरा घोंपता है, मैं प्रतिक्रिया नहीं देने का विकल्प खोजता हूं। हमें यह कभी पता नहीं चलता कि वह व्यक्ति किसी अवसाद या मनोवैज्ञानिक समस्याओं से गुजर रहा है। चूंकि मुझे उस व्यक्ति का असली मकसद पता नहीं है कि झूठ बोल रहा है या मुझे धोखा दे रहा है, इसलिए उसे जाने देने या छोड़ देने में ही भलाई है।

कभी-कभी लोग हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं क्योंकि उनकी किसी प्रकार की विकृति बाहर निकलने की तलाश कर रही होती है। प्रतिक्रिया करके हम उस विकृति को और मजबूत बनाते हैं। इसे जाने देने से, हम न केवल व्यक्ति को नकारात्मकता से बाहर निकलने में मदद करते हैं, बल्कि हम सत्य को स्वयं प्रकट करने की भी अनुमति देते हैं।

ऐसी स्थिति में केवल धैर्य को बनाये रखने में ही समझदारी है।

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