मुकदमा…

फरीदा साहिब दी करि चाकरी दिल दी लाहि भरांदि ॥
दरवेसां नो लोड़ीऐ रुखां दी जीरांदि ॥

“श्यामलाल तुम्हारा ही नाम है?” उस सिपाही ने पुलिसिया रौब से पूछा।

“जी हाँ, मैं ही हूँ श्यामलाल, कहिये।”

“चलो तुम्हे कोर्ट चलना है, तुम्हारे बेटे ने तुम्हारे खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया है, आज तुम्हारी कोर्ट में पेशी है।” सिपाही ने कहा।

सुनते ही उस बूढे आदमी की आँखे भर आईं, “हे भगवान अब यही दिन देखना बाकी रह गया था।” कहते हुए बूढा उठकर सिपाही के साथ हो लिया।

श्यामलाल को पुलिस जीप में बैठते हुए देख मोहल्ले के कुछ लोग भी पुलिस जीप के पीछे हो लिए।

कोर्ट में श्यामलाल को कटघरे में खड़ा किया गया, फरियादी पक्ष के वकील ने जज को बताया, “योर ऑनर ! मेरे क्लाइंट मिस्टर नरेश ने अपने पिता श्यामलाल पर ये इल्जाम लगाया है कि उसने उसकी परवरिश सही ढंग से नहीं की , इसलिए आज समाज में उसकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, और उसे समाज में नीचा देखना पड़ रहा है।”

“नरेश ! आप बताइये क्या माजरा है ?” जज ने नरेश से पूछा।

“जज साहब, मेरी माँ , जब मैं दस साल का था तभी गुज़र गई । मेरा बाप मजदूरी करने जाता था, उसने मुझे पढ़ाया लिखाया । मेरी नौकरी लगी और मेरी शादी भी की, पर इन सबके बावजूद इसने मेरी परवरिश सही से नहीं की और संस्कार नहीं दिए । इसलिए समाज में आज न केवल मेरा अपमान हो रहा है, बल्कि मेरा भविष्य भी अंधकार में है।” नरेश ने कहा।

“पहेलियाँ मत बुझाओ , सीधी बात कहो।” जज ने उसे डाँटा।

“जज साहब, इन दिनों मेरी बीवी मेरे पिता को वृद्धाश्रम में भेजने के लिए पीछे पड़ी हुई है और मैं उसका विरोध नहीं कर पा रहा हूँ । अगर मेरे पिता ने मेरी सही परवरिश की होती और संस्कार दिए होते , तो मैं उसका विरोध करता और अपने पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ने को राजी नहीं होता । चूंकि मेरे पिता ने मुझे संस्कार नहीं दिये , तो मैं नहीं जानता सही परवरिश और संस्कार क्या होते हैं ? इस कारण मैं अपने बेटे को भी वो संस्कार नहीं दे पा रहा हूँ , इसलिए मेरा भविष्य अंधकार में है । कल को मेरा बेटा भी संस्कारों और परवरिश के अभाव में मुझे और मेरी पत्नी को वृद्धाश्रम में भेज सकता है, और मेरे पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ने से मेरी समाज में भी बेइज्जती होगी । इसलिए मैं चाहता हूं मेरे पिता को इसके लिए सजा दी जाए।” नरेश ने अपनी समस्या बताई।

जज सोच में पड़ गया, कुछ देर सोचने के बाद जज ने कहा ,”नरेश कानून में ऐसे काम के लिए कोई सजा मुकर्रर नहीं है । तुम बताओ अपने पिता के लिए क्या सजा होनी चाहिए ? ”

“जज साहब मैं चाहता हूँ मेरे पिता को पाबंद किया जाए कि अगले दस वर्ष तक मेरी अच्छे से परवरिश करें और मुझे संस्कार दे ताकि मैं भी अपने बेटे की सही परवरिश करना सीख सकूँ।”

“ठीक है, ये कोर्ट श्यामलाल को दस साल के लिए पाबंद करता है कि वो अपने बेटे नरेश की अच्छी परवरिश करे और उसे संस्कार दे।”

“जज साहब एक दरख्वास्त और है मेरी।” नरेश ने कहा।

“हाँ बोलो।”जज नरेश का मन्तव्य और तरीके से खुश था।

“जज साहब कुछ लोग डरा कर, धमका कर और फुसलाकर मेरे पिता को मेरी परवरिश करने से रोक सकते हैं, उन्हें भी पाबंद किया जावे की ऐसा कोई कृत्य न करे।”नरेश ने कहा।

” ठीक है ….कोर्ट ये आदेश भी देती है कि तुम्हारी परवरिश करने में तुम्हारे पिता के लिए कोई भी बाधा उतपन्न करेगा तो पुलिस उसे पकड़ कर कोर्ट में पेश करेगी।”कहकर जज ने कोर्ट बर्खास्त कर दिया।

श्यामलाल ने नरेश को गले से लगा लिया, दोनों की आँखे छलक आईं थी, नरेश की बीवी अपने बेटे को लेकर चुपचाप घर के लिए निकल गई । वो समझ चुकी थी नरेश ने ये सब करके अपने वर्तमान के साथ भविष्य भी सुधार लिया था।

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