हरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति तास सम तुलि नही आन कोऊ ॥
एक ही एक अनेक होइ बिसथरिओ आन रे आन भरपूरि सोऊ ॥
एक बार व्यापारियों का कोई कारवाँ किसी जंगल से होकर गुज़र रहा था।
वह जंगल बीहड़ के दुर्दांत डाकुओं का ठिकाना भी था.
डाकुओं ने व्यापारियों को आते देखा,
तो सभी व्यापारियों को घेर लिया।
संयोगवश पीछे चल रहा एक व्यापारी डाकू की नज़रों से बचकर अपनी रुपयों की थैली लेकर निकल गया।
नज़दीक में ही कोई आश्रम था, वह उसमें घुस गया।
वहाँ उसने एक साधु को माला जपते देखा।
व्यापारी ने सारी बात बता कर वह थैली उस साधु को संभालने के लिए दे दी। साधु ने कहा कि तुम
निश्चिन्त हो जाओ।
डाकूओं के जाने के बाद व्यापारी अपनी थैली लेने
वापस कुटिया में आया। उसके आश्चर्य का पार न था।
वह साधु तो दरअसल डाकुओं की टोली का सरदार था।
वही लूट के रुपयों को दूसरे डाकुओं को बाँट रहा था।
व्यापारी वहाँ से निराश व भयभीत होकर चुपके से वापस जाने लगा,
मगर उस डाकू साधु ने व्यापारी को देख लिया।
उसने कहा;
“रुको, तुमने जो रुपयों की थैली रखी थी,
वह ज्यों की त्यों ही है। तुम ले जा सकते हो.”
अपने रुपयों को सलामत देखकर व्यापारी जितना खुश हुआ, उससे अधिक विस्मित भी हुआ.
डाकू का आभार जताया।
जाते-जाते डरते-डरते उसने डाकुओं ने सरदार से
पूछा कि उसने हाथ में आये धन को इस प्रकार क्यों जाने दिया।
वह भी तब जबकि वह स्वयं उन्हीं डाकुओं का सरदार है,
जिन्होंने उसके काफिले को लूटा था।
सरदार ने कहा;
“हम डाकू हैं, चोर नहीं, ठग नहीं.
तुमने मुझे भगवान का साधक जानकर भरोसे के साथ थैली दे दी थी,
उसे उसी भाव से मैंने वापस दे दी।
बात बस इतनी नहीं कि तुमने भगवान का साधक समझ भरोसा रखा और उसे नहीं टूटना चाहिए, चाहे यह भरोसा कहीं भी हो, उसे ठगे जाने की तरह नहीं टूटना चाहिए।
विश्वास का टूटना केवल दो पल और दो व्यक्तियों का नहीं होता, वह कई बार आजीवन का और तमाम की निष्ठा का संदेह बन जाता है,
यहाँ तक कि सरलहृदय, सज्जन, नैतिक जनों पर भी,
परायों ही नहीं, अपनों पर भी, अपने पर भी तो मन कहता है, कुछ लूटने और किसी का भरोसा टूटने के बीच चुनना ही पड़े, तो भरोसे को तोड़ना न चुनना.
विश्वास बना रहा, तो डाकू भी कभी सुजन बन जाएँगे,
टूटा, तो सुजन भी दस्यु नजर आयेंगे।”