ब्रह्मज्ञान

प्रीतम प्रेम भगति के दाते ॥ अपने जन संगि राते ॥
जन संगि राते दिनसु राते इक निमख मनहु न वीसरै ॥
गोपाल गुण निधि सदा संगे सरब गुण जगदीसरै ॥

एक वैद्य अपनी जीविका के लिए एक नगर में पहुँचा। वहाँ उसने अपना औषधालय स्थापित किया। सैकड़ों व्यक्ति दवा लेने आते और लाभ उठाते, किंतु जब वैद्य जी दवा के दाम माँगते, तो वे ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने लगते। कहते हम सब ब्रह्म हैं। आप और हम एक ही हैं। औषधि भी ब्रह्मरूप है। फिर ब्रह्म से क्या लेना-देना ?

उस नगर में थोथे ब्रह्मज्ञान का शब्दाडंबर लोगों ने खूब रट लिया था और बाहर के आदमियों को मूर्ख बनाने के लिए उन्होंने यह अच्छा बहाना ढूँढ़ रखा था। अपने मतलब में तो चौकस रहते, जब किसी दूसरे को कुछ देने का अवसर आता, तो ब्रह्मज्ञान की बात बनाकर छुटकारा पा जाते।

वैद्य जी इन ब्रह्मज्ञानियों के मारे बड़े चकराए। जब दवा लेने आए, तब तो लोग ‘लाभ ज्ञानी’ रहें और जब देने का समय आए, तब ब्रह्मज्ञानी बन जाएँ। वैद्य जी इस व्यवहार से बड़े दुखी हुए और अपना औषधालय बंद करके अपने देश वापस चले जाने की बात सोचने लगे। वैद्य जी सोच-विचार में बैठे ही थे कि उस नगर के राजा का एक दूत उन्हें ले जाने आया। वैद्य जी की प्रशंसा दूर-दूर तक फैल चुकी थी, राजा ने भी उनके संबंध में कुछ सुना था। राजकुमार की बीमारी जब अन्य वैद्यों से अच्छी न हुई, तो राजा ने इन परदेशी वैद्य को बुलवाया।

दूतों के साथ वैद्य जी राजा के यहाँ पहुँचे और राजकुमार की बीमारी का इलाज करने लगे। धीरे-धीरे रोग अच्छा होने लगा। एक दिन राजा ने वैद्य जी से कहा, कोई ऐसी दवा बनाइए, जिससे राजकुमार जल्दी अच्छा हो जाए।”

वैद्य को यह अवसर बड़ा अच्छा जान पड़ा, उसकी समझ में आ गया कि यही मौका ब्रह्मज्ञानियों से बदला लेने का है। वैद्य ने कहा, “राजन् ! आपके राजकुमार एक दिन में बिलकुल चंगे हो सकते हैं, इस प्रकार की मैं एक दवा जानता हूँ, पर उसके लिए एक कठिन वस्तु की आवश्यकता है। यदि आप उसे मंगा सकें, तो दवा बन सकती है।” राजा ने उत्सुकता पूर्वक पूछा, “वह क्या वस्तु है ?” वैद्य ने कहा, “कुछ ब्रह्मज्ञानियों का तेल चाहिए।” राजा ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, “यह क्या कठिन बात है ? हमारी सारी प्रजा ब्रह्मज्ञानी है। अभी सौ-दो सौ ब्रह्मज्ञानी पकड़कर मंगाता हूं।” राजा की आज्ञा पाते ही पुलिस के सिपाही ब्रह्मज्ञानियों को तलाश करने के लिए चल दिए।

नगर में यह खबर बिजली की तरह फैल गई थी कि राजकुमार के लिए ब्रह्मज्ञानियों के तेल की जरूरत है। इस समाचार से सबके कान खड़े हो गए। पुलिस के जत्थे बड़ी सरगरमी के साथ खोजते फिर रहे थे कि ब्रह्मज्ञानी कौन है ? परंतु कुछ भी पता न चला, जिससे पूछते मना कर देता। बड़े-बूढ़ों, मुखिया, पंचों से पूछा गया तो उन्होंने गिड़गिड़ा- कर यही कहा, “भगवन् ! हमारे कुटुंब में सात पुश्त से कोई ब्रह्मज्ञानी नहीं हुआ। दूसरे मुहल्ले में तलाश कीजिए।” दूसरे मुहल्ले वालों से पूछा गया तो उत्तर मिला कि हम तो अल्पज्ञानी हैं, ब्रह्मज्ञानी का तो हमने कभी नाम भी नहीं सुना। जब सारे शहर में कोई ब्रह्मज्ञानी न मिला, तो वैद्य ने अपनी दुःख गाथा राजा से कह सुनाई और बताया कि किस प्रकार लोगों ने उनके पैसे ब्रह्मज्ञान की आड़ में रख लिए हैं। वैद्य ने दूसरी दवा देकर राजकुमार को अच्छा कर दिया और राजा ने उन थोथे ब्रह्मज्ञानियों को बुलाकर वैद्य जी के पैसे दिलवा दिए।

हम ऐसे लोगों को बहुतायत देखते हैं, जो अपने मतलब में कभी नहीं चूकते और बुरे-बुरे कर्म करते हैं, किंतु जब भेद खुलता है या दंड मिलता है तो कहने लगते हैं, “भाग्य में ऐसा लिखा था, ऐसी होनी थी, होनी को कौन मिटा सकता है ? कलियुग का प्रभाव है, अच्छी बुद्धि को बुरी कर देता है, बुरे दिनों का चक्कर है, ईश्वर की ऐसी ही मरजी है।” इस प्रकार ब्रह्मज्ञान बघारकर अपने को निर्दोष साबित करना और दूसरों को मूर्ख बनाकर जीवन-मुक्त परमहंस का ज्ञान अपने ऊपर लागू करते हैं। जो ब्रह्म को सर्वत्र एक समान देखने लगेगा, वह दूसरों के हित और लाभ को अपने लाभ से किसी प्रकार कम नहीं समझ सकता। वह पाप-पुण्य से बहुत ऊँचा उठ जाता है, किंतु हम साधारण लोगों के लिए तो प्रेम और परोपकार यही ब्रह्मज्ञान है। स्वयं कष्ट सहकर दूसरों का भला करना यही उत्तम वेदांत है।

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