गुरमुखि सालाहनि से सादु पाइनि मीठा अतु सारु ॥ सदा मीठा कदे न फीका गुर सबदी वीचारु ॥२॥
बहुत वर्ष पुरानी बात है। उस समय एक बहुत ही विशाल और भव्य मंदिर हुआ करता था। उस मंदिर में लोग हजारों की संख्या में भगवान के दर्शन और पुजा प्रार्थना करने आया करते थे।
उस मंदिर का जो प्रधान पुजारी हुआ करता था। उस की उम्र काफी ज्यादा थी और वह बीमार भी रहने लगा था। एक दिन अचानक उसकी मृत्यु हो जाती है।
मंदिर के पुजारी का पद फिर से खाली हो जाता है। उस पद की पूर्ति के लिए महंत ने विज्ञापन दे दिया।
विज्ञापन में कहां जाता है कि ’’इस महीने की पन्द्रह तारीख को मंदिर के प्रधान पुजारी का चुनाव होगा। जो स्वयं को इस का योग्य समझते हैं, वे पंद्रह तारीख को मंदिर में उपस्थित होकर साक्षात्कार में सम्मिलित हों। साक्षात्कार प्रातः दस बजे तक चलेगा।’’
प्रधान पुजारी का पद बड़ा प्रतिष्ठित था। मंदिर में आय भी बहुत होती थी, अतः पंद्रह तारीख को बहुत से ब्राह्मण मंदिर के लिए चल पड़े। मंदिर पहाड़ी के उपर बहुत ही विशाल बना हुआ था। वहाँ तक पहुँचने के लिए केवल एक ही रास्ता था।
उस रास्ते में बहुत से काँटे और कंकड़-पत्थर पड़े थे। किसी प्रकार काँटों और कंकड़-पत्थरों से बचती हुई ब्राह्मणों की भीड़ मंदिर की ओर चली जा रही थी।
सब ब्राह्मण पहुँच गए। महंत ने सबकों आदरपूर्वक बैठाया। सबसे अनेकों प्रकार के प्रश्न भी पूछे गए जो पूजा संबंधी कार्य के लिए आवश्यक थे।
दस बजते-बजते साक्षात्मक कर प्ररीक्षा पूरी हो गई।
जब सब लोग उठने लगे तो एक नवयुवक ब्राह्मण वहाँ आया। उसके कपड़े फटे हुए थे और वह पसीने से भींगा हुआ था। देखने में लग रहा था कि वह निर्धन ब्राह्मण है।
जब उस युवक ने आकर महंत का अभिवादन किया तो महंत ने कहा-’’तुम्हें आने में देर हो गई।’’
’’मैं मानता हूँ। मैं केवल भगवान के दर्शन करके लौट जाउँगा।’’ नवयुवक ने विनम्र स्वर में बिना झिझके कहा।
महंत उसकी दशा और विनर्मता देखकर दयार्द्र हो गए। उन्होंने पूछा-’’तुम जल्दी क्यों नहीं आए?’’
’’ नवयुवक ब्राह्मण ने बोला घर से तो मैं जल्दी ही चला था पर रास्ते में बहुत सारे काँटे और कंकड़-पत्थर पड़े हुए थे। उन काँटे और कंकड़-पत्थर पर यात्रियों को चलने में कष्ट होता होगा, यह सोचकर मैं उन्हें हटाने लगा रहा। इसलिए देर हो गई’’।
महंत ने प्रश्न किया- ’’पूजा करना जानते हो?’’
युवक बोला-’’भगवाना को स्नान करवाना,उन पर चंदन और पुष्प् चढ़ा देना, धूप-दीप जला देना तथा भोग सामने रखकर परदा गिरा देना और शंख बजाना जो जानता हूँ।’’
’’और मंत्र? महंत ने पूछा’’
युवक ने उदास होकर कहा- ’’मैं नहीं जानता कि भगवान से नहाने और खाने के लिए कहने को कुछ मंत्र भी हाते हैं।’’
उसकी यह बात सुनकर अन्य प्रत्याशी हँसने लगे कि यह मुर्ख भी पुजारी बनने आया हैं।
महंत ने युवक ब्राह्मण से कहा-’’पुजारी तो तुम्हें चुन लिया गया। मंत्र मुझसे सीख लेना मैं तुम्हें सिखा दूँगा। भगवान ने मुझे स्वप्न में कहा है कि तुम्हें मनुष्य चाहिए।’’
’’हम मनुष्य नहीं है क्या?’’ महंत ने निर्णय पर अप्रसन्न होकर अन्य ब्राह्मण बोले। उन्होंने कहा-इतने पढ़े-लिखे विद्वानों के रहते महंत एक ऐसे मुर्ख को प्रधान पुजारी बना दें जो मंत्र भी न जानता हो, यह यहाँं उपस्थित ब्राह्मणों का अपमान हैं।
महंत ने ब्राह्मणों को संबोधित करते हुए कहा-’’अपने स्वार्थ की बात तो पशु भी जानते हैं। बहुत से पशु अधिक चतुर भी होते हैं। पर वास्तव में मनुष्य वहीं है जो दूसरों के सुख-दुख का ध्यान रखता है। जो दूसरों को सुख पहुँचाने के लिए अपने स्वार्थ और सुख त्याग कर देता हैं।’’
ब्राह्मण बहुत लज्जित हुए। उनके मस्तक लज्जा से झुक गए। वे धीरे-धीरे उठे और भगवान और महंत जी को प्रणाम बोलकर मंदिर से बाहर निकल पहाड़ी के से नीचे उतरने लगें।