ता कीआ गला कथीआ ना जाहि ॥ जे को कहै पिछै पछुताइ ॥

ता कीआ गला कथीआ ना जाहि ॥ जे को कहै पिछै पछुताइ ॥

 

उस (परमात्मा) के गुण और महानता की बातें बयान नहीं की जा सकतीं।
यदि कोई कहने का प्रयास करता है, तो वह अंततः पछताता है (क्योंकि वह पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं कर पाता)।

गहरा विश्लेषण:

  1. परमात्मा की महानता: “ता कीआ गला कथीआ ना जाहि” का मतलब है कि परमात्मा के गुण, उसकी रचनात्मकता, और उसकी महानता को शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। ईश्वर की विशालता और उसकी अपार शक्ति इतनी गहरी है कि कोई भी इसे पूरी तरह समझ या व्यक्त नहीं कर सकता।
  2. कथन में सीमाएँ: “जे को कहै पिछै पछुताइ” का तात्पर्य है कि यदि कोई ईश्वर की महानता को शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास करता है, तो वह अंत में पछताता है क्योंकि उसकी बातें अधूरी रह जाती हैं। यह संदेश देता है कि ईश्वर की अपार शक्ति को समझने और वर्णन करने के लिए मानव भाषा अपर्याप्त है। जो व्यक्ति इसका प्रयास करता है, उसे यह एहसास होता है कि वह परमात्मा की असीम सत्ता को पूरी तरह से समझने में असमर्थ है।

संदेश:

यह पंक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि ईश्वर की शक्ति और उसकी रचना इतनी विशाल और अद्वितीय है कि उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। जितना कोई व्यक्ति उसके गुणों को समझने और बताने की कोशिश करता है, उतना ही वह अपनी सीमाओं को महसूस करता है। परमात्मा की अनंतता को समझने के लिए केवल अनुभव और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि ही सहायक हो सकती है, शब्द नहीं।

सारांश:

“ता कीआ गला कथीआ ना जाहि” और “जे को कहै पिछै पछुताइ” का सार यह है कि ईश्वर की महानता का वर्णन करना असंभव है। जो भी व्यक्ति इसके प्रयास में लग जाता है, उसे यह एहसास होता है कि वह इस विशालता को व्यक्त करने में असमर्थ है और अंततः पछताता है। यह पंक्तियाँ ईश्वर की असीमता और मानव की सीमाओं को दर्शाती हैं।

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