कच पकाई ओथै पाइ ॥ नानक गइआ जापै जाइ ॥
जो कच्चे (अधूरे) और पक्के (पूर्ण) कर्म हैं, वे वहीं (ईश्वर के दरबार में) जाकर परखे जाते हैं।
नानक कहते हैं, जब व्यक्ति वहाँ पहुँचता है, तब उसे अपनी सच्चाई का अहसास होता है।
गहरा विश्लेषण:
- कच्चे और पक्के कर्मों का मूल्यांकन: “कच पकाई ओथै पाइ” का अर्थ है कि हमारे अच्छे (पक्के) और बुरे (कच्चे) कर्मों का वास्तविक मूल्यांकन ईश्वर के दरबार में ही होता है। इस संसार में किए गए कर्म, चाहे वे अधूरे या स्वार्थपूर्ण हों, या फिर वे सच्चे और ईमानदार हों, सबका मूल्यांकन केवल ईश्वर की अदालत में हो सकता है। यहाँ कच्चे कर्म से आशय है वे कर्म जो स्वार्थ, लोभ, और मोह के कारण किए जाते हैं, जबकि पक्के कर्म वे हैं जो सत्य, धर्म और प्रेम के आधार पर किए गए हों।
- सच्चाई का अहसास: “नानक गइआ जापै जाइ” का मतलब है कि जब व्यक्ति मृत्यु के बाद ईश्वर के दरबार में पहुँचता है, तब उसे अपने किए गए कर्मों की वास्तविकता समझ में आती है। जीवन में हम अपने कर्मों के बारे में जैसा सोचते हैं, ईश्वर के दरबार में उसकी सच्चाई प्रकट होती है। यही वह समय होता है जब हमें यह समझ में आता है कि हमने जीवन में सही किया या गलत।
संदेश:
यह शबद हमें यह सिखाता है कि हमारे कर्मों का असली मूल्यांकन केवल ईश्वर के दरबार में होता है। इस संसार में हम जो भी कर्म करते हैं, चाहे वह अच्छे हों या बुरे, ईश्वर की नज़र में उनकी सच्चाई प्रकट होती है। इसलिए हमें हमेशा पक्के, सच्चे, और धर्मपूर्ण कर्म करने चाहिए ताकि हमें अंत में पछताना न पड़े।
सारांश:
“कच पकाई ओथै पाइ” से लेकर “नानक गइआ जापै जाइ” तक का संदेश यह है कि जीवन में किए गए हमारे कर्म, चाहे अधूरे या पूरे हों, ईश्वर के दरबार में जाकर उनकी सच्चाई प्रकट होती है। मृत्यु के बाद, व्यक्ति को अपने कर्मों का सही मूल्यांकन पता चलता है। इसलिए जीवन में सच्चे और धर्मपूर्ण कार्यों पर ध्यान देना आवश्यक है