एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस ॥
सुणि गला आकास की कीटा आई रीस ॥
इस मार्ग (ईश्वर के मार्ग) पर चढ़ने के लिए पवित्र सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, और जो इस मार्ग पर चलते हैं, वे इकाई (एकता) को प्राप्त करते हैं।
आकाश की बातें सुनकर तुच्छ जीव (जैसे कीड़े) भी ईर्ष्या से भर उठते हैं।
गहरा विश्लेषण:
1. आध्यात्मिक मार्ग पर चढ़ाई:
“एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस” का अर्थ है कि ईश्वर की ओर जाने वाले मार्ग पर चलना आसान नहीं है। यह मार्ग सीढ़ियों जैसा है, और हर कदम के साथ आध्यात्मिकता में उन्नति होती है। जो लोग इस आध्यात्मिक पथ पर चलते हैं, वे एकता (इकीस) को प्राप्त करते हैं। “इकीस” का अर्थ है एकता और आध्यात्मिक समरसता—यानी, व्यक्ति के भीतर और बाहर एकता और शांति का भाव आ जाता है, और वह ईश्वर के साथ एकरूप हो जाता है।
2. निम्न प्रकृति का ईर्ष्या करना:
“सुणि गला आकास की कीटा आई रीस” का अर्थ है कि जब तुच्छ और अज्ञानता से भरे हुए जीव (कीड़े) उन ऊँचाइयों की बातें सुनते हैं, जो आध्यात्मिक लोग (जो ईश्वर के करीब होते हैं) अनुभव करते हैं, तो वे ईर्ष्या से भर जाते हैं। कीड़े यहाँ तुच्छ और निम्न प्रकृति के जीवों का प्रतीक हैं, जो ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों की उपलब्धियों को देखकर ईर्ष्या करने लगते हैं। यह बताता है कि जो लोग आध्यात्मिक ऊँचाइयों पर पहुँचते हैं, उनके मार्ग और सफलता को हर कोई समझ नहीं सकता और कुछ लोग नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ दे सकते हैं।
3. आध्यात्मिकता की महानता:
यह पंक्तियाँ हमें बताती हैं कि ईश्वर का मार्ग कठिन है और उस पर चलने वाले को कई सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं, जिससे वह धीरे-धीरे आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर के साथ एकत्व को प्राप्त करता है। लेकिन जो लोग इस मार्ग पर नहीं होते, वे इसे समझने के बजाय उस पर ईर्ष्या या द्वेष कर सकते हैं।
सारांश:
“एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस ॥
सुणि गला आकास की कीटा आई रीस ॥” का संदेश यह है कि ईश्वर के मार्ग पर चलना आध्यात्मिक उन्नति की एक यात्रा है, जिसमें व्यक्ति को अनेक सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। इस यात्रा के अंत में एकता और ईश्वर से मेल होता है। लेकिन जब तुच्छ और निम्न प्रकृति के लोग इस मार्ग की महानता को देखते या सुनते हैं, तो वे ईर्ष्या करने लगते हैं, क्योंकि वे इसे समझ नहीं पाते।