उम्मीद

हरि प्रभ रते लोइणा गिआन अंजनु गुरु देइ ॥
मै प्रभु सजणु पाइआ जन नानक सहजि मिलेइ ॥

आप मुझसे मेरा सब कुछ ले सकते हैं, लेकिन एक चीज़ है जो आप मुझसे नहीं ले सकते और वो है – उम्मीद”

“अगर आपका जीवन में कोई शक्तिशाली उद्देश्य नहीं है, तो उसे ढूँढिये, बेमकसद जिंदगी जीने का कोई मतलब नहीं हैI”

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ऑस्विच नामक जगह पर एक नाज़ी यातनागृह में एक कैदी के रूप में झेली गयी यातनाओं और इन यातनाओं के बीच एक सामान्य जीवन जीने की कल्पना करने की कहानी है – विक्टर फ्रैंकल की “MAN’S SEARCH FOR MEANING”.

विक्टर को हिटलर की सेना द्वारा बिना किसी वजह के लाखों लोगों की तरह जेल में डाल दिया गया था, वहां हर दिन किसी नरक से कम नहीं था, खाने को कई दिन तक खाना नहीं मिलता था, मृत लोगों की लाशें कई दिन तक यूंही पड़ी रहती थी, लाशों को कई-कई दिन बाद इक्कठा करके सीधे आग लगा दी जाती थी, इन सब के बीच लोग जिस वजह से ज्यादातर मर रहे थे, वो थी – नाउम्मीदी, लोगों ने वहां से बाहर निकलने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, इसलिए वो यातनाओं को ज्यादा झेल नहीं पाते थे…

विक्टर जो जेल जाने से पहले एक मनोचिकित्सक था और भयावह यातनाओं के बीच उसे –

मैं जिन्दा क्यों हूँ?
मेरे जीवन का क्या मकसद है?
मेरे होने से क्या किसी को फर्क पड़ता है?
इन सवालों के जवाब ढूँढने के लिए और जिन्दा रहने के लिए अपने अन्दर एक उम्मीद को जगाये रखना थाI इसके लिए विक्टर ने खुद को तीन बुनियादी वजह दीं, जिनकी वजह से उसे जीना था-

पहली वजह थी – उसका काम – जब उसे जेल लाया गया था तो पीछे उसके कई काम अधूरे रह गए थे, जिन्हें उसे बाहर निकलकर पूरा करना था, इनमें से एक किताब लिखना भी थाI
दूसरी – उसका प्यार – जब विक्टर को जेल लाया गया तो उसकी पत्नी गर्भवती थी, वह सोचता रहता था कि उसके बेटा होगा कि बेटी और कई बार जब वह अकेला होता था तो अपनी पत्नी के अपने पास होने की कल्पना करता था, यह एक बहुत महत्वपूर्ण कारण था, जिसने उसे इस नर्क जैसे हालातों में भी जिन्दा रखा थाI
तीसरी – प्रोत्साहन- जेल में उसे अपने एक पुराने मरीज़ की याद आती है जो अपनी बीवी के मरने के बाद डिप्रेशन में था और विक्टर से सलाह लेने आया था, तो विक्टर ने उससे पूछा कि अगर तुम मर जाते तो किसे दुःख और तकलीफ का सामना करना पड़ता, वह व्यक्ति बोला- “मेरी बीवी कोI” तो विक्टर ने पूछा- “क्या तुम ऐसा चाहते थे?” वह व्यक्ति बिना कुछ बोले वहाँ से चला गयाI ये वाकया विक्टर को याद दिलाता था कि “अच्छा हुआ कि मैं यहाँ हूँ, अगर मेरी बीवी यहाँ होती तो वो ये सब कैसे झेलती” इस बात से उसे सब कुछ झेलने की प्रेरणा मिलती थीI
इसके अलावा वो परमेश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति था और उसका मानना था कि इंसान की सबसे मुश्किल घड़ी में ईश्वर हमेशा उसके साथ होते हैं!

विक्टर तीन साल तक जेल में था और वह नहीं जानता था कि उसके यहाँ आने के बाद उसके माँ-बाप, भाई और गर्भवती पत्नी को मार दिया गया हैI यह बात उसे जेल से बाहर आने के बाद पता चली, लेकिन जब वो तीन साल उन यातनाओं को सहकर भी जिन्दा रहा तो यह खबर सुनकर भी अब वह जिन्दा रह सकता थाI

तो (जेल से बाहर आने के बाद) विक्टर ने अपने काम में मन लगाया और वह एक सफल लेखक और मनोचिकित्सक बना!

तो जब आपके साथ कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा हो, तो इस किताब को पढ़ें और सोचें, हमारी जिंदगी विक्टर की जेल वाली जिंदगी से तो सौ गुना बेहतर है और फिर आप किसी भी परिस्थिति में जीने की एक वजह ढूंढ ही लेंगे!

Scroll to Top