इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस ॥
लखु लखु गेड़ा आखीअहि एकु नामु जगदीस ॥
अगर एक जीभ से लाख हों जाएँ, और लाख से बीस लाख,
फिर भी लाखों-लाख बार दोहराने के बावजूद केवल एक ही नाम, जगदीश्वर (ईश्वर), का गुणगान किया जा सकता है।
गहरा विश्लेषण:
1. असीम गुणगान की अपारता:
“इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस” में यह बताया गया है कि भले ही एक इंसान की जीभ से लाखों जीभें बन जाएँ, और उन लाखों से फिर करोड़ों हो जाएँ, फिर भी वे ईश्वर के गुणगान के लिए पर्याप्त नहीं होंगी। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर की महिमा और उसकी अपारता इतनी विशाल है कि उसे वर्णन करने के लिए अनगिनत जीभें भी कम पड़ेंगी।
2. ईश्वर का नाम और उसकी महानता:
“लखु लखु गेड़ा आखीअहि एकु नामु जगदीस” का मतलब है कि चाहे कितनी भी बार ईश्वर के नाम का उच्चारण किया जाए, केवल एक ही नाम है, जो सर्वशक्तिमान जगदीश्वर का है। लाखों बार भी ईश्वर के नाम का जाप या उसका स्मरण किया जाए, फिर भी उसकी महिमा का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। यह दर्शाता है कि ईश्वर का नाम ही सबसे महान है, और उसकी प्रशंसा अनंत है।
3. नाम की महिमा:
इस पंक्ति में नाम की विशेष महत्ता पर ज़ोर दिया गया है। सिख धर्म में “नाम सिमरन” (ईश्वर के नाम का स्मरण) को सबसे बड़ा आध्यात्मिक अभ्यास माना गया है। यह पंक्ति बताती है कि ईश्वर के नाम का उच्चारण ही उसके साथ संबंध स्थापित करने का सबसे सशक्त माध्यम है। लाखों बार भी उसके नाम का जाप करना कम होगा, क्योंकि उसका नाम अनंत गुणों का प्रतीक है।
सारांश:
“इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस ॥
लखु लखु गेड़ा आखीअहि एकु नामु जगदीस ॥” का संदेश यह है कि भले ही किसी के पास लाखों-लाख जीभें हों और वह अनगिनत बार ईश्वर का नाम ले, फिर भी उसकी महिमा का पूरा वर्णन संभव नहीं है। ईश्वर का नाम और उसकी महिमा अनंत हैं, और केवल एक नाम, “जगदीस” (जगत का स्वामी), ही सबसे महान और शाश्वत है।