आदेसु तिसै आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥
उस (ईश्वर) को बार-बार नमन है।
वह आदि (सृष्टि से पहले मौजूद), अनील (निर्मल), अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं), और अनाहत (जिसे कोई चोट या घाव नहीं पहुँच सकता) है।
वह युगों-युगों से एक ही रूप में है।
गहरा विश्लेषण:
1. ईश्वर को नमन:
“आदेसु तिसै आदेसु” का अर्थ है “उस ईश्वर को बार-बार नमन है।” यह वंदना ईश्वर की महानता और उसकी सर्वशक्तिमान स्थिति की ओर इशारा करती है। हम ईश्वर को बार-बार प्रणाम करते हैं क्योंकि वह ही इस सृष्टि का सृजनकर्ता और पालनकर्ता है।
2. आदि (सृष्टि से पहले मौजूद):
ईश्वर को “आदि” कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह सृष्टि के आरंभ से पहले भी मौजूद था। वह समय और सृष्टि की सीमाओं से परे है। इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर अनंत और शाश्वत है।
3. अनील (निर्मल):
“अनील” का अर्थ है निर्मल, यानी ईश्वर शुद्ध और पवित्र है। वह सभी प्रकार की अशुद्धियों और दोषों से परे है। उसकी पवित्रता और शुद्धता अनंत है और किसी भी सांसारिक चीज़ से नहीं मापी जा सकती।
4. अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं):
“अनादि” का अर्थ है जिसका कोई आरंभ नहीं है। ईश्वर सदा से है और सदा रहेगा। इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर न समय के बंधन में बंधा है और न ही उसका कोई अंत है। वह अनंत काल तक अस्तित्व में है।
5. अनाहत (जिसे कोई चोट नहीं पहुँच सकती):
“अनाहत” का अर्थ है जिसे कोई चोट या घाव नहीं पहुँच सकता। इसका तात्पर्य यह है कि ईश्वर किसी भी भौतिक या सांसारिक क्षति से अछूता है। वह अद्वितीय और अभेद्य है।
6. युगों-युगों से एक ही रूप:
“जुगु जुगु एको वेसु” का अर्थ है कि युगों-युगों से ईश्वर का रूप एक ही है। समय चाहे कितना भी बदल जाए, ईश्वर का अस्तित्व और उसकी सत्ता अपरिवर्तित रहती है। वह हर युग में एक समान रहता है और उसकी महिमा अनंत है।
सारांश:
“आदेसु तिसै आदेसु ॥
आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥” का संदेश है कि हम उस ईश्वर को बार-बार नमन करते हैं, जो सृष्टि के आरंभ से पहले मौजूद है, जो निर्मल, अनादि और अभेद्य है। वह युगों-युगों से एक ही रूप में है और सदा रहेगा। ईश्वर की महानता और उसकी शाश्वत सत्ता इस पंक्ति में वर्णित है, जो हमें यह सिखाती है कि हमें हमेशा उसकी महानता को स्वीकार कर उसे प्रणाम करना चाहिए।