आखणि जोरु चुपै नह जोरु ॥ जोरु न मंगणि देणि न जोरु ॥
जोरु न जीवणि मरणि नह जोरु ॥ जोरु न राजि मालि मनि सोरु ॥
बोलने का कोई बल नहीं है, चुप रहने का भी कोई बल नहीं है।
मांगने और देने में भी कोई बल नहीं है।
जीवन में और मृत्यु में भी कोई बल नहीं है।
राजाओं के राज्य, संपत्ति और मन की शांति पर भी कोई बल नहीं है।
गहरा विश्लेषण:
- इंसान की सीमाएँ: “आखणि जोरु चुपै नह जोरु” का मतलब है कि हमारे पास न तो बोलने की शक्ति है, और न ही चुप रहने की। यह पंक्ति बताती है कि इंसान अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने के लिए पूर्णतः सक्षम नहीं है। यह ईश्वर की कृपा या आदेश पर निर्भर करता है कि हम कब क्या कर सकते हैं।
- भिक्षा और दान में बल नहीं: “जोरु न मंगणि देणि न जोरु” में बताया गया है कि न तो हमारे पास यह शक्ति है कि हम किसी से कुछ मांग सकें और न ही यह कि हम किसी को कुछ दे सकें। सब कुछ ईश्वर की मर्जी से होता है। यह पंक्ति यह भी समझाती है कि जो कुछ हम देते या प्राप्त करते हैं, वह ईश्वर की कृपा का परिणाम है।
- जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण नहीं: “जोरु न जीवणि मरणि नह जोरु” का अर्थ है कि जीवन और मृत्यु भी हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। किसी के पास यह शक्ति नहीं है कि वह कब जन्म लेगा या कब मरेगा। यह केवल ईश्वर के हाथ में है।
- राज्य, संपत्ति और मानसिक शांति: “जोरु न राजि मालि मनि सोरु” में बताया गया है कि न तो राजाओं के राज्य पर, न ही संपत्ति या धन पर, और न ही मन की शांति पर हमारा बल या नियंत्रण है। राज्य, धन, और मन की शांति सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर निर्भर हैं।
यह पंक्तियाँ यह बताती हैं कि इंसान के पास कुछ भी करने का वास्तविक बल या अधिकार नहीं है। चाहे वह बोलना हो, चुप रहना हो, मांगना हो, देना हो, जीवन हो, मृत्यु हो, राज्य, संपत्ति या मानसिक शांति—सब कुछ ईश्वर की कृपा पर आधारित है। हमारी सारी शक्तियाँ और क्षमताएँ ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करती हैं, और हम बिना उसकी कृपा के कुछ भी नहीं कर सकते।
“आखणि जोरु चुपै नह जोरु” से लेकर “जोरु न राजि मालि मनि सोरु” तक का पूरा संदेश यह है कि मनुष्य की सारी शक्तियाँ सीमित हैं और सब कुछ ईश्वर की मर्जी के अनुसार होता है। चाहे वह हमारी बोलने, चुप रहने, मांगने, देने, जीवन, मृत्यु, या संपत्ति की स्थिति हो, किसी पर भी हमारा पूर्ण नियंत्रण नहीं है। ईश्वर की कृपा ही हमें सब कुछ देती है।